संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- कूर्मपुराण *
| मोहितोऽस्मि महादेव मायया सूक्ष्मया त्वया।<br>न जाने परमं भावं याथातथ्येन ते शिव ॥ ७२ ॥ | महादेव! मैं आपकी सूक्ष्म मायाद्वारा मोहित कर लिया गया हूँ। शिव! मैं आपके परम भावको यथार्थ-रूपमें नहीं जानता हूँ। देव! आप ही भक्तोंके माता-पिता, भाई तथा मित्र हैं। आप प्रसन्न हों। मैं आपके चरणकमलोंमें प्रणाम करता हूँ और आपकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ७२-७३॥ |
| त्वमेव देव भक्तानां भ्राता माता पिता सुहृत्।<br>प्रसीद तव पादाब्जं नमामि शरणं गतः॥ ७३॥ | |
| स तस्य वचनं श्रुत्वा जगन्नाथो वृषध्वजः।<br>व्याजहार तदा पुत्रं समालोक्य जनार्दनम्॥ ७४॥ | तदनन्तर जगत्के स्वामी वृषध्वज (शंकर)-ने उनके वचन सुनकर पुत्र (रूप) जनार्दन (विष्णु)-की ओर देखकर (ब्रह्मासे) कहा—॥ ७४॥ |
| यदर्थितं भगवता तत् करिष्यामि पुत्रक।<br>विज्ञानमैश्वरं दिव्यमुत्पत्स्यति तवानघ ॥ ७५ ॥ | हे पुत्रक! तुमने जैसी इच्छा की है मैं वैसा ही करूँगा। अनघ! तुम्हें ईश्वर-सम्बन्धी दिव्य ज्ञान प्राप्त होगा। मेरे द्वारा तुम्हीं सभी प्राणियोंके प्रथम स्रष्टाके रूपमें नियुक्त किये गये हो। अतः देवेश! लोकपितामह! तुम वैसा ही करो। ये नारायण एवं अनन्त (भगवान् विष्णु) मेरी ही श्रेष्ठ मूर्ति हैं। ये ईशान हरि तुम्हारे योग-क्षेमका वहन करनेवाले होंगे॥ ७५-७७॥ |
| त्वमेव सर्वभूतानामादिकर्ता नियोजितः।<br>तथा कुरुष्व देवेश मया लोकपितामह॥ ७६ ॥ | |
| एष नारायणोऽनन्तो ममैव परमा तनुः।<br>भविष्यति तवेशानो योगक्षेमवहो हरिः॥ ७७ ॥ | |
| एवं व्याहृत्य हस्ताभ्यां प्रीतात्मा परमेश्वरः।<br>संस्पृश्य देवं ब्रह्माणं हरिं वचनमब्रवीत् ॥ ७८ ॥ | ऐसा कहकर प्रसन्नचित्त परमेश्वर (शिव)-ने हाथोंसे देव ब्रह्माका स्पर्शकर हरि (विष्णु)-से कहा—हे जगन्मूर्ति! तुम्हारी भक्तिसे मैं तुमपर सर्वथा प्रसन्न हूँ। वर माँगो। तत्त्वतः हम दोनों भिन्न नहीं हैं॥ ७८-७९॥ |
| तुष्टोऽस्मि सर्वथाहं ते भक्त्या तव जगन्मय।<br>वरं वृणीष्व नह्यावां विभिन्नौ परमार्थतः॥ ७९ ॥ | |
| श्रुत्वाथ देववचनं विष्णुर्विश्वजगन्मयः।<br>प्राह प्रसन्नया वाचा समालोक्य चतुर्मुखम्॥ ८० ॥ | इसके बाद महादेवका वचन सुनकर विश्वमय, जगन्मय विष्णुने चतुर्मुख ब्रह्माकी ओर देखकर प्रीतियुक्त वाणीमें (महादेवसे) कहा—मेरे लिये यही श्लाघनीय वर है कि मैं आप परमेश्वर परमात्माका दर्शन कर रहा हूँ। मेरी आपमें भक्ति हो॥ ८०-८१॥ |
| एष एव वरः श्लाघ्यो यदहं परमेश्वरम्।<br>पश्यामि परमात्मानं भक्तिर्भवतु मे त्वयि॥ ८१ ॥ | |
| तथेत्युक्त्वा महादेवः पुनर्विष्णुमभाषत।<br>भवान् सर्वस्य कार्यस्य कर्ताहमधिदैवतम्॥ ८२ ॥ | 'ऐसा ही हो', यह कहकर महादेवने पुनः विष्णुसे कहा—आप सभी कार्योंके कर्ता हैं और मैं अधिदेवता हूँ। यह सब कुछ मेरा और आपका ही रूप है, इसमें कोई संदेह नहीं है। आप चन्द्रमा हैं, मैं सूर्य हूँ। आप रात्रि हैं, मैं दिन हूँ। आप प्रकृति हैं और मैं ही अव्यक्त पुरुष हूँ। आप ज्ञानरूप हैं और मैं ज्ञाता हूँ, आप मायारूप हैं और मैं ईश्वर हूँ। आप विद्यात्मिका शक्ति हैं, मैं शक्तिमान् ईश्वर हूँ और निष्कल देव परस्वरूप नारायण भी मैं ही हूँ॥ ८२-८५॥ |
| मन्मयं त्वन्मयं चैव सर्वमेतन्न संशयः।<br>भवान् सोमस्त्वहं सूर्यो भवान् रात्रिरहं दिनम्॥ ८३ ॥ | |
| भवान् प्रकृतिरव्यक्तमहं पुरुष एव च।<br>भवान् ज्ञानमहं ज्ञाता भवान् मायाहमीश्वरः॥ ८४ ॥ | |
| भवान् विद्यात्मिका शक्तिः शक्तिमानहमीश्वरः।<br>योऽहं सुनिष्कलो देवः सोऽपि नारायणः परः॥ ८५ ॥ | |
| एकीभावेन पश्यन्ति योगिनो ब्रह्मवादिनः।<br>त्वामनाश्रित्य विश्वात्मन् न योगी मामुपैष्यति।<br>पालयैतज्जगत् कृत्स्नं सदेवासुरमानुषम्॥ ८६ ॥ | ब्रह्मवादी योगी (हम दोनोंको) एक भावसे ही देखते हैं। हे विश्वात्मन्! बिना आपका आश्रय ग्रहण किये योगी मुझे प्राप्त नहीं कर सकते हैं। आप देवता, असुर तथा मनुष्योंसे युक्त इस सम्पूर्ण जगत्का पालन करें॥ ८६॥ |