भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय १० *

६५


यत्त्वयाभ्यर्थितं ब्रह्मन् पुत्रत्वे भवतो मम।<br>कृतं मया तत् सकलं सृजस्व विविधं जगत्॥ ७४॥<br><br>त्रिधा भिन्नोऽस्म्यहं ब्रह्मन् ब्रह्मविष्णुहराख्यया।<br>सर्गरक्षालयगुणैर्निष्कलः परमेश्वरः॥ ७५॥<br><br>स त्वं ममाग्रजः पुत्रः सृष्टिहेतोर्विनिर्मितः।<br>ममैव दक्षिणादङ्गाद् वामाङ्गात् पुरुषोत्तमः॥ ७६॥<br><br>तस्य देवादिदेवस्य शम्भोर्हृदयदेशतः।<br>सम्बभूवाथ रुद्रोऽसावहं तस्यापरा तनुः॥ ७७॥<br><br>ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्मन् सर्गस्थित्यन्तहेतवः।<br>विभज्यात्मानमेकोऽपि स्वेच्छया शंकरः स्थितः॥ ७८॥ब्रह्मन्! जो आपने 'मेरा पुत्र बनें' इस प्रकारसे मुझसे प्रार्थना की थी, मैंने उसे (रुद्ररूपमें उत्पन्न होकर) पूर्ण कर दिया। (अब आप) विविध प्रकारके जगत्की सृष्टि करें। ब्रह्मन्! मैं ही निष्कल परमेश्वर सृष्टि, रक्षा एवं प्रलय—इन तीन गुणोंसे भावित होकर ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव—इन नामोंसे तीन रूपोंमें विभक्त हूँ। आप मेरे ज्येष्ठ पुत्र हैं और सृष्टिकी रचनाके लिये मेरे ही दाहिने अङ्गसे आप बनाये गये हैं। मेरे ही बायें अङ्गसे पुरुषोत्तम विष्णु उत्पन्न हैं। उन्हीं देवोंमें आदिदेव शम्भुके हृदयप्रदेशसे मैं ही रुद्ररूपमें प्रादुर्भूत हूँ और उन्हींकी अपर मूर्ति हूँ। हे ब्रह्मन्! ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव (क्रमशः) सृष्टि, स्थिति तथा संहारके हेतु हैं। एक होते हुए भी वे शंकर अपनी इच्छासे अपनेको (तीन रूपोंमें) विभक्तकर स्थित रहते हैं॥ ७४–७८॥
तथान्यानि च रूपाणि मम मायाकृतानि तु।<br>निरूपः केवलः स्वच्छो महादेवः स्वभावतः॥ ७९॥इसी प्रकार अन्य भी जो रूप हैं, वे सब मेरी मायाद्वारा ही निर्मित हैं। स्वरूपतः महादेव स्वच्छ, रूपरहित एवं अद्वितीय हैं॥ ७९॥
एभ्यः परतरो देवस्त्रिमूर्तिः परमा तनुः।<br>माहेश्वरी त्रिनयना योगिनां शान्तिदा सदा॥ ८०॥वे देव इन त्रिमूर्तियों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश)-से उत्कृष्ट एवं श्रेष्ठ शरीरवाले हैं। तीन नेत्रोंवाली वह माहेश्वरी मूर्ति योगियोंको सदा शान्ति प्रदान करनेवाली है॥ ८०॥
तस्या एव परां मूर्ति मामवेहि पितामह।<br>शाश्वतैश्वर्यविज्ञानतेजोयोगसमन्विताम् ॥ ८१॥<br><br>सोऽहं ग्रसामि सकलमधिष्ठाय तमोगुणम्।<br>कालो भूत्वा न तमसा मामन्योऽभिभविष्यति॥ ८२॥<br><br>यदा यदा हि मां नित्यं विचिन्तयसि पद्मज।<br>तदा तदा मे सांनिध्यं भविष्यति तवानघ॥ ८३॥पितामह! मुझे सनातन ऐश्वर्य, विज्ञान, तेज एवं योगसे समन्वित उनकी वही परा मूर्ति समझो। वही मैं कालरूप होकर तमोगुणका आश्रय लेकर समस्त विश्वको ग्रस्त कर लेता हूँ, कोई दूसरा तमद्वारा मुझे अभिभूत नहीं कर सकता। निष्पाप कमलोद्भव! जब-जब मुझ सनातनका तुम ध्यान करोगे, तब-तब तुम मेरी समीपता प्राप्त करोगे॥ ८१–८३॥
एतावदुक्त्वा ब्रह्माणं सोऽभिवन्द्य गुरुं हरः।<br>सहैव मानसैः पुत्रैः क्षणादन्तरधीयत॥ ८४॥इतना कहकर गुरु (पिता) ब्रह्माकी वन्दना करके वे हर (महेश्वर) मानस पुत्रोंके साथ क्षणभरमें ही अन्तर्धान हो गये॥ ८४॥
सोऽपि योगं समास्थाय ससर्ज विविधं जगत्।<br>नारायणाख्यो भगवान् यथापूर्वं प्रजापतिः॥ ८५॥<br><br>मरीचिभृग्वङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।<br>दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजद् योगविद्यया॥ ८६॥<br><br>नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः।<br>सर्वे ते ब्रह्मणा तुल्याः साधका ब्रह्मवादिनः॥ ८७॥नारायण नामवाले उन भगवान्ने योगका अवलम्बन कर प्रजापतिने जैसी सृष्टि पूर्वमें की थी, वैसी ही विविध प्रकारके जगत्की सृष्टि की। योगविद्यासे उन्होंने मरीचि, भृगु, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठको उत्पन्न किया। पुराणोंके अनुसार यह निश्चित है कि ये नौ ब्रह्माण कहलाते हैं। ये सभी ब्रह्माके समान हैं, साधक हैं और ब्रह्मवादी हैं॥ ८५–८७॥