संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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६२ * कूर्मपुराण *
| मा स्त्राक्षीरीदृशीर्देव प्रजा मृत्युविवर्जिताः ।<br>अन्याः सृजस्व भूतेश जन्ममृत्युसमन्विताः ॥ ३६ ॥ | हे देव! मृत्युसे रहित इस प्रकारकी सृष्टि मत करो। भूतेश! जन्म एवं मृत्युवाली दूसरी प्रकारकी सृष्टि करो॥ ३६॥ |
| ततस्तमाह भगवान् कपर्दी कामशासनः ।<br>नास्ति मे तादृशः सर्गः सृज त्वमशुभाः प्रजाः ॥ ३७ ॥ | तदनन्तर कामपर शासन करनेवाले जटाजूटधारी भगवान् (शिव)—ने उनसे कहा—मेरे पास उस प्रकारकी (जन्म-मृत्युसे युक्त) सृष्टि नहीं है। (ऐसी) अशुभ प्रजाओंको आप ही उत्पन्न करें। तबसे उन देवने अशुभ प्रजाओंकी सृष्टि नहीं की। (और) अपने आत्मज उन रुद्रोंके साथ वे निवृत्तात्मा (क्रियारहित)—के रूपमें स्थित हो गये। इसी कारण देवोंमें देव उन शूलधारी (शंकर)—का स्थाणुत्व हुआ (अर्थात् वे ‘स्थाणु’^१ इस नामसे प्रसिद्ध हो गये) ॥ ३७-३८ ॥ |
| ततः प्रभृति देवोऽसौ न प्रसूतेऽशुभाः प्रजाः ।<br>स्वात्मजैरेव तै रुद्रैर्निवृत्तात्मा ह्यतिष्ठत ।<br>स्थाणुत्वं तेन तस्यासीद् देवदेवस्य शूलिनः ॥ ३८ ॥<br>ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यं तपः सत्यं क्षमा धृतिः ।<br>स्रष्टृत्वमात्मसम्बोधो ह्यधिष्ठातृत्वमेव च ॥ ३९ ॥ | भगवान् शंकरमें ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, तप, सत्य, क्षमा, धृति, स्रष्टृत्व, आत्मज्ञान तथा अधिष्ठातृत्व—ये दस अव्यय (शाश्वत) गुण सदा प्रतिष्ठित रहते हैं। ये पिनाक धारण करनेवाले शंकर ही साक्षात् परमेश्वर हैं ॥ ३९-४० ॥ |
| अव्ययानि दशैतानि नित्यं तिष्ठन्ति शंकरे ।<br>स एव शंकरः साक्षात् पिनाकी परमेश्वरः ॥ ४० ॥<br>ततः स भगवान् ब्रह्मा वीक्ष्य देवं त्रिलोचनम् ।<br>सहैव मानसैः पुत्रैः प्रीतिविस्फारिलोचनः ॥ ४१ ॥ | तदनन्तर प्रीतिसे विकसित नेत्रवाले भगवान् ब्रह्माने तीन नेत्रोंवाले देव (शंकर)—को मानस पुत्रोंके साथ देखा। ब्रह्माने अपनी ज्ञान-दृष्टिसे ईश्वर-सम्बन्धी परात्पर भावको जानकर जगत्के एकमात्र स्वामी (भगवान् शंकर)—की अपने मस्तकपर हाथोंकी अंजलि बाँधकर स्तुति की ॥ ४१-४२ ॥ |
| ज्ञात्वा परतरं भावमैश्वरं ज्ञानचक्षुषा ।<br>तुष्टाव जगतामेकं कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम् ॥ ४२ ॥ | |
| ब्रह्मोवाच<br>नमस्तेऽस्तु महादेव नमस्ते परमेश्वर ।<br>नमः शिवाय देवाय नमस्ते ब्रह्मरूपिणे ॥ ४३ ॥<br><br>नमोऽस्तु ते महेशाय नमः शान्ताय हेतवे ।<br>प्रधानपुरुषेशाय योगाधिपतये नमः ॥ ४४ ॥<br><br>नमः कालाय रुद्राय महाग्रासाय शूलिने ।<br>नमः पिनाकहस्ताय त्रिनेत्राय नमो नमः ॥ ४५ ॥<br><br>नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं ब्रह्मणो जनकाय ते ।<br>ब्रह्मविद्याधिपतये ब्रह्मविद्याप्रदायिने ॥ ४६ ॥ | ब्रह्माने कहा—महादेव! आपको नमस्कार है। परमेश्वर! आपको नमस्कार है। शिवको नमस्कार है। ब्रह्मरूपी देवको नमस्कार है। महेश! आपको नमस्कार है। शान्तिके मूलहेतु! आपको नमस्कार है। प्रधान पुरुषेश! आपको नमस्कार है तथा योगाधिपति आपको नमस्कार है। काल, रुद्र, महाग्रास^२ तथा शूलीको नमस्कार है। हाथमें पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। तीन नेत्रवालेको बार-बार नमस्कार है। त्रिमूर्तिस्वरूप आपको नमस्कार है। ब्रह्माके उत्पत्तिकर्ता आपके लिये नमस्कार है। ब्रह्मविद्याके अधिपति और ब्रह्मविद्या प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ४३—४६ ॥ |
१-स्थाणु-ठूँठ। ठूँठकी ही तरह निष्क्रिय होनेसे शिवको स्थाणु कहा गया है।
२-महाप्रलयमें भगवान् शंकर समस्त प्राणियोंको अपनी गोदमें सुला लेते हैं—इसलिये महाग्रास कहे जाते हैं।