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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
  • अध्याय ९ * ५७
शंकरः शम्भुरीशानः सर्वात्मा परमेश्वरः।<br>भूतानामधिपो योगी महेशो विमलः शिवः॥ ५८ ॥<br><br>एष धाता विधाता च प्रधानपुरुषेश्वरः।<br>यं प्रपश्यन्ति यतयो ब्रह्मभावेन भाविताः॥ ५९ ॥<br><br>सृजत्येष जगत् कृत्स्नं पाति संहरते तथा।<br>कालो भूत्वा महादेवः केवलो निष्कलः शिवः॥ ६० ॥<br><br>ब्रह्माणं विदधे पूर्वं भवन्तं यः सनातनः।<br>वेदांश्च प्रददौ तुभ्यं सोऽयमायाति शंकरः॥ ६१ ॥<br><br>अस्यैव चापरां मूर्तिं विश्वयोनिं सनातनीम्।<br>वासुदेवाभिधानां मामवेहि प्रपितामह॥ ६२॥<br><br>किं न पश्यसि योगेशं ब्रह्माधिपतिमव्ययम्।<br>दिव्यं भवतु ते चक्षुर्येन द्रक्ष्यसि तत्परम्॥ ६३॥<br><br>लब्ध्वा शैवं तदा चक्षुर्विष्णोर्लोकपितामहः।<br>बुबुधे परमेशानं पुरतः समवस्थितम्॥ ६४॥<br><br>स लब्ध्वा परमं ज्ञानमैश्वरं प्रपितामहः।<br>प्रपेदे शरणं देवं तमेव पितरं शिवम्॥ ६५ ॥<br><br>ओंकारं समनुस्मृत्य संस्तभ्यात्मानमात्मना।<br>अथर्वशिरसा देवं तुष्टाव च कृताञ्जलिः॥ ६६॥<br><br>संस्तुतस्तेन भगवान् ब्रह्मणा परमेश्वरः।<br>अवाप परमां प्रीतिं व्याजहार स्मयन्निव॥ ६७॥<br><br>मत्समस्त्वं न संदेहो मद्भक्तश्च यतो भवान्।<br>मयैवोत्पादितः पूर्वं लोकसृष्ट्यर्थमव्ययम्॥ ६८ ॥<br><br>त्वमात्मा ह्यादिपुरुषो मम देहसमुद्भवः।<br>वरं वरय विश्वात्मन् वरदोऽहं तवानघ॥ ६९ ॥<br><br>स देवदेववचनं निशम्य कमलोद्भवः।<br>निरीक्ष्य विष्णुं पुरुषं प्रणम्याह वृषध्वजम्॥ ७० ॥<br><br>भगवन् भूतभव्येश महादेवाम्बिकापते।<br>त्वामेव पुत्रमिच्छामि त्वया वा सदृशं सुतम्॥ ७१ ॥ये शंकर, शम्भु, ईशान, सर्वात्मा, परमेश्वर, समस्त प्राणियोंके एकमात्र स्वामी, योगी, महेश, विमल एवं शिवरूप (कल्याणरूप) हैं। ये ही धाता, विधाता, प्रधान पुरुष और ईश्वर हैं। यतिजन (संन्यासी लोग) ब्रह्मकी भावनासे भावित होकर जिनका दर्शन करते हैं वे ही केवल, निष्कल, महादेव शिव काल बनकर सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं, रक्षा करते हैं और संहार करते हैं॥ ५८-६० ॥<br><br>ये वे ही शंकर आ रहे हैं, जिन सनातन (देव)-ने पूर्वकालमें आप ब्रह्माको बनाया और आपको वेद प्रदान किया। प्रपितामह ! मुझे इनकी ही विश्वयोनि, सनातन एवं वासुदेव नामवाली दूसरी मूर्ति समझो। क्या आप ब्रह्माके भी अधिपति, अव्यय योगेश्वरको नहीं देख रहे हैं? आपकी दिव्य दृष्टि हो जाय, जिससे आप उस परम (तत्त्व)-को देख सकें ॥ ६१-६३ ॥<br><br>विष्णुसे इस प्रकार शैव-नेत्र (शिव-सम्बन्धी ज्ञान) प्राप्तकर लोक-पितामह (ब्रह्मा)-ने सामने अवस्थित परम ईशानको जाना। उन प्रपितामह (ब्रह्मा)-ने ईश्वर-सम्बन्धी परम ज्ञान प्राप्तकर उन्हीं पितृरूप देव शिवकी शरण ग्रहण की। ओंकार (तत्त्व)-का अनुस्मरणकर और आत्माद्वारा मनका निरोधकर उन्होंने अथर्ववेदके मन्त्रोंसे हाथ जोड़ते हुए (उन) देवकी प्रार्थना की ॥ ६४-६६ ॥<br><br>उन ब्रह्माके द्वारा स्तुति किये जानेपर भगवान् परमेश्वर (शिव)-को परम प्रीति प्राप्त हुई और वे मुसकराते हुए (इस प्रकार) बोले- ॥ ६७॥<br><br>तुम मेरे भक्त हो, इसलिये निःसंदेह तुम मेरे ही समान हो। मेरे द्वारा ही पहले संसारकी सृष्टि करनेके लिये तुम अव्ययको उत्पन्न किया गया था। मेरी देहसे उत्पन्न तुम (मेरी ही) आत्मा और आदि पुरुष हो। हे अनघ ! विश्वात्मन् ! वर माँगो। मैं तुम्हें वर प्रदान करूँगा ॥ ६८-६९ ॥<br><br>कमलसे उत्पन्न उन ब्रह्माने देवाधिदेव (शंकर)-के इस वचनको सुनकर विष्णुकी ओर देखा और उन (परम) पुरुष वृषध्वज (शंकर)-को प्रणामकर उनसे कहा- ॥ ७० ॥<br><br>हे भगवन् ! भूत एवं भविष्यके स्वामी ! महादेव ! अम्बिकाके पति ! मैं आपको ही पुत्र-रूपमें अथवा आपके ही समान पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छा करता हूँ ॥ ७१ ॥

५८

  • कूर्मपुराण *

मोहितोऽस्मि महादेव मायया सूक्ष्मया त्वया।<br>न जाने परमं भावं याथातथ्येन ते शिव ॥ ७२ ॥महादेव! मैं आपकी सूक्ष्म मायाद्वारा मोहित कर लिया गया हूँ। शिव! मैं आपके परम भावको यथार्थ-रूपमें नहीं जानता हूँ। देव! आप ही भक्तोंके माता-पिता, भाई तथा मित्र हैं। आप प्रसन्न हों। मैं आपके चरणकमलोंमें प्रणाम करता हूँ और आपकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ७२-७३॥
त्वमेव देव भक्तानां भ्राता माता पिता सुहृत्।<br>प्रसीद तव पादाब्जं नमामि शरणं गतः॥ ७३॥
स तस्य वचनं श्रुत्वा जगन्नाथो वृषध्वजः।<br>व्याजहार तदा पुत्रं समालोक्य जनार्दनम्॥ ७४॥तदनन्तर जगत्के स्वामी वृषध्वज (शंकर)-ने उनके वचन सुनकर पुत्र (रूप) जनार्दन (विष्णु)-की ओर देखकर (ब्रह्मासे) कहा—॥ ७४॥
यदर्थितं भगवता तत् करिष्यामि पुत्रक।<br>विज्ञानमैश्वरं दिव्यमुत्पत्स्यति तवानघ ॥ ७५ ॥हे पुत्रक! तुमने जैसी इच्छा की है मैं वैसा ही करूँगा। अनघ! तुम्हें ईश्वर-सम्बन्धी दिव्य ज्ञान प्राप्त होगा। मेरे द्वारा तुम्हीं सभी प्राणियोंके प्रथम स्रष्टाके रूपमें नियुक्त किये गये हो। अतः देवेश! लोकपितामह! तुम वैसा ही करो। ये नारायण एवं अनन्त (भगवान् विष्णु) मेरी ही श्रेष्ठ मूर्ति हैं। ये ईशान हरि तुम्हारे योग-क्षेमका वहन करनेवाले होंगे॥ ७५-७७॥
त्वमेव सर्वभूतानामादिकर्ता नियोजितः।<br>तथा कुरुष्व देवेश मया लोकपितामह॥ ७६ ॥
एष नारायणोऽनन्तो ममैव परमा तनुः।<br>भविष्यति तवेशानो योगक्षेमवहो हरिः॥ ७७ ॥
एवं व्याहृत्य हस्ताभ्यां प्रीतात्मा परमेश्वरः।<br>संस्पृश्य देवं ब्रह्माणं हरिं वचनमब्रवीत् ॥ ७८ ॥ऐसा कहकर प्रसन्नचित्त परमेश्वर (शिव)-ने हाथोंसे देव ब्रह्माका स्पर्शकर हरि (विष्णु)-से कहा—हे जगन्मूर्ति! तुम्हारी भक्तिसे मैं तुमपर सर्वथा प्रसन्न हूँ। वर माँगो। तत्त्वतः हम दोनों भिन्न नहीं हैं॥ ७८-७९॥
तुष्टोऽस्मि सर्वथाहं ते भक्त्या तव जगन्मय।<br>वरं वृणीष्व नह्यावां विभिन्नौ परमार्थतः॥ ७९ ॥
श्रुत्वाथ देववचनं विष्णुर्विश्वजगन्मयः।<br>प्राह प्रसन्नया वाचा समालोक्य चतुर्मुखम्॥ ८० ॥इसके बाद महादेवका वचन सुनकर विश्वमय, जगन्मय विष्णुने चतुर्मुख ब्रह्माकी ओर देखकर प्रीतियुक्त वाणीमें (महादेवसे) कहा—मेरे लिये यही श्लाघनीय वर है कि मैं आप परमेश्वर परमात्माका दर्शन कर रहा हूँ। मेरी आपमें भक्ति हो॥ ८०-८१॥
एष एव वरः श्लाघ्यो यदहं परमेश्वरम्।<br>पश्यामि परमात्मानं भक्तिर्भवतु मे त्वयि॥ ८१ ॥
तथेत्युक्त्वा महादेवः पुनर्विष्णुमभाषत।<br>भवान् सर्वस्य कार्यस्य कर्ताहमधिदैवतम्॥ ८२ ॥'ऐसा ही हो', यह कहकर महादेवने पुनः विष्णुसे कहा—आप सभी कार्योंके कर्ता हैं और मैं अधिदेवता हूँ। यह सब कुछ मेरा और आपका ही रूप है, इसमें कोई संदेह नहीं है। आप चन्द्रमा हैं, मैं सूर्य हूँ। आप रात्रि हैं, मैं दिन हूँ। आप प्रकृति हैं और मैं ही अव्यक्त पुरुष हूँ। आप ज्ञानरूप हैं और मैं ज्ञाता हूँ, आप मायारूप हैं और मैं ईश्वर हूँ। आप विद्यात्मिका शक्ति हैं, मैं शक्तिमान् ईश्वर हूँ और निष्कल देव परस्वरूप नारायण भी मैं ही हूँ॥ ८२-८५॥
मन्मयं त्वन्मयं चैव सर्वमेतन्न संशयः।<br>भवान् सोमस्त्वहं सूर्यो भवान् रात्रिरहं दिनम्॥ ८३ ॥
भवान् प्रकृतिरव्यक्तमहं पुरुष एव च।<br>भवान् ज्ञानमहं ज्ञाता भवान् मायाहमीश्वरः॥ ८४ ॥
भवान् विद्यात्मिका शक्तिः शक्तिमानहमीश्वरः।<br>योऽहं सुनिष्कलो देवः सोऽपि नारायणः परः॥ ८५ ॥
एकीभावेन पश्यन्ति योगिनो ब्रह्मवादिनः।<br>त्वामनाश्रित्य विश्वात्मन् न योगी मामुपैष्यति।<br>पालयैतज्जगत् कृत्स्नं सदेवासुरमानुषम्॥ ८६ ॥ब्रह्मवादी योगी (हम दोनोंको) एक भावसे ही देखते हैं। हे विश्वात्मन्! बिना आपका आश्रय ग्रहण किये योगी मुझे प्राप्त नहीं कर सकते हैं। आप देवता, असुर तथा मनुष्योंसे युक्त इस सम्पूर्ण जगत्‌का पालन करें॥ ८६॥
  • अध्याय १० * ५९

इतीदमुक्त्वा भगवाननादिः
स्वमायया मोहितभूतभेदः।
जगाम जन्मर्धिविनाशहीनं
धामैकमव्यक्तमनन्तशक्तिः ॥ ८७ ॥

ऐसा कहकर अपनी मायासे सम्पूर्ण प्राणियोंको मोहित करनेवाले अनादि एवं अनन्तशक्तिसम्पन्न भगवान् जन्म, विकास एवं विनाशसे रहित (अपने) अव्यक्त धाम (स्थान)-को चले गये॥ ८७ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें नवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ॥


दसवाँ अध्याय

विष्णुद्वारा मधु तथा कैटभका वध, नाभिकमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा सनकादिकी सृष्टि, ब्रह्मासे रुद्रकी उत्पत्ति, रुद्रकी अष्टमूर्तियों, आठ नामों तथा आठ पत्नियोंका वर्णन, रुद्रके द्वारा अनेक रुद्रोंकी उत्पत्ति तथा पुनः वैराग्य ग्रहण करना, ब्रह्माद्वारा रुद्रकी स्तुति तथा माहात्म्य-वर्णन, रुद्रद्वारा ब्रह्माको ज्ञानकी प्राप्ति, महादेवका त्रिमूर्तित्व और ब्रह्माद्वारा अनेक प्रकारकी सृष्टि

श्रीकूर्म उवाच

गते महेश्वरे देवे स्वाधिवासं पितामहः।
तदेव सुमहत् पद्मं भेजे नाभिसमुत्थितम्॥ १॥
श्रीकूर्मने कहा—महेश्वर देवके अपने निवास-स्थानपर चले जानेके बाद पितामह (ब्रह्मा), (भगवान् विष्णुकी) नाभिसे उत्पन्न उसी विशाल सुन्दर कमलपर रहने लगे॥ १॥

अथ दीर्घेण कालेन तत्राप्रतिमपौरुषौ।
महासुरौ समायातौ भ्रातरौ मधुकैटभौ॥ २॥

क्रोधेन महताविष्टौ महापर्वतविग्रहौ।
कर्णान्तरसमुद्भूतौ देवदेवस्य शार्ङ्गिणः॥ ३॥

तावागतौ समीक्ष्याह नारायणमजो विभुः।
त्रैलोक्यकण्टकावेतावसुरौ हन्तुमर्हसि॥ ४॥
एक लम्बा समय व्यतीत हो जानेपर वहाँ अतुलित शक्तिवाले मधु तथा कैटभ नामक दो असुर आये, जो परस्पर भाई थे। देवोंके भी देव शार्ङ्गधारी भगवान् विष्णुके कानसे उत्पन्न तथा विशाल पर्वतके समान शरीरवाले और महान् क्रोधसे आविष्ट उन दोनों (मधु-कैटभ)-को आया हुआ देखकर अजन्मा, विभु (ब्रह्मा)-ने नारायणसे कहा—ये दोनों असुर तीनों लोकोंके लिये कण्टक हैं, आप इन्हें मारें॥ २—४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हरिनारायणः प्रभुः।
आज्ञापयामास तयोर्वधार्थं पुरुषावुभौ॥ ५॥
उनके इस वचनको सुनकर प्रभु नारायण हरिने उन दोनोंका वध करनेके लिये (जिष्णु तथा विष्णु नामक) दो पुरुषोंको आज्ञा दी॥ ५॥

तदाज्ञया महद्युद्धं तयोस्ताभ्यामभूद् द्विजाः।
व्यनयत् कैटभं विष्णुर्जिष्णुश्च व्यनयन्मधुम्॥ ६॥

ततः पद्मासनासीनं जगन्नाथं पितामहम्।
बभाषे मधुरं वाक्यं स्नेहाविष्टमना हरिः॥ ७॥
हे ब्राह्मणो! उनकी आज्ञासे उन (विष्णु तथा जिष्णु)-से उन दोनों (मधु-कैटभ) असुरोंका महान् युद्ध हुआ। विष्णुने कैटभको जीता और जिष्णुने मधुको जीता। तदनन्तर स्नेहसे आविष्ट मनवाले हरिने कमलके आसनपर आसीन तथा जगन्नाथ पितामहसे मधुर वचन कहा—॥ ६-७॥

अस्मान्मयोच्यमानस्त्वं पद्मादवतर प्रभो।
नाहं भवन्तं शक्नोमि वोढुं तेजोमयं गुरुम्॥ ८॥
प्रभो! मेरे कहनेसे आप अब इस कमलसे नीचे उतरें। तेजोमय, बहुत भारी आपको ढोनेमें मैं असमर्थ हूँ॥ ८॥

६० * कूर्मपुराण *


ततोऽवतीर्य विश्वात्मा देहमाविश्य चक्रिणः।<br>अवाप वैष्णवीं निद्रामेकीभूयाथ विष्णुना ॥ ९ ॥तब विश्वात्मा (ब्रह्मा) नीचे उतरे और चक्र धारण करनेवाले विष्णुकी देहमें प्रविष्ट होकर वैष्णवी निद्राको प्राप्त हो गये। इस प्रकार विष्णुसे उनकी एकात्मता हो गयी ॥ ९ ॥
सहस्रशीर्षनयनः शङ्खचक्रगदाधरः।<br>ब्रह्मा नारायणाख्योऽसौ सुष्वाप सलिले तदा ॥ १० ॥<br><br>सोऽनुभूय चिरं कालमानन्दं परमात्मनः।<br>अनाद्यनन्तमद्वैतं स्वात्मानं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ११ ॥<br><br>ततः प्रभाते योगात्मा भूत्वा देवश्चतुर्मुखः।<br>ससर्ज सृष्टिं तद्रूपां वैष्णवं भावमाश्रितः ॥ १२ ॥तब हजारों सिर तथा हजारों नेत्रवाले और शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले वे नारायण नामवाले ब्रह्मा जलमें सो गये। उन्होंने बहुत समयतक परमात्माके अनादि, अनन्त, आत्मस्वरूप, ब्रह्मसंज्ञक अद्वैत आनन्दका अनुभव किया। तदनन्तर प्रभातकाल होनेपर योगात्मा देव चतुर्मुख होकर और वैष्णव भावका आश्रय ग्रहणकर उसी प्रकारकी (वैष्णवी) सृष्टि करने लगे ॥ १०–१२ ॥
पुरस्तादसृजद् देवः सनन्दं सनकं तथा।<br>ऋभुं सनत्कुमारं च पूर्वजं तं सनातनम् ॥ १३ ॥<br><br>ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः परं वैराग्यमास्थिताः।<br>विदित्वा परमं भावं न सृष्टौ दधिरे मतिम् ॥ १४ ॥<br><br>तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ पितामहः।<br>बभूव नष्टचेता वै मायया परमेष्ठिनः ॥ १५ ॥<br><br>ततः पुराणपुरुषो जगन्मूर्तिर्जनार्दनः।<br>व्याजहारात्मनः पुत्रं मोहनाशाय पद्मजम् ॥ १६ ॥उन देवने सर्वप्रथम पूर्वजोंके भी पूर्वज सनन्दन, सनक, ऋभु, सनत्कुमार तथा सनातनको उत्पन्न किया। (सुख-दुःख आदि) द्वन्द्व एवं मोह (आसक्ति)-से सर्वथा शून्य एवं परम वैराग्यभावमें स्थित इन सनक आदि ऋषियोंने परम तत्त्वको जानकर सृष्टिकार्यमें अपनी बुद्धि नहीं लगायी। उन (सनकादि)-के इस प्रकारके लोक-सृष्टिसे सर्वथा निरपेक्षभावको देखकर पितामह (ब्रह्मा) परमेष्ठी (परमात्मा—जनार्दन)-की मायासे मोहित हो गये। तब जगन्मूर्ति, पुराणपुरुष, जनार्दनने (नाभि) कमलसे उत्पन्न अपने पुत्र (ब्रह्मा)-का मोह नष्ट करनेके लिये उनसे कहा— ॥ १३–१६ ॥
विष्णुरुवाच<br>कच्चिन्न विस्मृतो देवः शूलपाणिः सनातनः।<br>यदुक्तवानात्मनोऽसौ पुत्रत्वे तव शंकरः ॥ १७ ॥**विष्णु बोले—**कहीं आप शूलपाणि सनातन-देवको भूल तो नहीं गये? उन शंकरने अपनेको आपके पुत्र-रूपमें होनेकी बात कही थी ॥ १७ ॥
अवाप्य संज्ञां गोविन्दात् पद्मयोनिः पितामहः।<br>प्रजाः स्रष्टुमनास्तेपे तपः परमदुश्चरम् ॥ १८ ॥<br><br>तस्यैवं तप्यमानस्य न किञ्चित् समवर्तत।<br>ततो दीर्घेण कालेन दुःखात् क्रोधोऽभ्यजायत ॥ १९ ॥गोविन्दसे चेतना प्राप्तकर पद्मयोनि पितामह प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छासे परम दुश्चर तप करने लगे। उनके इस प्रकार (दीर्घकालतक) तप करनेपर (भी) किसी भी प्रकारकी सृष्टि नहीं हुई। बहुत समय बीत जानेपर उन्हें दुःखसे क्रोध उत्पन्न हुआ ॥ १८–१९ ॥
क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः।<br>ततस्तेभ्योऽश्रुबिन्दुभ्यो भूताः प्रेतास्तथाभवन् ॥ २० ॥<br><br>सर्वांस्तानश्रुजान् दृष्ट्वा ब्रह्मात्मानमनिन्दत।<br>जहौ प्राणांश्च भगवान् क्रोधाविष्टः प्रजापतिः ॥ २१ ॥क्रोधाविष्ट उनके (ब्रह्माके) नेत्रोंसे आँसूकी बूँदें गिरीं। तब उन आँसुओंकी बूँदोंसे भूत-प्रेत उत्पन्न हुए। आँसुओंसे उत्पन्न उन सब (भूत-प्रेतों)-को देखकर क्रोधाविष्ट प्रजापति भगवान् ब्रह्माने अपनी ही निन्दा की और अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया ॥ २०–२१ ॥
तदा प्राणमयो रुद्रः प्रादुरासीत् प्रभोर्मुखात्।<br>सहस्रादित्यसंकाशो युगान्तदहनोपमः ॥ २२ ॥तदनन्तर प्रभुके मुखसे हजारों सूर्यके समान देदीप्य-मान तथा प्रलयकालीन अग्निके सदृश प्राणमय रुद्र प्रकट हुए ॥ २२ ॥

* अध्याय १० *

६१


रुरोद सुस्वरं घोरं देवदेवः स्वयं शिवः।<br>रोदमानं ततो ब्रह्मा मा रोदीरित्यभाषत।<br>रोदनाद् रुद्र इत्येवं लोके ख्यातिं गमिष्यसि ॥ २३॥देवोंके भी देव स्वयं शिव उच्च स्वरमें घोर रुदन करने लगे। तब रुदन करते हुए उनसे ब्रह्माने 'मत रोओ'—इस प्रकारसे कहा। तुम रुदन करनेके कारण 'रुद्र' इस नामसे संसारमें प्रसिद्धि प्राप्त करोगे ॥ २३॥
अन्यानि सप्त नामानि पत्नीः पुत्रांश्च शाश्वतान्।<br>स्थानानि चैषामष्टानां ददौ लोकपितामहः ॥ २४॥लोकपितामहने (उन्हें रुद्रके अतिरिक्त) अन्य सात नाम, (आठ) पत्नियाँ, शाश्वत (दीर्घायु) पुत्र और आठ स्थानों* (मूर्तियों)-को प्रदान किया ॥ २४॥
भवः शर्वस्तथेशानः पशूनां पतिरेव च।<br>भीमश्चोग्रो महादेवस्तानि नामानि सप्त वै॥ २५॥<br>सूर्यो जलं मही वह्निर्वायुराकाशमेव च।<br>दीक्षितो ब्राह्मणश्चन्द्र इत्येता अष्टमूर्तयः ॥ २६॥भव, शर्व, ईशान, पशुपति, भीम, उग्र तथा महादेव—ये सात नाम हैं। सूर्य, जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश, दीक्षित ब्राह्मण तथा चन्द्र—ये (रुद्रकी) आठ मूर्तियाँ हैं ॥ २५-२६॥
स्थानेष्वेतेषु ये रुद्रं ध्यायन्ति प्रणमन्ति च।<br>तेषामष्टतनुर्देवो ददाति परमं पदम् ॥ २७॥जो इन आठ स्थानों (मूर्तिरूपों)-में रुद्रका ध्यान करते हैं और उन्हें प्रणाम करते हैं, उन्हें अष्टमूर्तिरूप देव (भगवान् शिव अपना) परम पद देते हैं ॥ २७॥
सुवर्चला तथैवोमा विकेशी च तथा शिवा।<br>स्वाहा दिशश्च दीक्षा च रोहिणी चेति पत्नयः ॥ २८॥सुवर्चला, उमा, विकेशी, शिवा, स्वाहा, दिशाएँ, दीक्षा तथा रोहिणी—ये ही (रुद्रकी आठ) पत्नियाँ हैं।
शनैश्चरस्तथा शुक्नो लोहिताङ्गो मनोजवः।<br>स्कन्दः सर्गोऽथ संतानो बुधश्चैषां सुताः स्मृताः ॥ २९॥शनैश्चर, शुक्र, लोहिताङ्ग (मंगल), मनोजव (कामदेव), स्कन्द, सर्ग, संतान तथा बुध—ये (आठ उनके) पुत्र कहे गये हैं ॥ २८-२९॥
एवम्प्रकारो भगवान् देवदेवो महेश्वरः।<br>प्रजाधर्मं च कामं च त्यक्त्वा वैराग्यमाश्रितः ॥ ३०॥इस प्रकारके देवाधिदेव भगवान् महेश्वरने प्रजाधर्म (सृष्टिकार्य) एवं काम (वासना)-का परित्यागकर वैराग्यका आश्रय ग्रहण किया। उस शाश्वत, परम अमृतरूपी अक्षर ब्रह्मका आस्वादनकर और आत्मामें आत्मतत्त्वका आधानकर वे ईश्वरभावमें स्थित हो गये ॥ ३०-३१॥
आत्मन्याधाय चात्मानमैश्वरं भावमास्थितः।<br>पीत्वा तदक्षरं ब्रह्म शाश्वतं परमामृतम् ॥ ३१॥
प्रजाः सृजेति चादिष्टो ब्रह्मणा नीललोहितः।<br>स्वात्मना सदृशान् रुद्रान् ससर्ज मनसा शिवः ॥ ३२॥ब्रह्माके द्वारा 'प्रजाकी सृष्टि करो' इस प्रकारका आदेश प्राप्तकर नीललोहित शिवने मनसे अपने ही समान रुद्रोंकी सृष्टि की ॥ ३२॥
कपर्दिनो निरातङ्कान् नीलकण्ठान् पिनाकिनः।<br>त्रिशूलहस्तानृष्टिघ्नान् महानन्दांस्त्रिलोचनान् ॥ ३३॥प्रभुने सैकड़ों करोड़ जटाजूट धारण करनेवाले, भयरहित, नीलकण्ठ, पिनाकपाणि, हाथमें त्रिशूल धारण किये, ऋष्टिघ्न, महान् आनन्दस्वरूप, तीन नेत्रयुक्त, जरा-मरणसे रहित, विशाल वृषभोंको वाहनरूपमें स्वीकार करनेवाले सर्वज्ञ तथा वीतराग (रुद्रों)-को उत्पन्न किया ॥ ३३-३४॥
जरामरणनिर्मुक्तान् महावृषभवाहनान्।<br>वीतरागांश्च सर्वज्ञान् कोटिकोटिशतान् प्रभुः ॥ ३४॥
तान् दृष्ट्वा विविधान् रुद्रान् निर्मलान् नीललोहितान्।<br>जरामरणनिर्मुक्तान् व्याजहार हरं गुरुः ॥ ३५॥गुरु (ब्रह्मा)-ने जरा-मरणसे रहित, नीललोहित एवं निर्मल उन अनेक रुद्रोंको देखकर हर (शिव)-से कहा ॥ ३५॥

* ये आठ स्थान सूर्य, जल आदि आगे गिनाये गये हैं। इनमें रुद्रका निवास है। इसीलिये ये आठ रुद्रकी मूर्ति माने जाते हैं।

६२ * कूर्मपुराण *


मा स्त्राक्षीरीदृशीर्देव प्रजा मृत्युविवर्जिताः ।<br>अन्याः सृजस्व भूतेश जन्ममृत्युसमन्विताः ॥ ३६ ॥हे देव! मृत्युसे रहित इस प्रकारकी सृष्टि मत करो। भूतेश! जन्म एवं मृत्युवाली दूसरी प्रकारकी सृष्टि करो॥ ३६॥
ततस्तमाह भगवान् कपर्दी कामशासनः ।<br>नास्ति मे तादृशः सर्गः सृज त्वमशुभाः प्रजाः ॥ ३७ ॥तदनन्तर कामपर शासन करनेवाले जटाजूटधारी भगवान् (शिव)—ने उनसे कहा—मेरे पास उस प्रकारकी (जन्म-मृत्युसे युक्त) सृष्टि नहीं है। (ऐसी) अशुभ प्रजाओंको आप ही उत्पन्न करें। तबसे उन देवने अशुभ प्रजाओंकी सृष्टि नहीं की। (और) अपने आत्मज उन रुद्रोंके साथ वे निवृत्तात्मा (क्रियारहित)—के रूपमें स्थित हो गये। इसी कारण देवोंमें देव उन शूलधारी (शंकर)—का स्थाणुत्व हुआ (अर्थात् वे ‘स्थाणु’^१ इस नामसे प्रसिद्ध हो गये) ॥ ३७-३८ ॥
ततः प्रभृति देवोऽसौ न प्रसूतेऽशुभाः प्रजाः ।<br>स्वात्मजैरेव तै रुद्रैर्निवृत्तात्मा ह्यतिष्ठत ।<br>स्थाणुत्वं तेन तस्यासीद् देवदेवस्य शूलिनः ॥ ३८ ॥<br>ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यं तपः सत्यं क्षमा धृतिः ।<br>स्रष्टृत्वमात्मसम्बोधो ह्यधिष्ठातृत्वमेव च ॥ ३९ ॥भगवान् शंकरमें ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, तप, सत्य, क्षमा, धृति, स्रष्टृत्व, आत्मज्ञान तथा अधिष्ठातृत्व—ये दस अव्यय (शाश्वत) गुण सदा प्रतिष्ठित रहते हैं। ये पिनाक धारण करनेवाले शंकर ही साक्षात् परमेश्वर हैं ॥ ३९-४० ॥
अव्ययानि दशैतानि नित्यं तिष्ठन्ति शंकरे ।<br>स एव शंकरः साक्षात् पिनाकी परमेश्वरः ॥ ४० ॥<br>ततः स भगवान् ब्रह्मा वीक्ष्य देवं त्रिलोचनम् ।<br>सहैव मानसैः पुत्रैः प्रीतिविस्फारिलोचनः ॥ ४१ ॥तदनन्तर प्रीतिसे विकसित नेत्रवाले भगवान् ब्रह्माने तीन नेत्रोंवाले देव (शंकर)—को मानस पुत्रोंके साथ देखा। ब्रह्माने अपनी ज्ञान-दृष्टिसे ईश्वर-सम्बन्धी परात्पर भावको जानकर जगत्के एकमात्र स्वामी (भगवान् शंकर)—की अपने मस्तकपर हाथोंकी अंजलि बाँधकर स्तुति की ॥ ४१-४२ ॥
ज्ञात्वा परतरं भावमैश्वरं ज्ञानचक्षुषा ।<br>तुष्टाव जगतामेकं कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम् ॥ ४२ ॥
ब्रह्मोवाच<br>नमस्तेऽस्तु महादेव नमस्ते परमेश्वर ।<br>नमः शिवाय देवाय नमस्ते ब्रह्मरूपिणे ॥ ४३ ॥<br><br>नमोऽस्तु ते महेशाय नमः शान्ताय हेतवे ।<br>प्रधानपुरुषेशाय योगाधिपतये नमः ॥ ४४ ॥<br><br>नमः कालाय रुद्राय महाग्रासाय शूलिने ।<br>नमः पिनाकहस्ताय त्रिनेत्राय नमो नमः ॥ ४५ ॥<br><br>नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं ब्रह्मणो जनकाय ते ।<br>ब्रह्मविद्याधिपतये ब्रह्मविद्याप्रदायिने ॥ ४६ ॥ब्रह्माने कहा—महादेव! आपको नमस्कार है। परमेश्वर! आपको नमस्कार है। शिवको नमस्कार है। ब्रह्मरूपी देवको नमस्कार है। महेश! आपको नमस्कार है। शान्तिके मूलहेतु! आपको नमस्कार है। प्रधान पुरुषेश! आपको नमस्कार है तथा योगाधिपति आपको नमस्कार है। काल, रुद्र, महाग्रास^२ तथा शूलीको नमस्कार है। हाथमें पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। तीन नेत्रवालेको बार-बार नमस्कार है। त्रिमूर्तिस्वरूप आपको नमस्कार है। ब्रह्माके उत्पत्तिकर्ता आपके लिये नमस्कार है। ब्रह्मविद्याके अधिपति और ब्रह्मविद्या प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ४३—४६ ॥

१-स्थाणु-ठूँठ। ठूँठकी ही तरह निष्क्रिय होनेसे शिवको स्थाणु कहा गया है।
२-महाप्रलयमें भगवान् शंकर समस्त प्राणियोंको अपनी गोदमें सुला लेते हैं—इसलिये महाग्रास कहे जाते हैं।

  • अध्याय १० * ६३
नमो वेदरहस्याय कालकालाय ते नमः।<br>वेदान्तसारसाराय नमो वेदात्ममूर्तये ॥ ४७ ॥<br><br>नमो बुद्धाय शुद्धाय योगिनां गुरवे नमः।<br>प्रहीणशोकैर्विविधैर्भूतैः परिवृताय ते ॥ ४८ ॥<br><br>नमो ब्रह्मण्यदेवाय ब्रह्माधिपतये नमः।<br>त्रियम्बकाय देवाय नमस्ते परमेष्ठिने ॥ ४९ ॥वेदोंके रहस्यरूपको नमस्कार है। कालके भी काल आपको नमस्कार है। वेदान्तसारके भी सारको नमस्कार है। वेदात्ममूर्तिको नमस्कार है। शुद्ध-बुद्धस्वरूपको नमस्कार है। योगियोंके गुरुको नमस्कार है। शोकोंसे रहित विविध भूतोंसे घिरे हुए आपको नमस्कार है। ब्रह्मण्यदेवको नमस्कार है। ब्रह्माधिपतिके लिये नमस्कार है। त्रिलोचन परमेष्ठी देवको नमस्कार है ॥ ४७–४९ ॥
नमो दिग्वाससे तुभ्यं नमो मुण्डाय दण्डिने।<br>अनादिमलहीनाय ज्ञानगम्याय ते नमः ॥ ५० ॥<br><br>नमस्ताराय तीर्थाय नमो योगर्द्धिहेतवे।<br>नमो धर्माधिगम्याय योगगम्याय ते नमः ॥ ५१ ॥<br><br>नमस्ते निष्प्रपञ्चाय निराभासाय ते नमः।<br>ब्रह्मणे विश्वरूपाय नमस्ते परमात्मने ॥ ५२ ॥दिगम्बर ! आपको नमस्कार है। मुण्ड (की माला) एवं दण्ड धारण करनेवालेको नमस्कार है। अनादि तथा मलरहित (शुद्धरूप), ज्ञानगम्य आपको नमस्कार है। तारक एवं तीर्थरूप तथा योगविभूतियोंके मूल कारणको नमस्कार है। धर्म (धर्माचरण)-के द्वारा प्राप्य, योगगम्य आपको नमस्कार है। निष्प्रपञ्चको नमस्कार है। निराभास ! आपको नमस्कार है। विश्वरूप ब्रह्म परमात्माको नमस्कार है ॥ ५०–५२ ॥
त्वयैव सृष्टमखिलं त्वय्येव सकलं स्थितम्।<br>त्वया संह्रियते विश्वं प्रधानाद्यं जगन्मय ॥ ५३ ॥<br><br>त्वमीश्वरो महादेवः परं ब्रह्म महेश्वरः।<br>परमेष्ठी शिवः शान्तः पुरुषो निष्कलो हरः ॥ ५४ ॥<br><br>त्वमक्षरं परं ज्योतिस्त्वं कालः परमेश्वरः।<br>त्वमेव पुरुषोऽनन्तः प्रधानं प्रकृतिस्तथा ॥ ५५ ॥जगन्मय ! आपके द्वारा ही यह सम्पूर्ण (जगत्) रचा गया है, आपमें ही यह सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है और आप ही प्रधानादि समस्त विश्वका संहार करते हैं। आप ईश्वर, महादेव, परब्रह्म, महेश्वर, परमेष्ठी, शिव, शान्त, पुरुष, निष्कल तथा हर हैं। आप अक्षर, परम ज्योति हैं, आप काल तथा परमेश्वर हैं और आप ही प्रधान पुरुष, प्रकृति तथा अनन्त हैं ॥ ५३–५५ ॥
भूमिरापोऽनलो वायुर्व्योमाहंकार एव च।<br>यस्य रूपं नमस्यामि भवन्तं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ५६ ॥<br><br>यस्य द्यौर्भवन्मूर्धा पादौ पृथ्वी दिशो भुजाः।<br>आकाशमुदरं तस्मै विराजे प्रणमाम्यहम् ॥ ५७ ॥<br>संतापयति यो विश्वं स्वभाभिर्भासयन् दिशः।<br>ब्रह्मतेजोमयं नित्यं तस्मै सूर्यात्मने नमः ॥ ५८ ॥<br><br>हव्यं वहति यो नित्यं रौद्री तेजोमयी तनुः।<br>कव्यं पितृगणानां च तस्मै वह्नयात्मने नमः ॥ ५९ ॥<br><br>आप्यायति यो नित्यं स्वधाम्ना सकलं जगत्।<br>पीयते देवतासंघैस्तस्मै सोमात्मने नमः ॥ ६० ॥भूमि, जल, वायु, अग्नि, आकाश एवं अहंकार—ये जिसके रूप हैं, उन ब्रह्मसंज्ञक आपको नमस्कार करता हूँ। द्युलोक जिनका मस्तक है, पृथ्वी पैर है, दिशाएँ जिनकी भुजाएँ हैं और आकाश जिनका उदर है, उन विराट् पुरुषको मेरा प्रणाम है। जो अपने प्रकाशसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करते हुए विश्वको अपेक्षित उष्णता प्रदान करते हैं, उन नित्य ब्रह्म तेजोमय सूर्यरूपको नमस्कार है। जो अपने रौद्र तेजोमय शरीरसे (देवताओंको) हव्य तथा पितरोंको कव्य पहुँचाते हैं, उन अग्निस্বরূপ (देव)-को नमस्कार है। जो अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत्‌को नित्य संतृप्त करते हैं और देवतासमूहके द्वारा जिनका पान किया जाता है, उन सोमरूप चन्द्रदेवको नमस्कार है ॥ ५६–६० ॥
बिभर्त्यशेषभूतानि योऽन्तश्चरति सर्वदा।<br>शक्तिर्माहेश्वरी तुभ्यं तस्मै वाय्वात्मने नमः ॥ ६१ ॥जो सम्पूर्ण प्राणियोंका भरण-पोषण करती है और जो (सभी प्राणियोंके) भीतर सदा विचरण करती है, ऐसी वायुरूपात्मक माहेश्वरीशक्ति आपको नमस्कार है ॥ ६१ ॥

६४ * कूर्मपुराण *


सृजत्यशेषमेवेदं यः स्वकर्मानुरूपतः।<br>स्वात्मन्यवस्थितस्तस्मै चतुर्वक्त्रात्मने नमः॥ ६२॥जो प्राणियोंके अपने-अपने कर्मोंके अनुसार इस सम्पूर्ण (जगत्)-की सृष्टि करते हैं, उन अपनी आत्मामें प्रतिष्ठित चतुर्मुखात्मक (ब्रह्मा)-को नमस्कार है।
यः शेषशयने शेते विश्वमावृत्य मायया।<br>स्वात्मानुभूतियोगेन तस्मै विश्वात्मने नमः॥ ६३॥जो अपने आत्मामें प्रतिष्ठित अनुभूतिरूप योगसे (प्रेरित) मायाद्वारा सम्पूर्ण विश्वको आवृतकर शेष (शेषनाग)-की शय्यापर शयन करते हैं, उन विश्वात्माको नमस्कार है।
बिभर्ति शिरसा नित्यं द्विसप्तभुवनात्मकम्।<br>ब्रह्माण्डं योऽखिलाधारस्तस्मै शेषात्मने नमः॥ ६४॥जो चौदह भुवनोंवाले ब्रह्माण्डको नित्य अपने सिरपर धारण किये रहते हैं और जो सभीके आश्रय हैं, उन शेषात्माको नमस्कार है॥ ६२-६४॥
यः परान्ते परानन्दं पीत्वा दिव्यैकसाक्षिकम्।<br>नृत्यत्यनन्तमहिमा तस्मै रुद्रात्मने नमः॥ ६५॥जो महाप्रलयकालमें दिव्य एवं एकमात्र साक्षीरूप परमानन्दका आस्वादन करते हुए नृत्य करते हैं, उन अनन्त महिमावाले रुद्रात्माको नमस्कार है।
योऽन्तरा सर्वभूतानां नियन्ता तिष्ठतीश्वरः।<br>तं सर्वसाक्षिणं देवं नमस्ये भवतस्तनुम्॥ ६६॥जो ईश्वर सभी प्राणियोंके भीतर नियन्ताके रूपमें प्रतिष्ठित रहते हैं, उन सर्वसाक्षी देव और उनके शरीररूप (देव)-को मैं नमस्कार करता हूँ।
यं विनिद्रा जितश्वासाः संतुष्टाः समदर्शिनः।<br>ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः॥ ६७॥निद्रारहित, श्वासको जीतनेवाले, संतुष्ट तथा समदर्शी (योगीजन समाधिमें) जिस ज्योति या प्रकाशका दर्शन करते हैं, उन योगात्माको नमस्कार है।
यया संतरते मायां योगी संक्षीणकल्मषः।<br>अपारतरपर्यन्तां तस्मै विद्यात्मने नमः॥ ६८॥जिस (विद्या)-के द्वारा पुण्यात्मा योगीजन अत्यन्त कठिनतासे पार की जा सकनेवाली मायाको सरलतासे पार कर लेते हैं, उस विद्यास्वरूप (देव)-को नमस्कार है।
यस्य भासा विभातीदमद्वयं तमसः परम्।<br>प्रपद्ये तत् परं तत्त्वं तद्रूपं परमेश्वरम्॥ ६९॥जिसके प्रकाशसे यह (विश्व) प्रकाशित होता है, मैं (उस) अन्धकारसे सर्वथा रहित अर्थात् प्रकाशस्वरूप और अद्वितीय परम तत्त्व-स्वरूप (तद्रूप परम-तत्त्व मात्र ही जिनका स्वरूप है, उन) परमेश्वरकी शरण ग्रहण करता हूँ।
नित्यानन्दं निराधारं निष्कलं परमं शिवम्।<br>प्रपद्ये परमात्मानं भवन्तं परमेश्वरम्॥ ७०॥मैं नित्यानन्दस्वरूप, निराधार, निष्कल परमात्मा, परमेश्वर आप परम शिवकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ६५-७०॥
एवं स्तुत्वा महादेवं ब्रह्मा तद्भावभावितः।<br>प्राञ्जलिः प्रणतस्तस्थौ गृणन् ब्रह्म सनातनम्॥ ७१॥इस प्रकार महादेवकी स्तुतिकर ब्रह्मा उनकी भावनासे भावित होकर सनातन ब्रह्मको सम्बोधित करते हुए विनयपूर्वक हाथ जोड़े हुए खड़े हो गये॥ ७१॥
ततस्तस्मै महादेवो दिव्यं योगमनुत्तमम्।<br>ऐश्वर्यं ब्रह्मसद्भावं वैराग्यं च ददौ हरः॥ ७२॥तदनन्तर महादेव हरने उन्हें सर्वश्रेष्ठ दिव्य योग (ज्ञान), ऐश्वर्य, ब्रह्मकी सद्भावना (ब्रह्मविषयक उत्तम भाव) तथा वैराग्य प्रदान किया।
कराभ्यां सुशुभाभ्यां च संस्पृश्य प्रणतार्तिहा।<br>व्याजहार स्वयं देवः सोऽनुगृह्य पितामहम्॥ ७३॥शरणागतोंका कष्ट हरनेवाले उन (शंकर) देवने स्वयं अपने मनोरम एवं कल्याणकारी हाथोंके द्वारा उनका (ब्रह्माका) स्पर्श किया और उनपर अनुग्रह करके वे बोले-॥ ७२-७३॥

* अध्याय १० *

६५


यत्त्वयाभ्यर्थितं ब्रह्मन् पुत्रत्वे भवतो मम।<br>कृतं मया तत् सकलं सृजस्व विविधं जगत्॥ ७४॥<br><br>त्रिधा भिन्नोऽस्म्यहं ब्रह्मन् ब्रह्मविष्णुहराख्यया।<br>सर्गरक्षालयगुणैर्निष्कलः परमेश्वरः॥ ७५॥<br><br>स त्वं ममाग्रजः पुत्रः सृष्टिहेतोर्विनिर्मितः।<br>ममैव दक्षिणादङ्गाद् वामाङ्गात् पुरुषोत्तमः॥ ७६॥<br><br>तस्य देवादिदेवस्य शम्भोर्हृदयदेशतः।<br>सम्बभूवाथ रुद्रोऽसावहं तस्यापरा तनुः॥ ७७॥<br><br>ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्मन् सर्गस्थित्यन्तहेतवः।<br>विभज्यात्मानमेकोऽपि स्वेच्छया शंकरः स्थितः॥ ७८॥ब्रह्मन्! जो आपने 'मेरा पुत्र बनें' इस प्रकारसे मुझसे प्रार्थना की थी, मैंने उसे (रुद्ररूपमें उत्पन्न होकर) पूर्ण कर दिया। (अब आप) विविध प्रकारके जगत्की सृष्टि करें। ब्रह्मन्! मैं ही निष्कल परमेश्वर सृष्टि, रक्षा एवं प्रलय—इन तीन गुणोंसे भावित होकर ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव—इन नामोंसे तीन रूपोंमें विभक्त हूँ। आप मेरे ज्येष्ठ पुत्र हैं और सृष्टिकी रचनाके लिये मेरे ही दाहिने अङ्गसे आप बनाये गये हैं। मेरे ही बायें अङ्गसे पुरुषोत्तम विष्णु उत्पन्न हैं। उन्हीं देवोंमें आदिदेव शम्भुके हृदयप्रदेशसे मैं ही रुद्ररूपमें प्रादुर्भूत हूँ और उन्हींकी अपर मूर्ति हूँ। हे ब्रह्मन्! ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव (क्रमशः) सृष्टि, स्थिति तथा संहारके हेतु हैं। एक होते हुए भी वे शंकर अपनी इच्छासे अपनेको (तीन रूपोंमें) विभक्तकर स्थित रहते हैं॥ ७४–७८॥
तथान्यानि च रूपाणि मम मायाकृतानि तु।<br>निरूपः केवलः स्वच्छो महादेवः स्वभावतः॥ ७९॥इसी प्रकार अन्य भी जो रूप हैं, वे सब मेरी मायाद्वारा ही निर्मित हैं। स्वरूपतः महादेव स्वच्छ, रूपरहित एवं अद्वितीय हैं॥ ७९॥
एभ्यः परतरो देवस्त्रिमूर्तिः परमा तनुः।<br>माहेश्वरी त्रिनयना योगिनां शान्तिदा सदा॥ ८०॥वे देव इन त्रिमूर्तियों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश)-से उत्कृष्ट एवं श्रेष्ठ शरीरवाले हैं। तीन नेत्रोंवाली वह माहेश्वरी मूर्ति योगियोंको सदा शान्ति प्रदान करनेवाली है॥ ८०॥
तस्या एव परां मूर्ति मामवेहि पितामह।<br>शाश्वतैश्वर्यविज्ञानतेजोयोगसमन्विताम् ॥ ८१॥<br><br>सोऽहं ग्रसामि सकलमधिष्ठाय तमोगुणम्।<br>कालो भूत्वा न तमसा मामन्योऽभिभविष्यति॥ ८२॥<br><br>यदा यदा हि मां नित्यं विचिन्तयसि पद्मज।<br>तदा तदा मे सांनिध्यं भविष्यति तवानघ॥ ८३॥पितामह! मुझे सनातन ऐश्वर्य, विज्ञान, तेज एवं योगसे समन्वित उनकी वही परा मूर्ति समझो। वही मैं कालरूप होकर तमोगुणका आश्रय लेकर समस्त विश्वको ग्रस्त कर लेता हूँ, कोई दूसरा तमद्वारा मुझे अभिभूत नहीं कर सकता। निष्पाप कमलोद्भव! जब-जब मुझ सनातनका तुम ध्यान करोगे, तब-तब तुम मेरी समीपता प्राप्त करोगे॥ ८१–८३॥
एतावदुक्त्वा ब्रह्माणं सोऽभिवन्द्य गुरुं हरः।<br>सहैव मानसैः पुत्रैः क्षणादन्तरधीयत॥ ८४॥इतना कहकर गुरु (पिता) ब्रह्माकी वन्दना करके वे हर (महेश्वर) मानस पुत्रोंके साथ क्षणभरमें ही अन्तर्धान हो गये॥ ८४॥
सोऽपि योगं समास्थाय ससर्ज विविधं जगत्।<br>नारायणाख्यो भगवान् यथापूर्वं प्रजापतिः॥ ८५॥<br><br>मरीचिभृग्वङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।<br>दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजद् योगविद्यया॥ ८६॥<br><br>नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः।<br>सर्वे ते ब्रह्मणा तुल्याः साधका ब्रह्मवादिनः॥ ८७॥नारायण नामवाले उन भगवान्ने योगका अवलम्बन कर प्रजापतिने जैसी सृष्टि पूर्वमें की थी, वैसी ही विविध प्रकारके जगत्की सृष्टि की। योगविद्यासे उन्होंने मरीचि, भृगु, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठको उत्पन्न किया। पुराणोंके अनुसार यह निश्चित है कि ये नौ ब्रह्माण कहलाते हैं। ये सभी ब्रह्माके समान हैं, साधक हैं और ब्रह्मवादी हैं॥ ८५–८७॥
६६* कूर्मपुराण *
संकल्पं चैव धर्मं च युगधर्मांश्च शाश्वतान्।<br>स्थानाभिमानिनः सर्वान् यथा ते कथितं पुरा॥ ८८॥जैसा पहले बताया गया था तदनुसार संकल्प, धर्म, सनातन युगधर्म तथा सभी स्थानाभिमानी (देवताओं)- का वर्णन तुम्हें सुनाया गया॥ ८८॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे दशमोऽध्यायः॥ १०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १०॥


ग्यारहवाँ अध्याय

सती और पार्वतीका आविर्भाव, देवी-माहात्म्य, हैमवती-माहात्म्य, देवीका अष्टोत्तरसहस्रनामस्तोत्र, हिमवान्द्वारा देवीकी स्तुति एवं हिमवान्को देवीद्वारा उपदेश, देवीसहस्रनामस्तोत्र-जपका माहात्म्य

श्रीकूर्म उवाच
एवं सृष्ट्वा मरीच्यादीन् देवदेवः पितामहः।<br>सहैव मानसैः पुत्रैस्तताप परमं तपः॥ १॥श्रीकूर्मने कहा—इस प्रकार मरीचि आदिकी सृष्टि करके देवोंके देव पितामह (ब्रह्मा अपने) मानस पुत्रोंके साथ परम तप करने लगे॥ १॥
तस्यैवं तपतो वक्त्राद् रुद्रः कालाग्निसंनिभः।<br>त्रिशूलपाणिरीशानः प्रादुरासीत् त्रिलोचनः॥ २॥<br><br>अर्धनारीनरवपुः दुष्प्रेक्ष्योऽतिभयंकरः।<br>विभजात्मानमित्युक्त्वा ब्रह्मा चान्तर्दधे भयात्॥ ३॥इस प्रकार तप करते हुए उनके मुखसे कालाग्निके समान अति भयंकर, हाथमें त्रिशूल धारण किये, कठिनतासे देखे जाने योग्य, अर्धनारीश्वरका शरीर धारण किये हुए, त्रिलोचन ईशान रुद्र प्रकट हुए। 'अपना विभाग करो' ऐसा कहकर ब्रह्मा भयसे अन्तर्धान हो गये॥ २-३॥
तथोक्तोऽसौ द्विधा स्त्रीत्वं पुरुषत्वमथाकरोत्।<br>बिभेद पुरुषत्वं च दशधा चैकधा पुनः॥ ४॥(ब्रह्माके द्वारा) ऐसा कहे जानेपर उन्होंने स्त्री तथा पुरुषरूपसे दो भाग कर दिये। पुनः पुरुषभागको दस और एक—इस प्रकार ग्यारह भागोंमें बाँट दिया। ये ग्यारह रुद्र त्रिभुवनेश्वर कहलाते हैं। ब्राह्मणो! कपाली-ईश आदि ये सभी एकादश रुद्र देवताओंके कार्यमें नियोजित हैं॥ ४-५॥
एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः।<br>कपालीशादयो विप्रा देवकार्ये नियोजिताः॥ ५॥
सौम्यासौम्यैस्तथा शान्ताशान्तैः स्त्रीत्वं च स प्रभुः।<br>बिभेद बहुधा देवः स्वरूपैरसितैः सितैः॥ ६॥<br><br>ता वै विभूतयो विप्रा विश्रुताः शक्तयो भुवि।<br>लक्ष्मादयो याभिरीशा विश्वं व्याप्नोति शांकरी॥ ७॥उन प्रभु देवने सौम्य और रौद्र, शान्त और अशान्त तथा श्वेत और कृष्णरूपोंसे स्त्रीभागको भी अनेक रूपोंमें विभक्त किया। हे विप्रो! ये ही विभूतियाँ शक्तियोंके रूपमें लक्ष्मी आदि नामोंसे संसारमें विख्यात हैं। शंकरकी शक्ति ईशा इन्हींके द्वारा विश्वमें व्याप्त है॥ ६-७॥
विभज्य पुनरीशानी स्वात्मानं शंकराद् विभोः।<br>महादेवनियोगेन पितामहमुपस्थिता॥ ८॥<br><br>तामाह भगवान् ब्रह्मा दक्षस्य दुहिता भव।<br>सापि तस्य नियोगेन प्रादुरासीत् प्रजापतेः॥ ९॥पुनः ईशानी (ईशा) अपनेको विभु शंकरसे विभक्तकर महादेवके निर्देशसे वे पितामहके पास गयीं। भगवान् ब्रह्माने इनसे कहा—'दक्षकी पुत्री बनो।' ये भी उनके आदेशसे दक्ष प्रजापतिके यहाँ उत्पन्न हुईं (इन्हींका नाम सती है)॥ ८-९॥
* अध्याय ११ *६७
नियोगाद् ब्रह्मणो देवीं ददौ रुद्राय तां सतीम्।<br>दक्षाद् रुद्रोऽपि जग्राह स्वकीयामेव शूलभृत्॥ १०॥(दक्षने) ब्रह्माकी आज्ञासे इन सतीदेवीको रुद्रको प्रदान कर दिया। त्रिशूलधारी रुद्रने भी दक्षसे अपनी ही शक्तिको ग्रहण किया॥ १०॥
प्रजापतिं विनिन्द्यैषा कालेन परमेश्वरी।<br>मेनायामभवत् पुत्री तदा हिमवतः सती॥ ११॥कालान्तरमें (यज्ञमें अपने आराध्य शिवका भाग न देखकर) दक्ष प्रजापतिकी निन्दा कर (तथा अपने शरीरका परित्याग कर) वे परमेश्वरी सती पुनः हिमवान्‌से मेनाकी पुत्री (पार्वती) बनीं। पर्वतश्रेष्ठ हिमवान्‌ने भी पार्वतीको
स चापि पर्वतवरो ददौ रुद्राय पार्वतीम्।<br>हिताय सर्वदेवानां त्रिलोकस्यात्मनोऽपि च॥ १२॥सभी देवताओं, तीनों लोकों तथा स्वयं अपने भी कल्याणके लिये रुद्रको समर्पित कर दिया॥ ११-१२॥
सैषा माहेश्वरी देवी शंकरार्धशरीरिणी।<br>शिवा सती हैमवती सुरासुरनमस्कृता॥ १३॥ये ही शंकरके आधे शरीरमें स्थित रहनेवाली माहेश्वरी देवी शिवा, सती तथा हैमवतीके रूपमें देवताओं एवं असुरोंद्वारा पूजित हैं। इन्द्रसहित सभी
तस्याः प्रभावमतुलं सर्वे देवाः सवासवाः।<br>विदन्ति मुनयो वेत्ति शंकरो वा स्वयं हरिः॥ १४॥देवता, मुनि, शंकर अथवा स्वयं हरि इनके अतुल प्रभावको जानते हैं॥ १३-१४॥
एतद् वः कथितं विप्राः पुत्रत्वं परमेष्ठिनः।<br>ब्रह्मणः पद्मयोनित्वं शंकरस्यामितौजसः॥ १५॥हे विप्रो! इस प्रकार मैंने आप लोगोंसे अमित तेजस्वी शंकरके पुत्रत्व (पुत्र होनेका) और परमेष्ठी ब्रह्माके पद्मयोनित्व (पद्मयोनि होने)-का वर्णन किया॥ १५॥
सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्याथ मुनयः कूर्मरूपेण भाषितम्।<br>विष्णुना पुनरेवैनं पप्रच्छुः प्रणता हरिम्॥ १६॥सूत बोले— कूर्मरूप धारण किये हुए विष्णुके इस कथनको सुनकर मुनियोंने पुनः हरि (कूर्मरूपधारी विष्णु)-को प्रणाम करते हुए उनसे इस प्रकार पूछा—॥ १६॥
ऋषय ऊचुः<br>कैषा भगवती देवी शंकरार्धशरीरिणी।<br>शिवा सती हैमवती यथावद् ब्रूहि पृच्छताम्॥ १७॥ऋषियोंने कहा— (भगवन्!) शंकरके आधे शरीररूपसे प्रतिष्ठित शिवा, सती तथा हैमवती (इत्यादि नामवाली) ये देवी भगवती कौन हैं? हम सभी पूछनेवालोंको आप यथार्थरूपमें बतलायें। उन मुनियोंके इस वचनको
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा मुनीनां पुरुषोत्तमः।<br>प्रत्युवाच महायोगी ध्यात्वा स्वं परमं पदम्॥ १८॥सुनकर पुरुषोंमें उत्तम महायोगी (विष्णु)-ने अपने परम पदका ध्यान करके उन्हें बताया—॥ १७-१८॥
श्रीकूर्म उवाच<br>पुरा पितामहेनोक्तं मेरुपृष्ठे सुशोभनम्।<br>रहस्यमेतद् विज्ञानं गोपनीयं विशेषतः॥ १९॥श्रीकूर्म बोले— प्राचीन कालमें अत्यन्त रमणीय मेरु गिरिके पृष्ठपर (बैठकर) पितामह (ब्रह्मा)-ने यह रहस्यपूर्ण ज्ञान कहा था। यह विशेषरूपसे गोपनीय है। सांख्यशास्त्रके तत्त्वज्ञोंके लिये यह परम सांख्य (तत्त्वज्ञान)
सांख्यानां परमं सांख्यं ब्रह्मविज्ञानमुत्तमम्।<br>संसारार्णवमग्नानां जन्तूनामेकमोचनम्॥ २०॥एवं उत्तम ब्रह्मज्ञान है। यह संसार-सागरमें निमग्न प्राणियोंकी मुक्तिका एकमात्र साधन है॥ १९-२०॥
या सा माहेश्वरी शक्तिर्ज्ञानरूपातिलालसा।<br>व्योमसंज्ञा परा काष्ठा सेयं हैमवती मता॥ २१॥(महेश्वरकी) जो ज्ञानरूप, उत्कृष्ट इच्छारूप, व्योम नामवाली तथा पराकाष्ठारूप (अन्तिम प्राप्तव्य) वह माहेश्वरी शक्ति है, ये वही हैमवती कही जाती हैं।
शिवा सर्वगतानन्ता गुणातीता सुनिष्कला।<br>एकानेकविभागस्था ज्ञानरूपातिलालसा॥ २२॥(ये हैमवती शक्ति) कल्याण करनेवाली, सर्वत्र व्याप्त, अनन्त, गुणातीत, नितान्त भेदशून्य, अद्वितीय तथा अनेक रूपोंमें स्थित रहनेवाली, ज्ञानरूप, परम इच्छारूप।

६८ * कूर्मपुराण *


अनन्या निष्कले तत्त्वे संस्थिता तस्य तेजसा।
स्वाभाविकी च तन्मूला प्रभा भानोरिवामला॥ २३॥

एका माहेश्वरी शक्तिरनेकोपाधियोगतः।
परावरेण रूपेण क्रीडते तस्य संनिधौ॥ २४॥

सेयं करोति सकलं तस्याः कार्यमिदं जगत्।
न कार्यं नापि करणमीश्वरस्येति सूरयः॥ २५॥

चतस्रः शक्तयो देव्याः स्वरूपत्वेन संस्थिताः।
अधिष्ठानवशात् तस्याः शृणुध्वं मुनिपुंगवाः॥ २६॥

शान्तिर्विद्या प्रतिष्ठा च निवृत्तिश्चेति ताः स्मृताः।
चतुर्व्यूहस्ततो देवः प्रोच्यते परमेश्वरः॥ २७॥

अनया परया देवः स्वात्मानन्दं समश्नुते।
चतुर्ष्वपि च वेदेषु चतुर्मूर्तिर्महेश्वरः॥ २८॥

अस्यास्त्वनादिसंसिद्धमैश्वर्यमतुलं महत्।
तत्सम्बन्धादनन्ताया रुद्रेण परमात्मना॥ २९॥

सैषा सर्वेश्वरी देवी सर्वभूतप्रवर्तिका।
प्रोच्यते भगवान् कालो हरिः प्राणो महेश्वरः॥ ३०॥

तत्र सर्वमिदं प्रोतमोतं चैवाखिलं जगत्।
स कालोऽग्निर्हरो रुद्रो गीयते वेदवादिभिः॥ ३१॥

कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः।
सर्वे कालस्य वशगा न कालः कस्यचिद् वशे॥ ३२॥

प्रधानं पुरुषस्तत्त्वं महानात्मा त्वहंकृतिः।
कालेनान्यानि तत्त्वानि समाविष्टानि योगिना॥ ३३॥

तस्य सर्वजगत्सूतिः शक्तिर्मायेति विश्रुता।
तयेदं भ्रामयेदीशो मायावी पुरुषोत्तमः॥ ३४॥

सैषा मायात्मिका शक्तिः सर्वाकारा सनातनी।
वैश्वरूप्यं महेशस्य सर्वदा सम्प्रकाशयेत्॥ ३५॥


अनन्य तथा उन (शिव)-के तेजसे निष्कल तत्त्वमें प्रतिष्ठित रहनेवाली, सूर्यकी प्रभाके सदृश स्वच्छ तथा उनके आश्रित एवं स्वभावतः प्रवृत्त होनेवाली हैं। वह एक ही माहेश्वरी शक्ति अनेक उपाधियों (नाम-रूपों)-के संयोगसे उत्तम तथा निम्न रूपसे उन (शिव)-के समीप क्रीडा करती रहती हैं। वे ही यह सम्पूर्ण (सृष्टि इत्यादिका) कार्य करती हैं। यह जगत् उन्हींका कार्य है। ईश्वरका न कोई कार्य है और न कोई करण (साधन) ही होता है—ऐसा विद्वानोंका मत है॥ २१-२५॥

हे श्रेष्ठ मुनियो! उन देवीकी अधिष्ठान (आश्रय)-भेदसे अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित चार शक्तियाँ हैं, उन्हें आप सुनें॥ २६॥

उन शक्तियोंको शान्ति, विद्या, प्रतिष्ठा तथा निवृत्ति—इस प्रकारसे कहा गया है और इसीलिये (अर्थात् इन चारों शक्तियोंसे सम्पन्न होनेके कारण) परमेश्वर देवको भी चतुर्व्यूहात्मक¹ कहा जाता है। इस पराशक्तिके द्वारा देव (महेश्वर) स्वात्मानन्दका उपभोग करते हैं। चारों ही वेदोंमें चतुर्मूर्ति महेश्वर वर्णित हैं॥ २७-२८॥

उन रुद्र परमात्माके सम्बन्धसे इस अनन्ता (शक्ति)-का महान् अतुलनीय ऐश्वर्य सिद्ध है। वे ही ये सर्वेश्वरी देवी सभी प्राणियोंको प्रवर्तित करती हैं। भगवान् काल, हरि, प्राण तथा महेश्वर कहे जाते हैं॥ २९-३०॥

उनमें ही यह सम्पूर्ण जगत् ओतप्रोत है। वेदवादियों (वैदिकों)-के द्वारा वे ही काल, अग्नि, हर तथा रुद्र-रूपमें गाये जाते हैं। काल सभी प्राणियोंकी सृष्टि करता है, काल ही प्रजाओंका संहार करता है। सभी कालके वशीभूत हैं और काल किसीके वशमें नहीं है। (वह काल ही) प्रधान, पुरुष, तत्त्व, महान्, आत्मा तथा अहंकार है। योगी² कालमें ही अन्य सभी तत्त्व समाविष्ट हैं॥ ३१-३३॥

सम्पूर्ण जगत्को उनकी (ईशकी) संतान और उनकी शक्तिको माया कहा गया है। मायावी पुरुषोत्तम ईश उस (माया)-के द्वारा ही इस (जगत्)-को भ्रमित (मोहित) करते हैं। वही यह सर्वाकारा, सनातनी मायात्मिका शक्ति महेशके विश्वरूपत्वको सदा प्रकाशित करती रहती है॥ ३४-३५॥


१-व्यूहका अर्थ शक्ति है।
२-कालमें सभी प्रकारका सामर्थ्य है, इसलिये कालको योगी कहा गया है।

* अध्याय ११ *६९
अन्याश्च शक्तयो मुख्यास्तस्य देवस्य निर्मिताः ।<br>ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिः प्राणशक्तिरिति त्रयम् ॥ ३६ ॥<br><br>सर्वासांमेव शक्तीनां शक्तिमन्तो विनिर्मिताः ।<br>माययैवाथ विप्रेन्द्राः सा चानादिरननतया ॥ ३७ ॥<br><br>सर्वशक्त्यात्मिका माया दुर्नि वारा दुरत्यया ।<br>मायावी सर्वशक्तीशः कालः कालकरः प्रभुः ॥ ३८ ॥उन देवके द्वारा निर्मित ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति तथा प्राणशक्ति—ये तीन अन्य मुख्य शक्तियाँ हैं। विप्रेन्द्रो! अनन्त मायाके द्वारा ही सभी शक्तियोंसे युक्त शक्तिमानोंका निर्माण हुआ है, किंतु वह (माया) अनादि है। सभी शक्तियोंकी आत्मरूप वह माया बड़ी कठिनतासे निवारण करने योग्य और बड़े ही कष्टसे पार करने योग्य है। सभी शक्तियोंके स्वामी मायावी प्रभु स्वयं काल हैं और कालको भी उत्पन्न करनेवाले हैं॥ ३६—३८॥
करोति कालः सकलं संहरेत् काल एव हि ।<br>कालः स्थापयते विश्वं कालाधीनमिदं जगत् ॥ ३९ ॥काल ही सब कुछ (उत्पन्न) करता है और काल ही (सबका) संहार करता है। विश्वकी स्थापना काल करता है और कालके ही अधीन यह सारा जगत् है॥ ३९॥
लब्ध्वा देवाधिदेवस्य संनिधिं परमेष्ठिनः ।<br>अनन्तस्याखिलेशस्य शम्भोः कालात्मनः प्रभोः ॥ ४० ॥<br><br>प्रधानं पुरुषो माया माया चैवं प्रपद्यते ।<br>एका सर्वगतानन्ता केवला निष्कला शिवा ॥ ४१ ॥देवाधिदेव, परमेष्ठी, अनन्त और अखिल (विश्व)—के स्वामी कालात्मा प्रभु शम्भुका सांनिध्य प्राप्तकर वही माया शक्ति, प्रधान, पुरुष एवं माया नामकी शक्तिका रूप धारण करती है। वह शक्ति अद्वितीय सर्वत्र व्याप्त, अन्त-रहित, केवल, भेदशून्य और कल्याणकारिणी है॥ ४०-४१॥
एका शक्तिः शिवैकोऽपि शक्तिमानुच्यते शिवः ।<br>शक्तयः शक्तिमन्तोऽन्ये सर्वशक्तिसमुद्भवाः ॥ ४२ ॥<br><br>शक्तिशक्तिमतोर्भेदं वदन्ति परमार्थतः ।<br>अभेदं चानुपश्यन्ति योगिनस्तत्त्वचिन्तकाः ॥ ४३ ॥<br><br>शक्तयो गिरिजा देवी शक्तिमन्तोऽथ शंकरः ।<br>विशेषः कथ्यते चायं पुराणे ब्रह्मवादिभिः ॥ ४४ ॥शक्ति एक है और शिव भी एक हैं। शिव शक्तिमान् कहे जाते हैं। अन्य सभी शक्तियाँ तथा शक्तिमान् (इसी) शक्तिसे उत्पन्न हैं। शक्ति और शक्तिमान्में भेद कहा जाता है, किंतु तत्त्वका चिन्तन करनेवाले योगीजन (उनमें) परमार्थतः अभेदका ही दर्शन करते हैं। जितनी भी शक्तियाँ हैं वे गिरिजादेवी और जितने भी शक्तिमान् हैं वे शंकर हैं। ब्रह्मवादियोंके द्वारा पुराणमें इनके विषयमें विशेष (रूपसे) कहा जाता है॥ ४२—४४॥
भोग्या विश्वेश्वरी देवी महेश्वरपतिव्रता ।<br>प्रोच्यते भगवान् भोक्ता कपर्दी नीललोहितः ॥ ४५ ॥<br><br>मन्ता विश्वेश्वरो देवः शंकरो मन्मथान्तकः ।<br>प्रोच्यते मतिरीशानी मन्तव्या च विचारतः ॥ ४६ ॥महेश्वरकी पतिव्रता देवी विश्वेश्वरीको भोग्या और नीललोहित जटाधारी भगवान् (शंकर)—को भोक्ता कहा गया है। कामदेवका अन्त करनेवाले, विश्वके स्वामी देव शंकरको मनन करनेवाला मन्ता और ईशानीको मति एवं विचारद्वारा मानने योग्य (मन्तव्या) कहा गया है॥ ४५-४६॥
इत्येतदखिलं विप्राः शक्तिशक्तिमदुद्भवम् ।<br>प्रोच्यते सर्ववेदेषु मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ४७ ॥<br><br>एतत् प्रदर्शितं दिव्यं देव्या माहात्म्यमुत्तमम् ।<br>सर्ववेदान्तवेदेषु निश्चितं ब्रह्मवादिभिः ॥ ४८ ॥ब्राह्मणो! तत्त्वद्रष्टा मुनियोंके द्वारा सभी वेदोंमें यही कहा गया है कि यह सम्पूर्ण विश्व शक्ति एवं शक्तिमान्‌से प्रादुर्भूत है। इस प्रकार ब्रह्मवादियोंके द्वारा समस्त वेदान्त एवं वेदोंमें निश्चित किये गये देवीके दिव्य एवं उत्तम माहात्म्यका यह वर्णन किया गया॥ ४७-४८॥
एकं सर्वगतं सूक्ष्मं कूटस्थमचलं ध्रुवम् ।<br>योगिनस्तत् प्रपश्यन्ति महादेव्याः परं पदम् ॥ ४९ ॥महादेवीका जो सर्वव्यापक, सूक्ष्म, कूटस्थ, अचल तथा ध्रुव परम पद है, उसका योगी साक्षात्कार करते हैं॥ ४९॥
७०* कूर्मपुराण *

आनन्दमक्षरं ब्रह्म केवलं निष्कलं परम्।
योगिनस्तत् प्रपश्यन्ति महादेव्याः परं पदम्॥ ५०॥
परात्परतरं तत्त्वं शाश्वतं शिवमच्युतम्।
अनन्तप्रकृतौ लीनं देव्यास्तत् परमं पदम्॥ ५१॥
शुभं निरञ्जनं शुद्धं निर्गुणं द्वैतवर्जितम्।
आत्मोपलब्धिविषयं देव्यास्तत् परमं पदम्॥ ५२॥
सैषा धात्री विधात्री च परमानन्दमिच्छताम्।
संसारतापानखिलान् निहन्तीश्वरसंश्रया॥ ५३॥
तस्माद् विमुक्तिमन्विच्छन् पार्वतीं परमेश्वरीम्।
आश्रयेत् सर्वभावानामात्मभूतां शिवात्मिकाम्॥ ५४॥
लब्ध्वा च पुत्रीं शर्वाणीं तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्।
सभार्यः शरणं यातः पार्वतीं परमेश्वरीम्॥ ५५॥

तां दृष्ट्वा जायमानां च स्वेच्छयैव वराननाम्।
मेना हिमवतः पत्नी प्राहेदं पर्वतेश्वरम्॥ ५६॥

मेनोवाच

पश्य बालाममिमां राजन् राजीवसदृशाननाम्।
हिताय सर्वभूतानां जाता च तपसावयोः॥ ५७॥
सोऽपि दृष्ट्वा ततः पुत्रीं तरुणादित्यसंनिभाम्।
कपर्दिनीं चतुर्वक्त्रां त्रिनेत्रामतिलालसाम्॥ ५८॥

अष्टहस्तां विशालाक्षीं चन्द्रावयवभूषणाम्।
निर्गुणां सगुणां साक्षात् सदसद्व्यक्तिवर्जिताम्॥ ५९॥

प्रणम्य शिरसा भूमौ तेजसा चातिविह्वलः।
भीतः कृताञ्जलिस्तस्याः प्रोवाच परमेश्वरीम्॥ ६०॥

हिमवानुवाच

का त्वं देवि विशालाक्षि शशाङ्कावयवाङ्किते।
न जाने त्वामहं वत्से यथावद् ब्रूहि पृच्छते॥ ६१॥
गिरीन्द्रवचनं श्रुत्वा ततः सा परमेश्वरी।
व्याजहार महाशैलं योगिनामभयप्रदा॥ ६२॥

देव्युवाच

मां विद्धि परमां शक्तिं परमेश्वरसमाश्रयाम्।
अनन्यामव्ययामेकां यां पश्यन्ति मुमुक्षवः॥ ६३॥

महादेवीका जो आनन्दमय, अविनाशी, ब्रह्मरूप, अद्वितीय एवं भेदरहित परम पद है, योगी उसका दर्शन करते हैं। देवीका वह परम पद परसे भी परतर, तत्त्वरूप, सनातन, कल्याणकारी, अच्युत तथा अनन्त प्रकृतिमें लीन है। देवीका वह परम पद शुभ निरञ्जन, शुद्ध, निर्गुण, द्वैतरहित और आत्मज्ञानका विषय है। परम आनन्द चाहनेवालोंके लिये वे ही धात्री तथा विधात्री हैं। वे ईश्वरके आश्रयसे संसारके सारे पापोंका विनाश करती हैं। इसलिये मोक्षकी इच्छा करनेवालोंको चाहिये कि वे सभी भावोंकी आत्मस्वरूपा शिवात्मिका परमेश्वरी पार्वतीका आश्रय ग्रहण करें॥ ५०-५४॥

अत्यन्त कठोर तप करनेके अनन्तर शर्वाणी (शंकर-प्रिया)-को पुत्रीरूपमें प्राप्तकर (हिमवान् अपनी) भार्याके साथ परमेश्वरी पार्वतीकी शरणमें गये। अपनी इच्छासे उत्पन्न उस श्रेष्ठ मुखवालीको देखकर हिमवान्की पत्नी मेनाने गिरिराज हिमालयसे इस प्रकार कहा— ॥ ५५-५६॥

मेना बोलीं— राजन्! कमलके समान मुखवाली इस बालिकाको देखो। (यह) हम दोनोंकी तपस्या (-के प्रभाव)-से सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये उत्पन्न हुई है॥ ५७॥

तरुण सूर्यके समान (देदीप्यमान), जटायुक्त, चतुर्मुख, तीन नेत्रोंवाली, उत्कृष्ट इच्छास्वरूप, आठ हाथों और विशाल नेत्रोंवाली, चन्द्रमाकी कलाओंके आभूषण धारण की हुई, गुणातीत एवं गुणयुक्त तथा सत्-असत्के भावोंसे रहित साक्षात् देवीको पुत्रीरूपमें देखकर हिमवान्ने भूमिपर मस्तक लगाकर प्रणाम किया और उनके तेजसे अत्यन्त विह्वल तथा भयभीत होते हुए हाथ जोड़कर उन परमेश्वरीसे कहा— ॥ ५८-६०॥

हिमवान् बोले— विशाल नेत्रोंवाली तथा चन्द्रमाकी कलाओंसे सुशोभित देवि! आप कौन हैं? वत्से! मैं आपको नहीं जानता हूँ। मुझ पूछनेवालेको आप यथार्थरूपसे बतलायें॥ ६१॥

योगियोंको अभय प्रदान करनेवाली उस परमेश्वरीने गिरिराज (हिमालय)-का वचन सुनकर महाशैलसे कहा— ॥ ६२॥

देवी बोलीं— मोक्षकी इच्छा करनेवाले (मोक्षार्थी) जिस अनन्य, अविनाशी तथा अद्वितीय (शक्ति)-का दर्शन करते हैं, परमेश्वरके आश्रयमें रहनेवाली वही परम शक्ति मुझे समझो॥ ६३॥

* अध्याय ११ *७१
अहं वै सर्वभावानामात्मा सर्वान्तरा शिवा।<br>शाश्वतैश्वर्यविज्ञानमूर्तिः सर्वप्रवर्तिका॥ ६४॥मैं ही सभी पदार्थोंकी आत्मा, सभीके अंदर रहनेवाली, कल्याणकारिणी, सनातन ऐश्वर्य तथा विज्ञानकी मूर्ति और सभीको प्रवृत्त करनेवाली हूँ। मैं अनन्त और अनन्त महिमावाली तथा संसारसागरसे पार उतारनेवाली हूँ। मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करती हूँ, मेरे ऐश्वर्यमय रूपको देखो॥ ६४-६५॥
अनन्तानन्तमहिमा संसारार्णवतारिणी।<br>दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे रूपमैश्वरम्॥ ६५॥
एतावदुक्त्वा विज्ञानं दत्त्वा हिमवते स्वयम्।<br>स्वं रूपं दर्शयामास दिव्यं तत् पारमेश्वरम्॥ ६६॥इतना कहकर तथा हिमवान्‌को स्वयं विशिष्ट ज्ञान प्रदान कर (देवीने) अपना वह परमेश्वरमय दिव्य रूप दिखलाया॥ ६६॥
कोटिसूर्यप्रतीकाशं तेजोबिम्बं निराकुलम्।<br>ज्वालामालासहस्राढ्यं कालानलशतोपमम्॥ ६७॥(हिमवान्‌ने) करोड़ों सूर्यके समान (प्रकाशमान) तेजःपुञ्ज, स्थिर, हजारों ज्वालामालाओंसे युक्त, सैकड़ों कालाग्निके समान, भयंकर दाढ़ोंवाला, दुर्धर्ष, जटामण्डलोंसे मण्डित, हाथमें त्रिशूल और वरमुद्रा धारण किये, भयानक, घोर रूप एवं प्रशान्त, सौम्य मुखवाला, अनन्त आश्चर्योंसे युक्त, चन्द्रकलासे चिह्नित, करोड़ों चन्द्रमाओंकी आभावाला मुकुट धारण किये, हाथमें गदा लिये, नूपुरोंसे सुशोभित, दिव्य वस्त्र एवं माला धारण किये, दिव्य सुगन्धित अनुलेपन किये हुए, शङ्ख-चक्रधारी, कमनीय, तीन नेत्रवाले, चर्माम्बरधारी, ब्रह्माण्डके बाहर एवं भीतर (सर्वत्र) स्थित, बाहर तथा भीतर सर्वत्र श्रेष्ठ, सर्वशक्तिमय, शुभ्र, सभी आकारोंसे युक्त, सनातन, ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु और श्रेष्ठ योगियोंद्वारा वन्दित चरणकमलोंवाला, सभी ओर हाथ, पैर, आँख, सिर एवं मुखवाला और सभीको आवृत्त कर स्थित रहनेवाला (देवीका वह) परमेश्वर-रूप देखा॥ ६७-७३॥
दंष्ट्राकरालं दुर्धर्षं जटामण्डलमण्डितम्।<br>त्रिशूलवरहस्तं च घोररूपं भयानकम्॥ ६८॥
प्रशान्तं सौम्यवदनमनन्ताश्चर्यसंयुतम्।<br>चन्द्रावयवलक्ष्माणं चन्द्रकोटिसमप्रभम्॥ ६९॥
किरीटिनं गदाहस्तं नूपुरैरुपशोभितम्।<br>दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्॥ ७०॥
शङ्खचक्रधरं काम्यं त्रिनेत्रं कृत्तिवाससम्।<br>अण्डस्थं चाण्डबाह्यस्थं बाह्याभ्यन्तरं परम्॥ ७१॥
सर्वशक्तिमयं शुभ्रं सर्वाकारं सनातनम्।<br>ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रयोगीन्द्रैर्वन्द्यमानपदाम्बुजम् ॥ ७२॥
सर्वतः पाणिपादान्तं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।<br>सर्वमावृत्य तिष्ठन्तं ददर्श परमेश्वरम्॥ ७३॥
दृष्ट्वा तदीदृशं रूपं देव्या माहेश्वरं परम्।<br>भयेन च समाविष्टः स राजा हृष्टमानसः॥ ७४॥देवीके इस प्रकारके उस परम माहेश्वर रूपको देखकर वे (पर्वतोंके) राजा (हिमवान्) भयसे आविष्ट* होते हुए भी प्रसन्न मनवाले हो गये। (और) अपनी आत्मामें आत्माको प्रतिष्ठितकर (आत्मनिष्ठ होकर) ओङ्कारका स्मरण करते हुए (वे) परमेश्वरीके एक हजार आठ नामोंसे उनकी स्तुति करने लगे— ॥ ७४-७५॥
आत्मन्याधाय चात्मानमोङ्कारं समनुस्मरन्।<br>नाम्नामष्टसहस्रेण तुष्टाव परमेश्वरीम्॥ ७५॥
हिमवानुवाच<br>शिवोमा परमा शक्तिरनन्ता निष्कलामला।<br>शान्ता माहेश्वरी नित्या शाश्वती परमाक्षरा॥ ७६॥<br>अचिन्त्या केवलानन्त्या शिवात्मा परमात्मिका।<br>अनादिरव्यया शुद्धा देवात्मा सर्वगाचला॥ ७७॥हिमवान्‌ने कहा— (हे देवी! आप) शिवा, उमा, परमा शक्ति, अनन्ता, निष्कला, अमला, शान्ता, माहेश्वरी, नित्या, शाश्वती, परमाक्षरा, अचिन्त्या, केवला, अनन्त्या, शिवात्मिका, परमात्मिका, अनादि, अव्यया, शुद्धा, देवात्मिका, सर्वगा, अचला॥ ७६-७७॥

* अपनी पुत्रीमें परस्परविरोधी अनेक रूपोंको देखकर भयभीत होना स्वाभाविक है, पर ऐश्वर्यसम्पन्न देवी ही मेरी पुत्री है— यह अनुभव कर प्रसन्नचित्त होना भी स्वाभाविक ही है।

७२ * कूर्मपुराण *


एकानेकविभागस्था मायातीता सुनिर्मला।<br>महामाहेश्वरी सत्या महादेवी निरञ्जना॥ ७८॥<br>काष्ठा सर्वान्तरस्था च चिच्छक्तिरतिलालसा।<br>नन्दा सर्वात्मिका विद्या ज्योतीरूपामृताक्षरा ॥ ७९ ॥<br>शान्तिः प्रतिष्ठा सर्वेषां निवृत्तिरमृतप्रदा।<br>व्योममूर्तिर्व्योमलया व्योमाधाराऽच्युताऽमरा ॥ ८० ॥<br>अनादिनिधनामोघा कारणात्मा कलाकला।<br>ऋतुः प्रथमजा नाभिरमृतस्यात्मसंश्रया ॥ ८१ ॥<br>प्राणेश्वरप्रिया माता महामहिषघातिनी।<br>प्राणेश्वरी प्राणरूपा प्रधानपुरुषेश्वरी ॥ ८२ ॥<br>सर्वशक्तिकलाकारा ज्योत्स्ना द्यौर्महिमास्पदा।<br>सर्वकार्यनियन्त्री च सर्वभूतेश्वरेश्वरी ॥ ८३ ॥<br>अनादिरव्यक्तगुहा महानन्दा सनातनी।<br>आकाशयोनिर्यौगस्था महायोगेश्वरेश्वरी ॥ ८४ ॥<br>महामाया सुदुष्पूरा मूलप्रकृतिरीश्वरी।<br>संसारयोनिः सकला सर्वशक्तिसमुद्भवा ॥ ८५ ॥<br>संसारपारा दुर्बारा दुर्निरीक्ष्या दुरासदा।<br>प्राणशक्तिः प्राणविद्या योगिनी परमा कला ॥ ८६ ॥<br>महाविभूतिर्दुर्धर्षा मूलप्रकृतिसम्भवा।<br>अनाद्यनन्तविभवा परार्था पुरुषारणिः ॥ ८७ ॥<br>सर्गस्थित्यन्तकरणी सुदुर्वाच्या दुरत्यया।<br>शब्दयोनिः शब्दमयी नादाख्या नादविग्रहा ॥ ८८ ॥<br>प्रधानपुरुषातीता प्रधानपुरुषात्मिका।<br>पुराणी चिन्मयी पुंसामादिः पुरुषरूपिणी ॥ ८९ ॥<br>भूतान्तरात्मा कूटस्था महापुरुषसंज्ञिता।<br>जन्ममृत्युजरातीता सर्वशक्तिसमन्विता ॥ ९० ॥<br>व्यापिनी चानवच्छिन्ना प्रधानानूप्रवेशिनी।<br>क्षेत्रज्ञशक्तिरव्यक्तलक्षणा मलवर्जिता ॥ ९१ ॥<br>अनादिमायासम्भिन्ना त्रितत्त्वा प्रकृतिर्गुहा।<br>महामायासमुत्पन्ना तामसी पौरुषी ध्रुवा ॥ ९२ ॥<br>व्यक्ताव्यक्तात्मिका कृष्णा रक्ता शुक्ला प्रसूतिका।<br>अकार्या कार्यजननी नित्यं प्रसवधर्मिणी ॥ ९३ ॥<br>सर्गप्रलयनिर्मुक्ता सृष्टिस्थित्यन्तधर्मिणी।<br>ब्रह्मगर्भा चतुर्विंशा पद्मनाभाच्युतात्मिका ॥ ९४ ॥<br>वैद्युती शाश्वती योनिर्जगन्मातेश्वरप्रिया।<br>सर्वाधारा महारूपा सर्वैश्वर्यसमन्विता ॥ ९५ ॥एका, अनेकविभागस्था (विविध रूपोंमें स्थित), मायातीता, सुनिर्मला, महामाहेश्वरी, सत्या, महादेवी, निरञ्जना, काष्ठा, सर्वान्तरस्था (सभीके हृदयमें स्थित रहनेवाली), चिच्छक्ति (चैतन्यशक्तिरूपा), अतिलालसा (उत्कृष्ट इच्छारूपा), नन्दा, सर्वात्मिका, विद्या, ज्योतीरूपा, अमृताक्षरा, शान्ति, सभीकी प्रतिष्ठा, निवृत्ति, अमृतप्रदा, व्योममूर्ति, व्योमलया, व्योमाधारा, अच्युता, अमरा, अनादिनिधना, अमोघा, कारणात्मिका, कला, अकला, ऋतु, प्रथमजा, अमृतनाभि, आत्मसंश्रया, प्राणेश्वरप्रिया, माता, महामहिषघातिनी, प्राणेश्वरी, प्राणरूपा, प्रधानपुरुषेश्वरी ॥ ७८–८२ ॥<br><br>सर्वशक्तिकलाकारा, ज्योत्स्ना, द्यौः (आकाशरूपा), महिमास्पदा, सर्वकार्यनियन्त्री, सर्वभूतेश्वरेश्वरी, अनादि, अव्यक्तगुहा, महानन्दा, सनातनी, आकाशयोनि, योगस्था, महायोगेश्वरेश्वरी, महामाया, सुदुष्पूरा, मूलप्रकृति, ईश्वरी, संसारयोनि, सकला, सर्वशक्तिसमुद्भवा, संसारपारा, दुर्वारा, दुर्निरीक्ष्या, दुरासदा (कठिन तपसे प्राप्त करने योग्य), प्राणशक्ति, प्राणविद्या, योगिनी, परमा, कला, महाविभूति, दुर्धर्षा, मूलप्रकृतिसम्भवा, अनाद्यनन्तविभवा, परार्था, पुरुषारणि पुरुष (परब्रह्म) ही जिनकी अरणि (अग्निमन्थनका काष्ठ-विशेष है), सर्गस्थित्यन्तकारिणी, सुदुर्वाच्या, दुरत्यया, शब्दयोनि, शब्दमयी, नादाख्या, नाद-विग्रहा, प्रधानपुरुषातीता, प्रधानपुरुषात्मिका, पुराणी, चिन्मयी, पुरुषोंकी आदिरस्वरूपा, पुरुषरूपिणी, भूतान्तरात्मा, कूटस्था, महापुरुषसंज्ञिता, जन्म-मृत्यु-जरातीता, सर्वशक्तिसमन्विता, व्यापिनी, अनवच्छिन्ना, प्रधानानूप्रवेशिनी, क्षेत्रज्ञशक्ति, अव्यक्तलक्षणा, मलवर्जिता, अनादिमायासम्भिन्ना (अनादिमायारूपा), त्रितत्त्वा, प्रकृति, गुहा, महामायासमुत्पन्ना, तामसी, पौरुषी, ध्रुवा ॥ ८३-९२ ॥<br><br>व्यक्ताव्यक्तात्मिका, कृष्णा, रक्ता, शुक्ला, प्रसूतिका, अकार्या, कार्यजननी, नित्यप्रसवधर्मिणी, सर्गप्रलयनिर्मुक्ता, सृष्टिस्थित्यन्तधर्मिणी, ब्रह्मगर्भा, चतुर्विंशा (चौबीस तत्त्वोंमें अन्तिम तत्त्व), पद्मनाभा, अच्युतात्मिका, वैद्युती, शाश्वती, योनि (मूल कारण), जगन्माता, ईश्वरप्रिया, सर्वाधारा, महारूपा, सर्वैश्वर्यसमन्विता ॥ ९३–९५ ॥
  • अध्याय ११ * ७३

| विश्वरूपा महागर्भा विश्वेशेच्छानुवर्तिनी ।<br>महीयसी ब्रह्मयोनिर्महालक्ष्मीसमुद्भवा ॥ ९६ ॥<br>महाविमानमध्यस्था महानिद्रात्महेतुका।<br>सर्वसाधारणी सूक्ष्मा ह्यविद्या पारमार्थिका ॥ ९७ ॥<br>अनन्तरूपानन्तस्था देवी पुरुषमोहिनी ।<br>अनेकाकारसंस्थाना कालत्रयविवर्जिता ॥ ९८ ॥<br>ब्रह्मजन्मा हरेर्मूर्तिर्ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका ।<br>ब्रह्मेशविष्णुजननी ब्रह्माख्या ब्रह्मसंश्रया ॥ ९९ ॥<br>व्यक्ता प्रथमजा ब्राह्मी महती ज्ञानरूपिणी ।<br>वैराग्यैश्वर्यधर्मात्मा ब्रह्ममूर्तिर्हृदिस्थिता ।<br>अपांयोनिः स्वयम्भूतिर्मानसी तत्त्वसम्भवा ॥ १०० ॥<br>ईश्वराणी च शर्वाणी शंकरार्धशरीरिणी ।<br>भवानी चैव रुद्राणी महालक्ष्मीस्तथाम्बिका ॥ १०१ ॥<br>महेश्वरसमुत्पन्ना भुक्तिमुक्तिफलप्रदा ।<br>सर्वेश्वरी सर्ववन्द्या नित्यं मुदितमानसा ॥ १०२ ॥<br>ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रनमिता शंकरेच्छानुवर्तिनी ।<br>ईश्वरार्धासनगता महेश्वरपतिव्रता ॥ १०३ ॥<br>सकृद्विभाविता सर्वा समुद्रपरिशोषिणी ।<br>पार्वती हिमवत्पुत्री परमानन्ददायिनी ॥ १०४ ॥<br>गुणाढ्या योगजा योग्या ज्ञानमूर्तिर्विकासिनी ।<br>सावित्री कमला लक्ष्मीः श्रीरनन्तोरसिस्थिता ॥ १०५ ॥<br>सरोजनिलया मुद्रा योगनिद्रासुरार्दिनी ।<br>सरस्वती सर्वविद्या जगज्ज्येष्ठा सुमङ्गला ॥ १०६ ॥<br>वाग्देवी वरदा वाच्या कीर्तिः सर्वार्थसाधिका ।<br>योगीश्वरी ब्रह्मविद्या महाविद्या सुशोभना ॥ १०७ ॥<br>गुह्यविद्यात्मविद्या च धर्मविद्यात्मभाविता ।<br>स्वाहा विश्वम्भरा सिद्धिः स्वधा मेधा धृतिः श्रुतिः ॥ १०८ ॥<br>नीतिः सुनीतिः सुकृतिर्माधवी नरवाहिनी ।<br>अजा विभावरी सौम्या भोगिनी भोगदायिनी ॥ १०९ ॥<br>शोभा वंशकरी लोला मालिनी परमेष्ठिनी ।<br>त्रैलोक्यसुन्दरी रम्या सुन्दरी कामचारिणी ॥ ११० ॥<br>महानुभावा सत्त्वस्था महामहिषमर्दिनी ।<br>पद्ममाला पापहरा विचित्रा मुकुटानना ॥ १११ ॥<br><br>कान्ता चित्राम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता ।<br>हंसाख्या व्योमनिलया जगत्सृष्टिविवर्धिनी ॥ ११२ ॥ | विश्वरूपा, महागर्भा, विश्वेशेच्छानुवर्तिनी, महीयसी, ब्रह्मयोनि, महालक्ष्मीसमुद्भवा, महाविमानमध्यस्था, महानिद्रा, आत्महेतुका, सर्वसाधारणी, सूक्ष्मा, अविद्या, पारमार्थिका ॥ ९६-९७ ॥<br><br>अनन्तरूपा, अनन्तस्था, देवी, पुरुषमोहिनी, अनेकाकारसंस्थाना, कालत्रयविवर्जिता, ब्रह्मजन्मा, हरिमूर्ति (हरिकी मूर्ति), ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका, ब्रह्मेशविष्णुजननी, ब्रह्माख्या, ब्रह्मसंश्रया, व्यक्ता, प्रथमजा, ब्राह्मी, महती, ज्ञानरूपिणी, वैराग्यैश्वर्यधर्मात्मिका, ब्रह्ममूर्ति, हृदिस्थिता, अपांयोनि (जलकी योनि), स्वयम्भूति, मानसी, तत्त्वसम्भवा, ईश्वराणी, शर्वाणी, शंकरार्धशरीरिणी, भवानी, रुद्राणी, महालक्ष्मी, अम्बिका, महेश्वरसमुत्पन्ना, भुक्तिमुक्तिफलप्रदा, सर्वेश्वरी, सर्ववन्द्या, नित्यमुदितमानसा, ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रनमिता, शंकरेच्छानुवर्तिनी, ईश्वरार्धासनगता, महेश्वरपतिव्रता ॥ ९८-१०३ ॥<br><br>सकृद्विभाविता, सर्वा, समुद्रपरिशोषिणी, पार्वती, हिमवत्पुत्री, परमानन्ददायिनी, गुणाढ्या, योगजा, योग्या, ज्ञानमूर्ति, विकासिनी, सावित्री, कमला, लक्ष्मी, श्री, अनन्तोरसिस्थिता (विष्णुके हृदयमें रहनेवाली), सरोजनिलया, मुद्रा, योगनिद्रा, असुरार्दिनी, सरस्वती, सर्वविद्या, जगज्ज्येष्ठा, सुमङ्गला, वाग्देवी, वरदा, वाच्या, कीर्ति, सर्वार्थसाधिका, योगीश्वरी, ब्रह्मविद्या, महाविद्या, सुशोभना, गुह्यविद्या, आत्मविद्या, धर्मविद्या, आत्मभाविता, स्वाहा, विश्वम्भरा, सिद्धि, स्वधा, मेधा, धृति, श्रुति, नीति, सुनीति, सुकृति, माधवी, नरवाहिनी, अजा, विभावरी, सौम्या, भोगिनी, भोगदायिनी, शोभा, वंशकरी, लोला (चञ्चला), मालिनी, परमेष्ठिनी, त्रैलोक्यसुन्दरी, रम्या, सुन्दरी, कामचारिणी ॥ १०४-११० ॥<br><br>महानुभावा, सत्त्वस्था, महामहिषमर्दिनी, पद्ममाला, पापहरा, विचित्रा, मुकुटानना, कान्ता, चित्राम्बरधरा, दिव्याभरणभूषिता, हंसाख्या, व्योमनिलया, जगत्सृष्टिविवर्धिनी ॥ १११-११२ ॥ |

७४* कूर्मपुराण *
निर्यन्त्रा यन्त्रवाहस्था नन्दिनी भद्रकालिका।<br>आदित्यवर्णा कौमारी मयूरवरवाहिनी ॥ ११३ ॥<br>वृषासनगता गौरी महाकाली सुरार्चिता।<br>अदितिर्नियता रौद्री पद्मगर्भा विवाहना ॥ ११४ ॥<br>विरूपाक्षी लेलिहाना महापुरनिवासिनी।<br>महाफलानवद्याङ्गी कामपूरा विभावरी ॥ ११५ ॥<br>विचित्ररत्नमुकुटा प्रणतार्तिप्रभञ्जिनी।<br>कौशिकी कर्षणी रात्रिस्त्रिदशार्तिविनाशिनी ॥ ११६ ॥<br>बहुरूपा सुरूपा च विरूपा रूपवर्जिता।<br>भक्तार्तिशमनी भव्या भवभावविनाशिनी ॥ ११७ ॥<br>निर्गुणा नित्यविभवा निःसारा निरपत्रपा।<br>यशस्विनी सामगीतिर्भवाङ्गनिलयालया ॥ ११८ ॥<br>दीक्षा विद्याधरी दीप्ता महेन्द्रविनिपातिनी।<br>सर्वातिशायिनी विद्या सर्वसिद्धिप्रदायिनी ॥ ११९ ॥<br>सर्वेश्वरप्रिया तार्क्ष्या समुद्रान्तरवासिनी।<br>अकलङ्का निराधारा नित्यसिद्धा निरामया ॥ १२० ॥<br>कामधेनुर्बृहद्गर्भा धीमती मोहनाशिनी।<br>निःसङ्कल्पा निरातङ्का विनया विनयप्रदा ॥ १२१ ॥<br>ज्वालामालासहस्राढ्या देवदेवी मनोन्मनी।<br>महाभगवती दुर्गा वासुदेवसमुद्भवा ॥ १२२ ॥<br>महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी भक्तिगम्या परावरा।<br>ज्ञानज्ञेया जरातीता वेदान्तविषया गतिः ॥ १२३ ॥<br>दक्षिणा दहना दाह्या सर्वभूतनमस्कृता।<br>योगमाया विभावज्ञा महामाया महीयसी ॥ १२४ ॥<br><br>संध्या सर्वसमुद्भूतिर्ब्रह्मवृक्षाश्रयानतिः।<br>बीजाङ्कुरसमुद्भूतिर्महाशक्तिर्महामतिः ॥ १२५ ॥<br>ख्यातिः प्रज्ञा चितिः संवित् महाभोगीन्द्रशायिनी।<br>विकृतिः शांकरी शास्त्री गणगन्धर्वसेविता ॥ १२६ ॥<br>वैश्वानरी महाशाला देवसेना गुहप्रिया।<br>महारात्रिः शिवानन्दा शचीदुःस्वप्ननाशिनी ॥ १२७ ॥<br>इज्या पूज्या जगद्धात्री दुर्विज्ञेया सुरूपिणी।<br>गुहाम्बिका गुणोत्पत्तिर्महापीठा मरुत्सुता ॥ १२८ ॥<br>हव्यवाहान्तरागादिः हव्यवाहसमुद्भवा।<br>जगद्योनिर्जगन्माता जन्ममृत्युजरातिगा ॥ १२९ ॥<br>बुद्धिमाता बुद्धिमती पुरुषान्तरवासिनी।<br>तरस्विनी समाधिस्था त्रिनेत्रा दिविसंस्थिता ॥ १३० ॥निर्यन्त्रा, यन्त्रवाहस्था, नन्दिनी, भद्रकालिका, आदित्यवर्णा, कौमारी, मयूरवरवाहिनी, वृषासनगता, गौरी, महाकाली, सुरार्चिता, अदिति, नियता, रौद्री, पद्मगर्भा, विवाहना, विरूपाक्षी, लेलिहाना, महापुरनिवासिनी, महाफला, अनवद्याङ्गी, कामपूरा, विभावरी, विचित्ररत्नमुकुटा, प्रणतार्तिप्रभञ्जिनी, कौशिकी, कर्षणी, रात्रि, त्रिदशार्तिविनाशिनी, बहुरूपा, सुरूपा, विरूपा, रूपवर्जिता, भक्तार्तिशमनी, भव्या, भवभावविनाशिनी ॥ ११३—११७ ॥<br><br>निर्गुणा, नित्यविभवा, निःसारा, निरपत्रपा, यशस्विनी, सामगीति, भवाङ्गनिलयालया, दीक्षा, विद्याधरी, दीप्ता, महेन्द्रविनिपातिनी, सर्वातिशायिनी, विद्या, सर्वसिद्धिप्रदायिनी, सर्वेश्वरप्रिया, तार्क्ष्या, समुद्रान्तरवासिनी, अकलंका, निराधारा, नित्यसिद्धा, निरामया, कामधेनु, बृहद्गर्भा, धीमती, मोहनाशिनी, निःसङ्कल्पा, निरातङ्का, विनया, विनयप्रदा, ज्वालामालासहस्राढ्या, देवदेवी, मनोन्मनी, महाभगवती, दुर्गा, वासुदेवसमुद्भवा, महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी, भक्तिगम्या, परावरा, ज्ञानज्ञेया, जरातीता, वेदान्तविषया, गति, दक्षिणा, दहना, दाह्या, सर्वभूतनमस्कृता, योगमाया, विभावज्ञा, महामाया, महीयसी ॥ ११८—१२४ ॥<br><br>संध्या, सर्वसमुद्भूति, ब्रह्मवृक्षाश्रयानति, बीजाङ्कुरसमुद्भूति, महाशक्ति, महामति, ख्याति, प्रज्ञा, चिति, संवित्, महाभोगीन्द्रशायिनी, विकृति, शांकरी, शास्त्री, गणगन्धर्वसेविता, वैश्वानरी, महाशाला, देवसेना, गुहप्रिया, महारात्रि, शिवानन्दा, शची, दुःस्वप्ननाशिनी, इज्या, पूज्या, जगद्धात्री, दुर्विज्ञेया, सुरूपिणी, गुहाम्बिका, गुणोत्पत्ति, महापीठा, मरुत्सुता, हव्यवाहान्तरागादि, हव्यवाहसमुद्भवा, जगद्योनि, जगन्माता, जन्ममृत्युजरातिगा, बुद्धिमाता, बुद्धिमती, पुरुषान्तरवासिनी, तरस्विनी, समाधिस्था, त्रिनेत्रा, दिविसंस्थिता ॥ १२५—१३० ॥
* अध्याय ११ *७५
सर्वेन्द्रियमनोमाता सर्वभूतहृदिस्थिता।<br>संसारतारिणी विद्या ब्रह्मवादिमनोलया ॥ १३१ ॥<br>ब्रह्माणी बृहती ब्राह्मी ब्रह्मभूता भवारणिः।<br>हिरण्मयी महारात्रिः संसारपरिवर्तिका ॥ १३२ ॥<br>सुमालिनी सुरूपा च भाविनी तारिणी प्रभा।<br>उन्मीलनी सर्वसहा सर्वप्रत्ययसाक्षिणी ॥ १३३ ॥<br>सुसौम्या चन्द्रवदना ताण्डवासक्तमानसा।<br>सत्त्वशुद्धिकरी शुद्धिर्मलत्रयविनाशिनी ॥ १३४ ॥<br>जगत्प्रिया जगन्मूर्तिस्त्रिमूर्तिरमृताश्रया।<br>निराश्रया निराहारा निरङ्कुरवनोद्भवा ॥ १३५ ॥<br>चन्द्रहस्ता विचित्राङ्गी स्रग्विणी पद्मधारिणी।<br>परावरविधानज्ञा महापुरुषपूर्वजा ॥ १३६ ॥<br>विद्येश्वरप्रिया विद्या विद्युज्जिह्वा जितश्रमा।<br>विद्यामयी सहस्त्राक्षी सहस्रवदनात्मजा ॥ १३७ ॥सर्वेन्द्रियमनोमाता, सर्वभूतहृदिस्थिता, संसारतारिणी, विद्या, ब्रह्मवादिमनोलया, ब्रह्माणी, बृहती, ब्राह्मी, ब्रह्मभूता, भवारणि, हिरण्मयी, महारात्रि, संसारपरिवर्तिका, सुमालिनी, सुरूपा, भाविनी, तारिणी, प्रभा, उन्मीलनी, सर्वसहा, सर्वप्रत्ययसाक्षिणी, सुसौम्या, चन्द्रवदना, ताण्डवासक्तमानसा, सत्त्वशुद्धिकरी*, शुद्धि, मलत्रयविनाशिनी, जगत्प्रिया, जगन्मूर्ति, त्रिमूर्ति, अमृताश्रया, निराश्रया, निराहारा, निरङ्कुरवनोद्भवा, चन्द्रहस्ता, विचित्राङ्गी, स्रग्विणी, पद्मधारिणी, परावरविधानज्ञा, महापुरुषपूर्वजा, विद्येश्वरप्रिया, विद्या, विद्युज्जिह्वा, जितश्रमा, विद्यामयी, सहस्राक्षी, सहस्रवदनात्मजा ॥ १३१—१३७ ॥
सहस्ररश्मिः सत्त्वस्था महेश्वरपदाश्रया।<br>क्षालिनी सन्मयी व्याप्ता तैजसी पद्मबोधिका ॥ १३८ ॥<br>महामायाश्रया मान्या महादेवमनोरमा।<br>व्योमलक्ष्मीः सिंहस्था चेकितानामितप्रभा ॥ १३९ ॥<br>वीरेश्वरी विमानस्था विशोका शोकनाशिनी।<br>अनाहता कुण्डलिनी नलिनी पद्मवासिनी ॥ १४० ॥<br>सदानन्दा सदाकीर्तिः सर्वभूताश्रयस्थिता।<br>वाग्देवता ब्रह्मकला कलातीता कलारणिः ॥ १४१ ॥<br>ब्रह्मश्रीर्ब्रह्महृदया ब्रह्मविष्णुशिवप्रिया।<br>व्योमशक्तिः क्रियाशक्तिर्ज्ञानशक्तिः परागतिः ॥ १४२ ॥<br>क्षोभिका बन्धिका भेद्या भेदाभेदविवर्जिता।<br>अभिन्नाभिन्नसंस्थाना वंशिनी वंशहारिणी ॥ १४३ ॥<br>गुह्यशक्तिर्गुणातीता सर्वदा सर्वतोमुखी।<br>भगिनी भगवत्पत्नी सकला कालकारिणी ॥ १४४ ॥सहस्ररश्मि, सत्त्वस्था, महेश्वरपदाश्रया, क्षालिनी, सन्मयी, व्याप्ता, तैजसी, पद्मबोधिका, महामायाश्रया, मान्या, महादेवमनोरमा, व्योमलक्ष्मी, सिंहस्था, चेकिताना, अमितप्रभा, वीरेश्वरी, विमानस्था, विशोका, शोकनाशिनी, अनाहता, कुण्डलिनी, नलिनी, पद्मवासिनी, सदानन्दा, सदाकीर्ति, सर्वभूताश्रयस्थिता, वाग्देवता, ब्रह्मकला, कलातीता, कलारणि, ब्रह्मश्री, ब्रह्महृदया, ब्रह्मविष्णुशिवप्रिया, व्योमशक्ति, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति, परागति, क्षोभिका, बन्धिका, भेद्या, भेदाभेदविवर्जिता, अभिन्ना, अभिन्नसंस्थाना, वंशिनी, वंशहारिणी, गुह्यशक्ति, गुणातीता, सर्वदा, सर्वतोमुखी, भगिनी, भगवत्पत्नी, सकला, कालकारिणी ॥ १३८—१४४ ॥
सर्ववित् सर्वतोभद्रा गुह्यातीता गुहारणिः।<br>प्रक्रिया योगमाता च गङ्गा विश्वेश्वरेश्वरी ॥ १४५ ॥<br>कपिला कापिला कान्ता कनकाभा कलान्तरा।<br>पुण्या पुष्करिणी भोक्त्री पुरंदरपुरस्सरा ॥ १४६ ॥<br>पोषणी परमैश्वर्यभूतिदा भूतिभूषणा।<br>पञ्चब्रह्मसमुत्पत्तिः परमार्थार्थविग्रहा ॥ १४७ ॥<br>धर्मोदया भानुमती योगिज्ञेया मनोजवा।<br>मनोहरा मनोरक्षा तापसी वेदरूपिणी ॥ १४८ ॥सर्ववित्, सर्वतोभद्रा, गुह्यातीता, गुहारणि, प्रक्रिया, योगमाता, गङ्गा, विश्वेश्वरेश्वरी, कपिला, कापिला, कान्ता, कनकाभा, कलान्तरा, पुण्या, पुष्करिणी, भोक्त्री, पुरंदरपुरस्सरा, पोषणी, परमैश्वर्यभूतिदा, भूतिभूषणा, पञ्चब्रह्मसमुत्पत्ति, परमार्थार्थविग्रहा, धर्मोदया, भानुमती, योगिज्ञेया, मनोजवा, मनोहरा, मनोरक्षा, तापसी, वेदरूपिणी ॥ १४५—१४८ ॥

* सत्त्व (चित्त)।

७६* कूर्मपुराण *
वेदशक्तिर्वेदमाता वेदविद्याप्रकाशिनी ।<br>योगेश्वरेश्वरी माता महाशक्तिर्मनोमयी ॥ १४९ ॥<br>विश्वावस्था वियन्मूर्तिर्विद्युन्माला विहायसी ।<br>किंनरी सुरभी वन्द्या नन्दिनी नन्दिवल्लभा ॥ १५० ॥<br>भारती परमानन्दा परापरविभेदिका ।<br>सर्वप्रहरणोपेता काम्या कामेश्वरेश्वरी ॥ १५१ ॥<br>अचिन्त्याचिन्त्यविभवा हृल्लेखा कनकप्रभा ।<br>कूष्माण्डी धनरत्नाढ्या सुगन्धा गन्धदायिनी ॥ १५२ ॥<br>त्रिविक्रमपदोद्भूता धनुष्पाणिः शिवोदया ।<br>सुदुर्लभा धनाध्यक्षा धन्या पिङ्गललोचना ॥ १५३ ॥<br>शान्तिः प्रभावती दीप्तिः पङ्कजायतलोचना ।<br>आद्या हृत्कमलोद्भूता गवां माता रणप्रिया ॥ १५४ ॥<br>सत्क्रिया गिरिजा शुद्धा नित्यपुष्टा निरन्तरा ।<br>दुर्गा कात्यायनी चण्डी चर्चिका शान्तविग्रहा ॥ १५५ ॥<br>हिरण्यवर्णा रजनी जगद्यन्त्रप्रवर्तिका ।<br>मन्दराद्रिनिवासा च शारदा स्वर्णमालिनी ॥ १५६ ॥<br>रत्नमाला रत्नगर्भा पृथ्वी विश्वप्रमाथिनी ।<br>पद्मानना पद्मनिभा नित्यतुष्टामृतोद्भवा ॥ १५७ ॥<br>धुन्वती दुःप्रकम्प्या च सूर्यमाता दृषद्वती ।<br>महेन्द्रभगिनी मान्या वरेण्या वरदर्पिता ॥ १५८ ॥<br>कल्याणी कमला रामा पञ्चभूता वरप्रदा ।<br>वाच्या वरेश्वरी वन्द्या दुर्जया दुरतिक्रमा ॥ १५९ ॥<br>कालरात्रिमहावेगा वीरभद्रप्रिया हिता ।<br>भद्रकाली जगन्माता भक्तानां भद्रदायिनी ॥ १६० ॥<br>कराला पिङ्गलाकारा नामभेदामहामदा ।<br>यशस्विनी यशोदा च षडध्वपरिवर्तिका ॥ १६१ ॥<br>शङ्खिनी पद्मिनी सांख्या सांख्ययोगप्रवर्तिका ।<br>चैत्रा संवत्सरारूढा जगत्सम्पूरणीन्द्रजा ॥ १६२ ॥<br>शुम्भारिः खेचरी स्वस्था कम्बुग्रीवा कलिप्रिया ।<br>खगध्वजा खगारूढा परार्थ्या परमालिनी ॥ १६३ ॥<br>ऐश्वर्यवर्त्मनिलया विरक्ता गरुडासना ।<br>जयन्ती हृद्गुहा रम्या गह्वरेष्ठा गणाग्रणीः ॥ १६४ ॥<br>संकल्पसिद्धा साम्यस्था सर्वविज्ञानदायिनी ।<br>कलिकल्मषहन्त्री च गुह्योपनिषदुत्तमा ॥ १६५ ॥<br><br>निष्ठा दृष्टिः स्मृतिर्व्याप्तिः पुष्टिस्तुष्टिः क्रियावती ।<br>विश्वामरेश्वरेशाना भुक्तिर्मुक्तिः शिवामृता ॥ १६६ ॥वेदशक्ति, वेदमाता, वेदविद्याप्रकाशिनी, योगेश्वरेश्वरी, माता, महाशक्ति, मनोमयी, विश्वावस्था, वियन्मूर्ति, विद्युन्माला, विहायसी, किंनरी, सुरभी, वन्द्या, नन्दिनी, नन्दिवल्लभा, भारती, परमानन्दा, परापरविभेदिका, सर्वप्रहरणोपेता, काम्या, कामेश्वरेश्वरी ॥ १४९-१५१॥<br><br>अचिन्त्या, अचिन्त्यविभवा, हृल्लेखा, कनकप्रभा, कूष्माण्डी, धनरत्नाढ्या, सुगन्धा, गन्धदायिनी, त्रिविक्रमपदोद्भूता, धनुष्पाणि, शिवोदया, सुदुर्लभा, धनाध्यक्षा, धन्या, पिङ्गललोचना, शान्ति, प्रभावती, दीप्ति, पङ्कजायतलोचना, आद्या, हृत्कमलोद्भूता, गवां माता (गौओंकी माता), रणप्रिया, सत्क्रिया, गिरिजा, शुद्धा, नित्यपुष्टा, निरन्तरा, दुर्गा, कात्यायनी, चण्डी, चर्चिका, शान्तविग्रहा, हिरण्यवर्णा, रजनी, जगद्यन्त्रप्रवर्तिका, मन्दराद्रिनिवासा, शारदा, स्वर्णमालिनी, रत्नमाला, रत्नगर्भा, पृथ्वी, विश्वप्रमाथिनी, पद्मानना, पद्मनिभा, नित्यतुष्टा, अमृतोद्भवा, धुन्वती, दुःप्रकम्प्या, सूर्यमाता, दृषद्वती, महेन्द्रभगिनी, मान्या, वरेण्या, वरदर्पिता ॥ १५२-१५८॥<br><br>कल्याणी, कमला, रामा, पञ्चभूता, वरप्रदा, वाच्या, वरेश्वरी, वन्द्या, दुर्जया, दुरतिक्रमा, कालरात्रि, महावेगा, वीरभद्रप्रिया, हिता, भद्रकाली, जगन्माता, भक्तानां भद्रदायिनी (भक्तोंका कल्याण करनेवाली), कराला, पिङ्गलाकारा, नामभेदा, अमहामदा, यशस्विनी, यशोदा, षडध्वपरिवर्तिका, शङ्खिनी, पद्मिनी, सांख्या, सांख्ययोगप्रवर्तिका, चैत्रा, संवत्सरारूढा, जगत्सम्पूरणीन्द्रजा, शुम्भारि, खेचरी, स्वस्था, कम्बुग्रीवा, कलिप्रिया, खगध्वजा, खगारूढा, परार्थ्या, परमालिनी, ऐश्वर्यवर्त्मनिलया, विरक्ता, गरुडासना, जयन्ती, हृद्गुहा, रम्या, गह्वरेष्ठा, गणाग्रणी, संकल्पसिद्धा, साम्यस्था, सर्वविज्ञानदायिनी, कलिकल्मषहन्त्री, गुह्योपनिषत्, उत्तमा ॥ १५९-१६५॥<br><br>निष्ठा, दृष्टि, स्मृति, व्याप्ति, पुष्टि, तुष्टि, क्रियावती, विश्वामरेश्वरेशाना, भुक्ति, मुक्ति, शिवा, अमृता ॥ १६६॥