संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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६० * कूर्मपुराण *
| ततोऽवतीर्य विश्वात्मा देहमाविश्य चक्रिणः।<br>अवाप वैष्णवीं निद्रामेकीभूयाथ विष्णुना ॥ ९ ॥ | तब विश्वात्मा (ब्रह्मा) नीचे उतरे और चक्र धारण करनेवाले विष्णुकी देहमें प्रविष्ट होकर वैष्णवी निद्राको प्राप्त हो गये। इस प्रकार विष्णुसे उनकी एकात्मता हो गयी ॥ ९ ॥ |
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| सहस्रशीर्षनयनः शङ्खचक्रगदाधरः।<br>ब्रह्मा नारायणाख्योऽसौ सुष्वाप सलिले तदा ॥ १० ॥<br><br>सोऽनुभूय चिरं कालमानन्दं परमात्मनः।<br>अनाद्यनन्तमद्वैतं स्वात्मानं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ११ ॥<br><br>ततः प्रभाते योगात्मा भूत्वा देवश्चतुर्मुखः।<br>ससर्ज सृष्टिं तद्रूपां वैष्णवं भावमाश्रितः ॥ १२ ॥ | तब हजारों सिर तथा हजारों नेत्रवाले और शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले वे नारायण नामवाले ब्रह्मा जलमें सो गये। उन्होंने बहुत समयतक परमात्माके अनादि, अनन्त, आत्मस्वरूप, ब्रह्मसंज्ञक अद्वैत आनन्दका अनुभव किया। तदनन्तर प्रभातकाल होनेपर योगात्मा देव चतुर्मुख होकर और वैष्णव भावका आश्रय ग्रहणकर उसी प्रकारकी (वैष्णवी) सृष्टि करने लगे ॥ १०–१२ ॥ |
| पुरस्तादसृजद् देवः सनन्दं सनकं तथा।<br>ऋभुं सनत्कुमारं च पूर्वजं तं सनातनम् ॥ १३ ॥<br><br>ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः परं वैराग्यमास्थिताः।<br>विदित्वा परमं भावं न सृष्टौ दधिरे मतिम् ॥ १४ ॥<br><br>तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ पितामहः।<br>बभूव नष्टचेता वै मायया परमेष्ठिनः ॥ १५ ॥<br><br>ततः पुराणपुरुषो जगन्मूर्तिर्जनार्दनः।<br>व्याजहारात्मनः पुत्रं मोहनाशाय पद्मजम् ॥ १६ ॥ | उन देवने सर्वप्रथम पूर्वजोंके भी पूर्वज सनन्दन, सनक, ऋभु, सनत्कुमार तथा सनातनको उत्पन्न किया। (सुख-दुःख आदि) द्वन्द्व एवं मोह (आसक्ति)-से सर्वथा शून्य एवं परम वैराग्यभावमें स्थित इन सनक आदि ऋषियोंने परम तत्त्वको जानकर सृष्टिकार्यमें अपनी बुद्धि नहीं लगायी। उन (सनकादि)-के इस प्रकारके लोक-सृष्टिसे सर्वथा निरपेक्षभावको देखकर पितामह (ब्रह्मा) परमेष्ठी (परमात्मा—जनार्दन)-की मायासे मोहित हो गये। तब जगन्मूर्ति, पुराणपुरुष, जनार्दनने (नाभि) कमलसे उत्पन्न अपने पुत्र (ब्रह्मा)-का मोह नष्ट करनेके लिये उनसे कहा— ॥ १३–१६ ॥ |
| विष्णुरुवाच<br>कच्चिन्न विस्मृतो देवः शूलपाणिः सनातनः।<br>यदुक्तवानात्मनोऽसौ पुत्रत्वे तव शंकरः ॥ १७ ॥ | **विष्णु बोले—**कहीं आप शूलपाणि सनातन-देवको भूल तो नहीं गये? उन शंकरने अपनेको आपके पुत्र-रूपमें होनेकी बात कही थी ॥ १७ ॥ |
| अवाप्य संज्ञां गोविन्दात् पद्मयोनिः पितामहः।<br>प्रजाः स्रष्टुमनास्तेपे तपः परमदुश्चरम् ॥ १८ ॥<br><br>तस्यैवं तप्यमानस्य न किञ्चित् समवर्तत।<br>ततो दीर्घेण कालेन दुःखात् क्रोधोऽभ्यजायत ॥ १९ ॥ | गोविन्दसे चेतना प्राप्तकर पद्मयोनि पितामह प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छासे परम दुश्चर तप करने लगे। उनके इस प्रकार (दीर्घकालतक) तप करनेपर (भी) किसी भी प्रकारकी सृष्टि नहीं हुई। बहुत समय बीत जानेपर उन्हें दुःखसे क्रोध उत्पन्न हुआ ॥ १८–१९ ॥ |
| क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः।<br>ततस्तेभ्योऽश्रुबिन्दुभ्यो भूताः प्रेतास्तथाभवन् ॥ २० ॥<br><br>सर्वांस्तानश्रुजान् दृष्ट्वा ब्रह्मात्मानमनिन्दत।<br>जहौ प्राणांश्च भगवान् क्रोधाविष्टः प्रजापतिः ॥ २१ ॥ | क्रोधाविष्ट उनके (ब्रह्माके) नेत्रोंसे आँसूकी बूँदें गिरीं। तब उन आँसुओंकी बूँदोंसे भूत-प्रेत उत्पन्न हुए। आँसुओंसे उत्पन्न उन सब (भूत-प्रेतों)-को देखकर क्रोधाविष्ट प्रजापति भगवान् ब्रह्माने अपनी ही निन्दा की और अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया ॥ २०–२१ ॥ |
| तदा प्राणमयो रुद्रः प्रादुरासीत् प्रभोर्मुखात्।<br>सहस्रादित्यसंकाशो युगान्तदहनोपमः ॥ २२ ॥ | तदनन्तर प्रभुके मुखसे हजारों सूर्यके समान देदीप्य-मान तथा प्रलयकालीन अग्निके सदृश प्राणमय रुद्र प्रकट हुए ॥ २२ ॥ |