भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १० * ५९

इतीदमुक्त्वा भगवाननादिः
स्वमायया मोहितभूतभेदः।
जगाम जन्मर्धिविनाशहीनं
धामैकमव्यक्तमनन्तशक्तिः ॥ ८७ ॥

ऐसा कहकर अपनी मायासे सम्पूर्ण प्राणियोंको मोहित करनेवाले अनादि एवं अनन्तशक्तिसम्पन्न भगवान् जन्म, विकास एवं विनाशसे रहित (अपने) अव्यक्त धाम (स्थान)-को चले गये॥ ८७ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें नवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ॥


दसवाँ अध्याय

विष्णुद्वारा मधु तथा कैटभका वध, नाभिकमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा सनकादिकी सृष्टि, ब्रह्मासे रुद्रकी उत्पत्ति, रुद्रकी अष्टमूर्तियों, आठ नामों तथा आठ पत्नियोंका वर्णन, रुद्रके द्वारा अनेक रुद्रोंकी उत्पत्ति तथा पुनः वैराग्य ग्रहण करना, ब्रह्माद्वारा रुद्रकी स्तुति तथा माहात्म्य-वर्णन, रुद्रद्वारा ब्रह्माको ज्ञानकी प्राप्ति, महादेवका त्रिमूर्तित्व और ब्रह्माद्वारा अनेक प्रकारकी सृष्टि

श्रीकूर्म उवाच

गते महेश्वरे देवे स्वाधिवासं पितामहः।
तदेव सुमहत् पद्मं भेजे नाभिसमुत्थितम्॥ १॥
श्रीकूर्मने कहा—महेश्वर देवके अपने निवास-स्थानपर चले जानेके बाद पितामह (ब्रह्मा), (भगवान् विष्णुकी) नाभिसे उत्पन्न उसी विशाल सुन्दर कमलपर रहने लगे॥ १॥

अथ दीर्घेण कालेन तत्राप्रतिमपौरुषौ।
महासुरौ समायातौ भ्रातरौ मधुकैटभौ॥ २॥

क्रोधेन महताविष्टौ महापर्वतविग्रहौ।
कर्णान्तरसमुद्भूतौ देवदेवस्य शार्ङ्गिणः॥ ३॥

तावागतौ समीक्ष्याह नारायणमजो विभुः।
त्रैलोक्यकण्टकावेतावसुरौ हन्तुमर्हसि॥ ४॥
एक लम्बा समय व्यतीत हो जानेपर वहाँ अतुलित शक्तिवाले मधु तथा कैटभ नामक दो असुर आये, जो परस्पर भाई थे। देवोंके भी देव शार्ङ्गधारी भगवान् विष्णुके कानसे उत्पन्न तथा विशाल पर्वतके समान शरीरवाले और महान् क्रोधसे आविष्ट उन दोनों (मधु-कैटभ)-को आया हुआ देखकर अजन्मा, विभु (ब्रह्मा)-ने नारायणसे कहा—ये दोनों असुर तीनों लोकोंके लिये कण्टक हैं, आप इन्हें मारें॥ २—४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हरिनारायणः प्रभुः।
आज्ञापयामास तयोर्वधार्थं पुरुषावुभौ॥ ५॥
उनके इस वचनको सुनकर प्रभु नारायण हरिने उन दोनोंका वध करनेके लिये (जिष्णु तथा विष्णु नामक) दो पुरुषोंको आज्ञा दी॥ ५॥

तदाज्ञया महद्युद्धं तयोस्ताभ्यामभूद् द्विजाः।
व्यनयत् कैटभं विष्णुर्जिष्णुश्च व्यनयन्मधुम्॥ ६॥

ततः पद्मासनासीनं जगन्नाथं पितामहम्।
बभाषे मधुरं वाक्यं स्नेहाविष्टमना हरिः॥ ७॥
हे ब्राह्मणो! उनकी आज्ञासे उन (विष्णु तथा जिष्णु)-से उन दोनों (मधु-कैटभ) असुरोंका महान् युद्ध हुआ। विष्णुने कैटभको जीता और जिष्णुने मधुको जीता। तदनन्तर स्नेहसे आविष्ट मनवाले हरिने कमलके आसनपर आसीन तथा जगन्नाथ पितामहसे मधुर वचन कहा—॥ ६-७॥

अस्मान्मयोच्यमानस्त्वं पद्मादवतर प्रभो।
नाहं भवन्तं शक्नोमि वोढुं तेजोमयं गुरुम्॥ ८॥
प्रभो! मेरे कहनेसे आप अब इस कमलसे नीचे उतरें। तेजोमय, बहुत भारी आपको ढोनेमें मैं असमर्थ हूँ॥ ८॥