संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ * कूर्मपुराण *
अनन्या निष्कले तत्त्वे संस्थिता तस्य तेजसा।
स्वाभाविकी च तन्मूला प्रभा भानोरिवामला॥ २३॥
एका माहेश्वरी शक्तिरनेकोपाधियोगतः।
परावरेण रूपेण क्रीडते तस्य संनिधौ॥ २४॥
सेयं करोति सकलं तस्याः कार्यमिदं जगत्।
न कार्यं नापि करणमीश्वरस्येति सूरयः॥ २५॥
चतस्रः शक्तयो देव्याः स्वरूपत्वेन संस्थिताः।
अधिष्ठानवशात् तस्याः शृणुध्वं मुनिपुंगवाः॥ २६॥
शान्तिर्विद्या प्रतिष्ठा च निवृत्तिश्चेति ताः स्मृताः।
चतुर्व्यूहस्ततो देवः प्रोच्यते परमेश्वरः॥ २७॥
अनया परया देवः स्वात्मानन्दं समश्नुते।
चतुर्ष्वपि च वेदेषु चतुर्मूर्तिर्महेश्वरः॥ २८॥
अस्यास्त्वनादिसंसिद्धमैश्वर्यमतुलं महत्।
तत्सम्बन्धादनन्ताया रुद्रेण परमात्मना॥ २९॥
सैषा सर्वेश्वरी देवी सर्वभूतप्रवर्तिका।
प्रोच्यते भगवान् कालो हरिः प्राणो महेश्वरः॥ ३०॥
तत्र सर्वमिदं प्रोतमोतं चैवाखिलं जगत्।
स कालोऽग्निर्हरो रुद्रो गीयते वेदवादिभिः॥ ३१॥
कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः।
सर्वे कालस्य वशगा न कालः कस्यचिद् वशे॥ ३२॥
प्रधानं पुरुषस्तत्त्वं महानात्मा त्वहंकृतिः।
कालेनान्यानि तत्त्वानि समाविष्टानि योगिना॥ ३३॥
तस्य सर्वजगत्सूतिः शक्तिर्मायेति विश्रुता।
तयेदं भ्रामयेदीशो मायावी पुरुषोत्तमः॥ ३४॥
सैषा मायात्मिका शक्तिः सर्वाकारा सनातनी।
वैश्वरूप्यं महेशस्य सर्वदा सम्प्रकाशयेत्॥ ३५॥
अनन्य तथा उन (शिव)-के तेजसे निष्कल तत्त्वमें प्रतिष्ठित रहनेवाली, सूर्यकी प्रभाके सदृश स्वच्छ तथा उनके आश्रित एवं स्वभावतः प्रवृत्त होनेवाली हैं। वह एक ही माहेश्वरी शक्ति अनेक उपाधियों (नाम-रूपों)-के संयोगसे उत्तम तथा निम्न रूपसे उन (शिव)-के समीप क्रीडा करती रहती हैं। वे ही यह सम्पूर्ण (सृष्टि इत्यादिका) कार्य करती हैं। यह जगत् उन्हींका कार्य है। ईश्वरका न कोई कार्य है और न कोई करण (साधन) ही होता है—ऐसा विद्वानोंका मत है॥ २१-२५॥
हे श्रेष्ठ मुनियो! उन देवीकी अधिष्ठान (आश्रय)-भेदसे अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित चार शक्तियाँ हैं, उन्हें आप सुनें॥ २६॥
उन शक्तियोंको शान्ति, विद्या, प्रतिष्ठा तथा निवृत्ति—इस प्रकारसे कहा गया है और इसीलिये (अर्थात् इन चारों शक्तियोंसे सम्पन्न होनेके कारण) परमेश्वर देवको भी चतुर्व्यूहात्मक¹ कहा जाता है। इस पराशक्तिके द्वारा देव (महेश्वर) स्वात्मानन्दका उपभोग करते हैं। चारों ही वेदोंमें चतुर्मूर्ति महेश्वर वर्णित हैं॥ २७-२८॥
उन रुद्र परमात्माके सम्बन्धसे इस अनन्ता (शक्ति)-का महान् अतुलनीय ऐश्वर्य सिद्ध है। वे ही ये सर्वेश्वरी देवी सभी प्राणियोंको प्रवर्तित करती हैं। भगवान् काल, हरि, प्राण तथा महेश्वर कहे जाते हैं॥ २९-३०॥
उनमें ही यह सम्पूर्ण जगत् ओतप्रोत है। वेदवादियों (वैदिकों)-के द्वारा वे ही काल, अग्नि, हर तथा रुद्र-रूपमें गाये जाते हैं। काल सभी प्राणियोंकी सृष्टि करता है, काल ही प्रजाओंका संहार करता है। सभी कालके वशीभूत हैं और काल किसीके वशमें नहीं है। (वह काल ही) प्रधान, पुरुष, तत्त्व, महान्, आत्मा तथा अहंकार है। योगी² कालमें ही अन्य सभी तत्त्व समाविष्ट हैं॥ ३१-३३॥
सम्पूर्ण जगत्को उनकी (ईशकी) संतान और उनकी शक्तिको माया कहा गया है। मायावी पुरुषोत्तम ईश उस (माया)-के द्वारा ही इस (जगत्)-को भ्रमित (मोहित) करते हैं। वही यह सर्वाकारा, सनातनी मायात्मिका शक्ति महेशके विश्वरूपत्वको सदा प्रकाशित करती रहती है॥ ३४-३५॥
१-व्यूहका अर्थ शक्ति है।
२-कालमें सभी प्रकारका सामर्थ्य है, इसलिये कालको योगी कहा गया है।