संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ११ * | ६७ |
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| नियोगाद् ब्रह्मणो देवीं ददौ रुद्राय तां सतीम्।<br>दक्षाद् रुद्रोऽपि जग्राह स्वकीयामेव शूलभृत्॥ १०॥ | (दक्षने) ब्रह्माकी आज्ञासे इन सतीदेवीको रुद्रको प्रदान कर दिया। त्रिशूलधारी रुद्रने भी दक्षसे अपनी ही शक्तिको ग्रहण किया॥ १०॥ |
| प्रजापतिं विनिन्द्यैषा कालेन परमेश्वरी।<br>मेनायामभवत् पुत्री तदा हिमवतः सती॥ ११॥ | कालान्तरमें (यज्ञमें अपने आराध्य शिवका भाग न देखकर) दक्ष प्रजापतिकी निन्दा कर (तथा अपने शरीरका परित्याग कर) वे परमेश्वरी सती पुनः हिमवान्से मेनाकी पुत्री (पार्वती) बनीं। पर्वतश्रेष्ठ हिमवान्ने भी पार्वतीको |
| स चापि पर्वतवरो ददौ रुद्राय पार्वतीम्।<br>हिताय सर्वदेवानां त्रिलोकस्यात्मनोऽपि च॥ १२॥ | सभी देवताओं, तीनों लोकों तथा स्वयं अपने भी कल्याणके लिये रुद्रको समर्पित कर दिया॥ ११-१२॥ |
| सैषा माहेश्वरी देवी शंकरार्धशरीरिणी।<br>शिवा सती हैमवती सुरासुरनमस्कृता॥ १३॥ | ये ही शंकरके आधे शरीरमें स्थित रहनेवाली माहेश्वरी देवी शिवा, सती तथा हैमवतीके रूपमें देवताओं एवं असुरोंद्वारा पूजित हैं। इन्द्रसहित सभी |
| तस्याः प्रभावमतुलं सर्वे देवाः सवासवाः।<br>विदन्ति मुनयो वेत्ति शंकरो वा स्वयं हरिः॥ १४॥ | देवता, मुनि, शंकर अथवा स्वयं हरि इनके अतुल प्रभावको जानते हैं॥ १३-१४॥ |
| एतद् वः कथितं विप्राः पुत्रत्वं परमेष्ठिनः।<br>ब्रह्मणः पद्मयोनित्वं शंकरस्यामितौजसः॥ १५॥ | हे विप्रो! इस प्रकार मैंने आप लोगोंसे अमित तेजस्वी शंकरके पुत्रत्व (पुत्र होनेका) और परमेष्ठी ब्रह्माके पद्मयोनित्व (पद्मयोनि होने)-का वर्णन किया॥ १५॥ |
| सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्याथ मुनयः कूर्मरूपेण भाषितम्।<br>विष्णुना पुनरेवैनं पप्रच्छुः प्रणता हरिम्॥ १६॥ | सूत बोले— कूर्मरूप धारण किये हुए विष्णुके इस कथनको सुनकर मुनियोंने पुनः हरि (कूर्मरूपधारी विष्णु)-को प्रणाम करते हुए उनसे इस प्रकार पूछा—॥ १६॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>कैषा भगवती देवी शंकरार्धशरीरिणी।<br>शिवा सती हैमवती यथावद् ब्रूहि पृच्छताम्॥ १७॥ | ऋषियोंने कहा— (भगवन्!) शंकरके आधे शरीररूपसे प्रतिष्ठित शिवा, सती तथा हैमवती (इत्यादि नामवाली) ये देवी भगवती कौन हैं? हम सभी पूछनेवालोंको आप यथार्थरूपमें बतलायें। उन मुनियोंके इस वचनको |
| तेषां तद् वचनं श्रुत्वा मुनीनां पुरुषोत्तमः।<br>प्रत्युवाच महायोगी ध्यात्वा स्वं परमं पदम्॥ १८॥ | सुनकर पुरुषोंमें उत्तम महायोगी (विष्णु)-ने अपने परम पदका ध्यान करके उन्हें बताया—॥ १७-१८॥ |
| श्रीकूर्म उवाच<br>पुरा पितामहेनोक्तं मेरुपृष्ठे सुशोभनम्।<br>रहस्यमेतद् विज्ञानं गोपनीयं विशेषतः॥ १९॥ | श्रीकूर्म बोले— प्राचीन कालमें अत्यन्त रमणीय मेरु गिरिके पृष्ठपर (बैठकर) पितामह (ब्रह्मा)-ने यह रहस्यपूर्ण ज्ञान कहा था। यह विशेषरूपसे गोपनीय है। सांख्यशास्त्रके तत्त्वज्ञोंके लिये यह परम सांख्य (तत्त्वज्ञान) |
| सांख्यानां परमं सांख्यं ब्रह्मविज्ञानमुत्तमम्।<br>संसारार्णवमग्नानां जन्तूनामेकमोचनम्॥ २०॥ | एवं उत्तम ब्रह्मज्ञान है। यह संसार-सागरमें निमग्न प्राणियोंकी मुक्तिका एकमात्र साधन है॥ १९-२०॥ |
| या सा माहेश्वरी शक्तिर्ज्ञानरूपातिलालसा।<br>व्योमसंज्ञा परा काष्ठा सेयं हैमवती मता॥ २१॥ | (महेश्वरकी) जो ज्ञानरूप, उत्कृष्ट इच्छारूप, व्योम नामवाली तथा पराकाष्ठारूप (अन्तिम प्राप्तव्य) वह माहेश्वरी शक्ति है, ये वही हैमवती कही जाती हैं। |
| शिवा सर्वगतानन्ता गुणातीता सुनिष्कला।<br>एकानेकविभागस्था ज्ञानरूपातिलालसा॥ २२॥ | (ये हैमवती शक्ति) कल्याण करनेवाली, सर्वत्र व्याप्त, अनन्त, गुणातीत, नितान्त भेदशून्य, अद्वितीय तथा अनेक रूपोंमें स्थित रहनेवाली, ज्ञानरूप, परम इच्छारूप। |