संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 73, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 73
- अध्याय १० * ६३
| नमो वेदरहस्याय कालकालाय ते नमः।<br>वेदान्तसारसाराय नमो वेदात्ममूर्तये ॥ ४७ ॥<br><br>नमो बुद्धाय शुद्धाय योगिनां गुरवे नमः।<br>प्रहीणशोकैर्विविधैर्भूतैः परिवृताय ते ॥ ४८ ॥<br><br>नमो ब्रह्मण्यदेवाय ब्रह्माधिपतये नमः।<br>त्रियम्बकाय देवाय नमस्ते परमेष्ठिने ॥ ४९ ॥ | वेदोंके रहस्यरूपको नमस्कार है। कालके भी काल आपको नमस्कार है। वेदान्तसारके भी सारको नमस्कार है। वेदात्ममूर्तिको नमस्कार है। शुद्ध-बुद्धस्वरूपको नमस्कार है। योगियोंके गुरुको नमस्कार है। शोकोंसे रहित विविध भूतोंसे घिरे हुए आपको नमस्कार है। ब्रह्मण्यदेवको नमस्कार है। ब्रह्माधिपतिके लिये नमस्कार है। त्रिलोचन परमेष्ठी देवको नमस्कार है ॥ ४७–४९ ॥ |
| नमो दिग्वाससे तुभ्यं नमो मुण्डाय दण्डिने।<br>अनादिमलहीनाय ज्ञानगम्याय ते नमः ॥ ५० ॥<br><br>नमस्ताराय तीर्थाय नमो योगर्द्धिहेतवे।<br>नमो धर्माधिगम्याय योगगम्याय ते नमः ॥ ५१ ॥<br><br>नमस्ते निष्प्रपञ्चाय निराभासाय ते नमः।<br>ब्रह्मणे विश्वरूपाय नमस्ते परमात्मने ॥ ५२ ॥ | दिगम्बर ! आपको नमस्कार है। मुण्ड (की माला) एवं दण्ड धारण करनेवालेको नमस्कार है। अनादि तथा मलरहित (शुद्धरूप), ज्ञानगम्य आपको नमस्कार है। तारक एवं तीर्थरूप तथा योगविभूतियोंके मूल कारणको नमस्कार है। धर्म (धर्माचरण)-के द्वारा प्राप्य, योगगम्य आपको नमस्कार है। निष्प्रपञ्चको नमस्कार है। निराभास ! आपको नमस्कार है। विश्वरूप ब्रह्म परमात्माको नमस्कार है ॥ ५०–५२ ॥ |
| त्वयैव सृष्टमखिलं त्वय्येव सकलं स्थितम्।<br>त्वया संह्रियते विश्वं प्रधानाद्यं जगन्मय ॥ ५३ ॥<br><br>त्वमीश्वरो महादेवः परं ब्रह्म महेश्वरः।<br>परमेष्ठी शिवः शान्तः पुरुषो निष्कलो हरः ॥ ५४ ॥<br><br>त्वमक्षरं परं ज्योतिस्त्वं कालः परमेश्वरः।<br>त्वमेव पुरुषोऽनन्तः प्रधानं प्रकृतिस्तथा ॥ ५५ ॥ | जगन्मय ! आपके द्वारा ही यह सम्पूर्ण (जगत्) रचा गया है, आपमें ही यह सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है और आप ही प्रधानादि समस्त विश्वका संहार करते हैं। आप ईश्वर, महादेव, परब्रह्म, महेश्वर, परमेष्ठी, शिव, शान्त, पुरुष, निष्कल तथा हर हैं। आप अक्षर, परम ज्योति हैं, आप काल तथा परमेश्वर हैं और आप ही प्रधान पुरुष, प्रकृति तथा अनन्त हैं ॥ ५३–५५ ॥ |
| भूमिरापोऽनलो वायुर्व्योमाहंकार एव च।<br>यस्य रूपं नमस्यामि भवन्तं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ५६ ॥<br><br>यस्य द्यौर्भवन्मूर्धा पादौ पृथ्वी दिशो भुजाः।<br>आकाशमुदरं तस्मै विराजे प्रणमाम्यहम् ॥ ५७ ॥<br>संतापयति यो विश्वं स्वभाभिर्भासयन् दिशः।<br>ब्रह्मतेजोमयं नित्यं तस्मै सूर्यात्मने नमः ॥ ५८ ॥<br><br>हव्यं वहति यो नित्यं रौद्री तेजोमयी तनुः।<br>कव्यं पितृगणानां च तस्मै वह्नयात्मने नमः ॥ ५९ ॥<br><br>आप्यायति यो नित्यं स्वधाम्ना सकलं जगत्।<br>पीयते देवतासंघैस्तस्मै सोमात्मने नमः ॥ ६० ॥ | भूमि, जल, वायु, अग्नि, आकाश एवं अहंकार—ये जिसके रूप हैं, उन ब्रह्मसंज्ञक आपको नमस्कार करता हूँ। द्युलोक जिनका मस्तक है, पृथ्वी पैर है, दिशाएँ जिनकी भुजाएँ हैं और आकाश जिनका उदर है, उन विराट् पुरुषको मेरा प्रणाम है। जो अपने प्रकाशसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करते हुए विश्वको अपेक्षित उष्णता प्रदान करते हैं, उन नित्य ब्रह्म तेजोमय सूर्यरूपको नमस्कार है। जो अपने रौद्र तेजोमय शरीरसे (देवताओंको) हव्य तथा पितरोंको कव्य पहुँचाते हैं, उन अग्निस্বরূপ (देव)-को नमस्कार है। जो अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत्को नित्य संतृप्त करते हैं और देवतासमूहके द्वारा जिनका पान किया जाता है, उन सोमरूप चन्द्रदेवको नमस्कार है ॥ ५६–६० ॥ |
| बिभर्त्यशेषभूतानि योऽन्तश्चरति सर्वदा।<br>शक्तिर्माहेश्वरी तुभ्यं तस्मै वाय्वात्मने नमः ॥ ६१ ॥ | जो सम्पूर्ण प्राणियोंका भरण-पोषण करती है और जो (सभी प्राणियोंके) भीतर सदा विचरण करती है, ऐसी वायुरूपात्मक माहेश्वरीशक्ति आपको नमस्कार है ॥ ६१ ॥ |