संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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६४ * कूर्मपुराण *
| सृजत्यशेषमेवेदं यः स्वकर्मानुरूपतः।<br>स्वात्मन्यवस्थितस्तस्मै चतुर्वक्त्रात्मने नमः॥ ६२॥ | जो प्राणियोंके अपने-अपने कर्मोंके अनुसार इस सम्पूर्ण (जगत्)-की सृष्टि करते हैं, उन अपनी आत्मामें प्रतिष्ठित चतुर्मुखात्मक (ब्रह्मा)-को नमस्कार है। |
| यः शेषशयने शेते विश्वमावृत्य मायया।<br>स्वात्मानुभूतियोगेन तस्मै विश्वात्मने नमः॥ ६३॥ | जो अपने आत्मामें प्रतिष्ठित अनुभूतिरूप योगसे (प्रेरित) मायाद्वारा सम्पूर्ण विश्वको आवृतकर शेष (शेषनाग)-की शय्यापर शयन करते हैं, उन विश्वात्माको नमस्कार है। |
| बिभर्ति शिरसा नित्यं द्विसप्तभुवनात्मकम्।<br>ब्रह्माण्डं योऽखिलाधारस्तस्मै शेषात्मने नमः॥ ६४॥ | जो चौदह भुवनोंवाले ब्रह्माण्डको नित्य अपने सिरपर धारण किये रहते हैं और जो सभीके आश्रय हैं, उन शेषात्माको नमस्कार है॥ ६२-६४॥ |
| यः परान्ते परानन्दं पीत्वा दिव्यैकसाक्षिकम्।<br>नृत्यत्यनन्तमहिमा तस्मै रुद्रात्मने नमः॥ ६५॥ | जो महाप्रलयकालमें दिव्य एवं एकमात्र साक्षीरूप परमानन्दका आस्वादन करते हुए नृत्य करते हैं, उन अनन्त महिमावाले रुद्रात्माको नमस्कार है। |
| योऽन्तरा सर्वभूतानां नियन्ता तिष्ठतीश्वरः।<br>तं सर्वसाक्षिणं देवं नमस्ये भवतस्तनुम्॥ ६६॥ | जो ईश्वर सभी प्राणियोंके भीतर नियन्ताके रूपमें प्रतिष्ठित रहते हैं, उन सर्वसाक्षी देव और उनके शरीररूप (देव)-को मैं नमस्कार करता हूँ। |
| यं विनिद्रा जितश्वासाः संतुष्टाः समदर्शिनः।<br>ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः॥ ६७॥ | निद्रारहित, श्वासको जीतनेवाले, संतुष्ट तथा समदर्शी (योगीजन समाधिमें) जिस ज्योति या प्रकाशका दर्शन करते हैं, उन योगात्माको नमस्कार है। |
| यया संतरते मायां योगी संक्षीणकल्मषः।<br>अपारतरपर्यन्तां तस्मै विद्यात्मने नमः॥ ६८॥ | जिस (विद्या)-के द्वारा पुण्यात्मा योगीजन अत्यन्त कठिनतासे पार की जा सकनेवाली मायाको सरलतासे पार कर लेते हैं, उस विद्यास्वरूप (देव)-को नमस्कार है। |
| यस्य भासा विभातीदमद्वयं तमसः परम्।<br>प्रपद्ये तत् परं तत्त्वं तद्रूपं परमेश्वरम्॥ ६९॥ | जिसके प्रकाशसे यह (विश्व) प्रकाशित होता है, मैं (उस) अन्धकारसे सर्वथा रहित अर्थात् प्रकाशस्वरूप और अद्वितीय परम तत्त्व-स्वरूप (तद्रूप परम-तत्त्व मात्र ही जिनका स्वरूप है, उन) परमेश्वरकी शरण ग्रहण करता हूँ। |
| नित्यानन्दं निराधारं निष्कलं परमं शिवम्।<br>प्रपद्ये परमात्मानं भवन्तं परमेश्वरम्॥ ७०॥ | मैं नित्यानन्दस्वरूप, निराधार, निष्कल परमात्मा, परमेश्वर आप परम शिवकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ६५-७०॥ |
| एवं स्तुत्वा महादेवं ब्रह्मा तद्भावभावितः।<br>प्राञ्जलिः प्रणतस्तस्थौ गृणन् ब्रह्म सनातनम्॥ ७१॥ | इस प्रकार महादेवकी स्तुतिकर ब्रह्मा उनकी भावनासे भावित होकर सनातन ब्रह्मको सम्बोधित करते हुए विनयपूर्वक हाथ जोड़े हुए खड़े हो गये॥ ७१॥ |
| ततस्तस्मै महादेवो दिव्यं योगमनुत्तमम्।<br>ऐश्वर्यं ब्रह्मसद्भावं वैराग्यं च ददौ हरः॥ ७२॥ | तदनन्तर महादेव हरने उन्हें सर्वश्रेष्ठ दिव्य योग (ज्ञान), ऐश्वर्य, ब्रह्मकी सद्भावना (ब्रह्मविषयक उत्तम भाव) तथा वैराग्य प्रदान किया। |
| कराभ्यां सुशुभाभ्यां च संस्पृश्य प्रणतार्तिहा।<br>व्याजहार स्वयं देवः सोऽनुगृह्य पितामहम्॥ ७३॥ | शरणागतोंका कष्ट हरनेवाले उन (शंकर) देवने स्वयं अपने मनोरम एवं कल्याणकारी हाथोंके द्वारा उनका (ब्रह्माका) स्पर्श किया और उनपर अनुग्रह करके वे बोले-॥ ७२-७३॥ |