भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 67
  • अध्याय ९ * ५७
शंकरः शम्भुरीशानः सर्वात्मा परमेश्वरः।<br>भूतानामधिपो योगी महेशो विमलः शिवः॥ ५८ ॥<br><br>एष धाता विधाता च प्रधानपुरुषेश्वरः।<br>यं प्रपश्यन्ति यतयो ब्रह्मभावेन भाविताः॥ ५९ ॥<br><br>सृजत्येष जगत् कृत्स्नं पाति संहरते तथा।<br>कालो भूत्वा महादेवः केवलो निष्कलः शिवः॥ ६० ॥<br><br>ब्रह्माणं विदधे पूर्वं भवन्तं यः सनातनः।<br>वेदांश्च प्रददौ तुभ्यं सोऽयमायाति शंकरः॥ ६१ ॥<br><br>अस्यैव चापरां मूर्तिं विश्वयोनिं सनातनीम्।<br>वासुदेवाभिधानां मामवेहि प्रपितामह॥ ६२॥<br><br>किं न पश्यसि योगेशं ब्रह्माधिपतिमव्ययम्।<br>दिव्यं भवतु ते चक्षुर्येन द्रक्ष्यसि तत्परम्॥ ६३॥<br><br>लब्ध्वा शैवं तदा चक्षुर्विष्णोर्लोकपितामहः।<br>बुबुधे परमेशानं पुरतः समवस्थितम्॥ ६४॥<br><br>स लब्ध्वा परमं ज्ञानमैश्वरं प्रपितामहः।<br>प्रपेदे शरणं देवं तमेव पितरं शिवम्॥ ६५ ॥<br><br>ओंकारं समनुस्मृत्य संस्तभ्यात्मानमात्मना।<br>अथर्वशिरसा देवं तुष्टाव च कृताञ्जलिः॥ ६६॥<br><br>संस्तुतस्तेन भगवान् ब्रह्मणा परमेश्वरः।<br>अवाप परमां प्रीतिं व्याजहार स्मयन्निव॥ ६७॥<br><br>मत्समस्त्वं न संदेहो मद्भक्तश्च यतो भवान्।<br>मयैवोत्पादितः पूर्वं लोकसृष्ट्यर्थमव्ययम्॥ ६८ ॥<br><br>त्वमात्मा ह्यादिपुरुषो मम देहसमुद्भवः।<br>वरं वरय विश्वात्मन् वरदोऽहं तवानघ॥ ६९ ॥<br><br>स देवदेववचनं निशम्य कमलोद्भवः।<br>निरीक्ष्य विष्णुं पुरुषं प्रणम्याह वृषध्वजम्॥ ७० ॥<br><br>भगवन् भूतभव्येश महादेवाम्बिकापते।<br>त्वामेव पुत्रमिच्छामि त्वया वा सदृशं सुतम्॥ ७१ ॥ये शंकर, शम्भु, ईशान, सर्वात्मा, परमेश्वर, समस्त प्राणियोंके एकमात्र स्वामी, योगी, महेश, विमल एवं शिवरूप (कल्याणरूप) हैं। ये ही धाता, विधाता, प्रधान पुरुष और ईश्वर हैं। यतिजन (संन्यासी लोग) ब्रह्मकी भावनासे भावित होकर जिनका दर्शन करते हैं वे ही केवल, निष्कल, महादेव शिव काल बनकर सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं, रक्षा करते हैं और संहार करते हैं॥ ५८-६० ॥<br><br>ये वे ही शंकर आ रहे हैं, जिन सनातन (देव)-ने पूर्वकालमें आप ब्रह्माको बनाया और आपको वेद प्रदान किया। प्रपितामह ! मुझे इनकी ही विश्वयोनि, सनातन एवं वासुदेव नामवाली दूसरी मूर्ति समझो। क्या आप ब्रह्माके भी अधिपति, अव्यय योगेश्वरको नहीं देख रहे हैं? आपकी दिव्य दृष्टि हो जाय, जिससे आप उस परम (तत्त्व)-को देख सकें ॥ ६१-६३ ॥<br><br>विष्णुसे इस प्रकार शैव-नेत्र (शिव-सम्बन्धी ज्ञान) प्राप्तकर लोक-पितामह (ब्रह्मा)-ने सामने अवस्थित परम ईशानको जाना। उन प्रपितामह (ब्रह्मा)-ने ईश्वर-सम्बन्धी परम ज्ञान प्राप्तकर उन्हीं पितृरूप देव शिवकी शरण ग्रहण की। ओंकार (तत्त्व)-का अनुस्मरणकर और आत्माद्वारा मनका निरोधकर उन्होंने अथर्ववेदके मन्त्रोंसे हाथ जोड़ते हुए (उन) देवकी प्रार्थना की ॥ ६४-६६ ॥<br><br>उन ब्रह्माके द्वारा स्तुति किये जानेपर भगवान् परमेश्वर (शिव)-को परम प्रीति प्राप्त हुई और वे मुसकराते हुए (इस प्रकार) बोले- ॥ ६७॥<br><br>तुम मेरे भक्त हो, इसलिये निःसंदेह तुम मेरे ही समान हो। मेरे द्वारा ही पहले संसारकी सृष्टि करनेके लिये तुम अव्ययको उत्पन्न किया गया था। मेरी देहसे उत्पन्न तुम (मेरी ही) आत्मा और आदि पुरुष हो। हे अनघ ! विश्वात्मन् ! वर माँगो। मैं तुम्हें वर प्रदान करूँगा ॥ ६८-६९ ॥<br><br>कमलसे उत्पन्न उन ब्रह्माने देवाधिदेव (शंकर)-के इस वचनको सुनकर विष्णुकी ओर देखा और उन (परम) पुरुष वृषध्वज (शंकर)-को प्रणामकर उनसे कहा- ॥ ७० ॥<br><br>हे भगवन् ! भूत एवं भविष्यके स्वामी ! महादेव ! अम्बिकाके पति ! मैं आपको ही पुत्र-रूपमें अथवा आपके ही समान पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छा करता हूँ ॥ ७१ ॥
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