भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 506 में से

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पृष्ठ 71

* अध्याय १० *

६१


रुरोद सुस्वरं घोरं देवदेवः स्वयं शिवः।<br>रोदमानं ततो ब्रह्मा मा रोदीरित्यभाषत।<br>रोदनाद् रुद्र इत्येवं लोके ख्यातिं गमिष्यसि ॥ २३॥देवोंके भी देव स्वयं शिव उच्च स्वरमें घोर रुदन करने लगे। तब रुदन करते हुए उनसे ब्रह्माने 'मत रोओ'—इस प्रकारसे कहा। तुम रुदन करनेके कारण 'रुद्र' इस नामसे संसारमें प्रसिद्धि प्राप्त करोगे ॥ २३॥
अन्यानि सप्त नामानि पत्नीः पुत्रांश्च शाश्वतान्।<br>स्थानानि चैषामष्टानां ददौ लोकपितामहः ॥ २४॥लोकपितामहने (उन्हें रुद्रके अतिरिक्त) अन्य सात नाम, (आठ) पत्नियाँ, शाश्वत (दीर्घायु) पुत्र और आठ स्थानों* (मूर्तियों)-को प्रदान किया ॥ २४॥
भवः शर्वस्तथेशानः पशूनां पतिरेव च।<br>भीमश्चोग्रो महादेवस्तानि नामानि सप्त वै॥ २५॥<br>सूर्यो जलं मही वह्निर्वायुराकाशमेव च।<br>दीक्षितो ब्राह्मणश्चन्द्र इत्येता अष्टमूर्तयः ॥ २६॥भव, शर्व, ईशान, पशुपति, भीम, उग्र तथा महादेव—ये सात नाम हैं। सूर्य, जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश, दीक्षित ब्राह्मण तथा चन्द्र—ये (रुद्रकी) आठ मूर्तियाँ हैं ॥ २५-२६॥
स्थानेष्वेतेषु ये रुद्रं ध्यायन्ति प्रणमन्ति च।<br>तेषामष्टतनुर्देवो ददाति परमं पदम् ॥ २७॥जो इन आठ स्थानों (मूर्तिरूपों)-में रुद्रका ध्यान करते हैं और उन्हें प्रणाम करते हैं, उन्हें अष्टमूर्तिरूप देव (भगवान् शिव अपना) परम पद देते हैं ॥ २७॥
सुवर्चला तथैवोमा विकेशी च तथा शिवा।<br>स्वाहा दिशश्च दीक्षा च रोहिणी चेति पत्नयः ॥ २८॥सुवर्चला, उमा, विकेशी, शिवा, स्वाहा, दिशाएँ, दीक्षा तथा रोहिणी—ये ही (रुद्रकी आठ) पत्नियाँ हैं।
शनैश्चरस्तथा शुक्नो लोहिताङ्गो मनोजवः।<br>स्कन्दः सर्गोऽथ संतानो बुधश्चैषां सुताः स्मृताः ॥ २९॥शनैश्चर, शुक्र, लोहिताङ्ग (मंगल), मनोजव (कामदेव), स्कन्द, सर्ग, संतान तथा बुध—ये (आठ उनके) पुत्र कहे गये हैं ॥ २८-२९॥
एवम्प्रकारो भगवान् देवदेवो महेश्वरः।<br>प्रजाधर्मं च कामं च त्यक्त्वा वैराग्यमाश्रितः ॥ ३०॥इस प्रकारके देवाधिदेव भगवान् महेश्वरने प्रजाधर्म (सृष्टिकार्य) एवं काम (वासना)-का परित्यागकर वैराग्यका आश्रय ग्रहण किया। उस शाश्वत, परम अमृतरूपी अक्षर ब्रह्मका आस्वादनकर और आत्मामें आत्मतत्त्वका आधानकर वे ईश्वरभावमें स्थित हो गये ॥ ३०-३१॥
आत्मन्याधाय चात्मानमैश्वरं भावमास्थितः।<br>पीत्वा तदक्षरं ब्रह्म शाश्वतं परमामृतम् ॥ ३१॥
प्रजाः सृजेति चादिष्टो ब्रह्मणा नीललोहितः।<br>स्वात्मना सदृशान् रुद्रान् ससर्ज मनसा शिवः ॥ ३२॥ब्रह्माके द्वारा 'प्रजाकी सृष्टि करो' इस प्रकारका आदेश प्राप्तकर नीललोहित शिवने मनसे अपने ही समान रुद्रोंकी सृष्टि की ॥ ३२॥
कपर्दिनो निरातङ्कान् नीलकण्ठान् पिनाकिनः।<br>त्रिशूलहस्तानृष्टिघ्नान् महानन्दांस्त्रिलोचनान् ॥ ३३॥प्रभुने सैकड़ों करोड़ जटाजूट धारण करनेवाले, भयरहित, नीलकण्ठ, पिनाकपाणि, हाथमें त्रिशूल धारण किये, ऋष्टिघ्न, महान् आनन्दस्वरूप, तीन नेत्रयुक्त, जरा-मरणसे रहित, विशाल वृषभोंको वाहनरूपमें स्वीकार करनेवाले सर्वज्ञ तथा वीतराग (रुद्रों)-को उत्पन्न किया ॥ ३३-३४॥
जरामरणनिर्मुक्तान् महावृषभवाहनान्।<br>वीतरागांश्च सर्वज्ञान् कोटिकोटिशतान् प्रभुः ॥ ३४॥
तान् दृष्ट्वा विविधान् रुद्रान् निर्मलान् नीललोहितान्।<br>जरामरणनिर्मुक्तान् व्याजहार हरं गुरुः ॥ ३५॥गुरु (ब्रह्मा)-ने जरा-मरणसे रहित, नीललोहित एवं निर्मल उन अनेक रुद्रोंको देखकर हर (शिव)-से कहा ॥ ३५॥

* ये आठ स्थान सूर्य, जल आदि आगे गिनाये गये हैं। इनमें रुद्रका निवास है। इसीलिये ये आठ रुद्रकी मूर्ति माने जाते हैं।

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