संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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५६ * कूर्मपुराण *
| ततः क्रुद्धोऽम्बुजाभाक्षं ब्रह्मा प्रोवाच केशवम्।<br>भवान् न नूनमात्मानं वेत्ति तत् परमक्षरम्॥ ४४॥<br><br>ब्रह्माणं जगतामेकमात्मानं परमं पदम्।<br>नावाभ्यां विद्यते ह्यन्यो लोकानां परमेश्वरः॥ ४५॥<br><br>संत्यज्य निद्रां विपुलां स्वमात्मानं विलोकय।<br>तस्य तत् क्रोधजं वाक्यं श्रुत्वा विष्णुर्भाषत॥ ४६॥<br><br>मा मैवं वद कल्याण परिवादं महात्मनः।<br>न मेऽस्त्यविदितं ब्रह्मन् नान्यथाहं वदामि ते॥ ४७॥<br><br>किन्तु मोहयति ब्रह्मन् भवन्तं पारमेश्वरी।<br>मायाशेषविशेषाणां हेतुरात्मसमुद्भवा॥ ४८॥ | तदनन्तर क्रुद्ध ब्रह्माने कमलकी आभाके समान नेत्रवाले केशवसे कहा—निश्चित ही आप अपने-आपको वह परम अक्षर, जगत्का एकमात्र आत्मरूप, ब्रह्मरूप, परम पद (शरण) नहीं जान रहे हैं। हम दोनोंके अतिरिक्त लोकोंका परमेश्वर और दूसरा कोई विद्यमान नहीं है। आप दीर्घ निद्राका परित्याग कर अपने-आपको देखें (पहचानें)। उनके (ब्रह्माके) इस क्रोधयुक्त वचनको सुनकर विष्णुने कहा—हे कल्याण! इस प्रकार न कहें, इस प्रकार न कहें, (यह उन) महात्माकी निन्दा है। ब्रह्मन्! मेरे लिये कुछ भी अज्ञात नहीं है, मैं आपसे असत्य नहीं कह रहा हूँ। किंतु ब्रह्मन्! आत्मासे समुद्भूत समस्त विशेषोंकी हेतुभूत परमेश्वरकी माया ही आपको मोहित कर रही है॥ ४४—४८॥ |
| एतावदुक्त्वा भगवान् विष्णुस्तूष्णीं बभूव ह।<br>ज्ञात्वा तत् परमं तत्त्वं स्वमात्मानं महेश्वरम्॥ ४९॥ | इतना कहकर भगवान् विष्णु अपने आत्मरूप महेश्वरको उस सर्वोत्कृष्ट परम तत्त्वके रूपमें जानकर चुप हो गये॥ ४९॥ |
| कुतोऽप्यपरिमेयात्मा भूतानां परमेश्वरः।<br>प्रसादं ब्रह्मणे कर्तुं प्रादुरासीत् ततो हरः॥ ५०॥<br><br>ललाटनयनोऽनन्तो जटामण्डलमण्डितः।<br>त्रिशूलपाणिर्भगवांस्तेजसां परमो निधिः॥ ५१॥<br><br>दिव्यां विशालां ग्रथितां ग्रहैः सार्केन्दुतारकैः।<br>मालामत्यद्भूताकारां धारयन् पादलम्बिनीम्॥ ५२॥ | तदनन्तर ब्रह्माके ऊपर अनुग्रह करनेके लिये प्राणियोंके परम ईश्वर अपरिमेयात्मा (असीम सामर्थ्यसम्पन्न) हर (भगवान् शंकर) वहाँ प्रादुर्भूत हो गये। उन अनन्त (भगवान् शंकर)-के ललाटमें नेत्र था। वे जटामण्डलसे सुशोभित थे। तेजके परम निधि वे भगवान् हाथमें त्रिशूल लिये थे। उन्होंने सूर्य, चन्द्रमा, ग्रहों तथा नक्षत्रोंसे गूँथी हुई अद्भुत आकारवाली चरणोंतक लटकती हुई लम्बी दिव्य विशाल मालाको धारण कर रखा था॥ ५०—५२॥ |
| तं दृष्ट्वा देवमीशानं ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>मोहितो माययात्यर्थं पीतवाससमब्रवीत्॥ ५३॥<br><br>क एष पुरुषोऽनन्तः शूलपाणिस्त्रिलोचनः।<br>तेजोराशिरमेयात्मा समायाति जनार्दन॥ ५४॥ | उन ईशानदेवको देखकर मायासे अत्यन्त मोहित लोकपितामह ब्रह्माने (अपनी रक्षाके लिये) पीताम्बरधारी (विष्णु)-से कहा—हे जनार्दन! हाथमें त्रिशूल धारण किये, त्रिनेत्रधारी, तेजकी राशिरूप, अमेयात्मा यह कौन अनन्त पुरुष (यहाँ) चला आ रहा है॥ ५३—५४॥ |
| तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विष्णुर्दानवमर्दनः।<br>अपश्यदीश्वरं देवं ज्वलन्तं विमलेऽम्भसि॥ ५५॥<br><br>ज्ञात्वा तत्परमं भावमैश्वरं ब्रह्मभावनम्।<br>प्रोवाचोत्थाय भगवान् देवदेवं पितामहम्॥ ५६॥ | उनके (ब्रह्माके) इस वचनको सुनकर दानवोंका मर्दन करनेवाले विष्णुने निर्मल जलमें देदीप्यमान देव ईश्वरको देखा। ईश्वर-सम्बन्धी उस परम भावरूप ब्रह्मभावको जानकर (महेश्वरमें परम तत्त्वका दर्शनकर) भगवान् (विष्णु) उठकर गये और देवदेव पितामहसे कहने लगे—॥ ५५—५६॥ |
| अयं देवो महादेवः स्वयंज्योतिः सनातनः।<br>अनादिनिधनोऽचिन्त्यो लोकानामीश्वरो महान्॥ ५७॥ | ये देव स्वयं प्रकाशित होनेवाले, सनातन, आदि और अन्तसे रहित, अचिन्त्य, महान्, समस्त लोकोंके ईश्वर महादेव हैं॥ ५७॥ |