संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| ६६ | * कूर्मपुराण * |
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| संकल्पं चैव धर्मं च युगधर्मांश्च शाश्वतान्।<br>स्थानाभिमानिनः सर्वान् यथा ते कथितं पुरा॥ ८८॥ | जैसा पहले बताया गया था तदनुसार संकल्प, धर्म, सनातन युगधर्म तथा सभी स्थानाभिमानी (देवताओं)- का वर्णन तुम्हें सुनाया गया॥ ८८॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे दशमोऽध्यायः॥ १०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १०॥
ग्यारहवाँ अध्याय
सती और पार्वतीका आविर्भाव, देवी-माहात्म्य, हैमवती-माहात्म्य, देवीका अष्टोत्तरसहस्रनामस्तोत्र, हिमवान्द्वारा देवीकी स्तुति एवं हिमवान्को देवीद्वारा उपदेश, देवीसहस्रनामस्तोत्र-जपका माहात्म्य
| श्रीकूर्म उवाच | |
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| एवं सृष्ट्वा मरीच्यादीन् देवदेवः पितामहः।<br>सहैव मानसैः पुत्रैस्तताप परमं तपः॥ १॥ | श्रीकूर्मने कहा—इस प्रकार मरीचि आदिकी सृष्टि करके देवोंके देव पितामह (ब्रह्मा अपने) मानस पुत्रोंके साथ परम तप करने लगे॥ १॥ |
| तस्यैवं तपतो वक्त्राद् रुद्रः कालाग्निसंनिभः।<br>त्रिशूलपाणिरीशानः प्रादुरासीत् त्रिलोचनः॥ २॥<br><br>अर्धनारीनरवपुः दुष्प्रेक्ष्योऽतिभयंकरः।<br>विभजात्मानमित्युक्त्वा ब्रह्मा चान्तर्दधे भयात्॥ ३॥ | इस प्रकार तप करते हुए उनके मुखसे कालाग्निके समान अति भयंकर, हाथमें त्रिशूल धारण किये, कठिनतासे देखे जाने योग्य, अर्धनारीश्वरका शरीर धारण किये हुए, त्रिलोचन ईशान रुद्र प्रकट हुए। 'अपना विभाग करो' ऐसा कहकर ब्रह्मा भयसे अन्तर्धान हो गये॥ २-३॥ |
| तथोक्तोऽसौ द्विधा स्त्रीत्वं पुरुषत्वमथाकरोत्।<br>बिभेद पुरुषत्वं च दशधा चैकधा पुनः॥ ४॥ | (ब्रह्माके द्वारा) ऐसा कहे जानेपर उन्होंने स्त्री तथा पुरुषरूपसे दो भाग कर दिये। पुनः पुरुषभागको दस और एक—इस प्रकार ग्यारह भागोंमें बाँट दिया। ये ग्यारह रुद्र त्रिभुवनेश्वर कहलाते हैं। ब्राह्मणो! कपाली-ईश आदि ये सभी एकादश रुद्र देवताओंके कार्यमें नियोजित हैं॥ ४-५॥ |
| एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः।<br>कपालीशादयो विप्रा देवकार्ये नियोजिताः॥ ५॥ | |
| सौम्यासौम्यैस्तथा शान्ताशान्तैः स्त्रीत्वं च स प्रभुः।<br>बिभेद बहुधा देवः स्वरूपैरसितैः सितैः॥ ६॥<br><br>ता वै विभूतयो विप्रा विश्रुताः शक्तयो भुवि।<br>लक्ष्मादयो याभिरीशा विश्वं व्याप्नोति शांकरी॥ ७॥ | उन प्रभु देवने सौम्य और रौद्र, शान्त और अशान्त तथा श्वेत और कृष्णरूपोंसे स्त्रीभागको भी अनेक रूपोंमें विभक्त किया। हे विप्रो! ये ही विभूतियाँ शक्तियोंके रूपमें लक्ष्मी आदि नामोंसे संसारमें विख्यात हैं। शंकरकी शक्ति ईशा इन्हींके द्वारा विश्वमें व्याप्त है॥ ६-७॥ |
| विभज्य पुनरीशानी स्वात्मानं शंकराद् विभोः।<br>महादेवनियोगेन पितामहमुपस्थिता॥ ८॥<br><br>तामाह भगवान् ब्रह्मा दक्षस्य दुहिता भव।<br>सापि तस्य नियोगेन प्रादुरासीत् प्रजापतेः॥ ९॥ | पुनः ईशानी (ईशा) अपनेको विभु शंकरसे विभक्तकर महादेवके निर्देशसे वे पितामहके पास गयीं। भगवान् ब्रह्माने इनसे कहा—'दक्षकी पुत्री बनो।' ये भी उनके आदेशसे दक्ष प्रजापतिके यहाँ उत्पन्न हुईं (इन्हींका नाम सती है)॥ ८-९॥ |