संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 79, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 79
| * अध्याय ११ * | ६९ |
|---|---|
| अन्याश्च शक्तयो मुख्यास्तस्य देवस्य निर्मिताः ।<br>ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिः प्राणशक्तिरिति त्रयम् ॥ ३६ ॥<br><br>सर्वासांमेव शक्तीनां शक्तिमन्तो विनिर्मिताः ।<br>माययैवाथ विप्रेन्द्राः सा चानादिरननतया ॥ ३७ ॥<br><br>सर्वशक्त्यात्मिका माया दुर्नि वारा दुरत्यया ।<br>मायावी सर्वशक्तीशः कालः कालकरः प्रभुः ॥ ३८ ॥ | उन देवके द्वारा निर्मित ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति तथा प्राणशक्ति—ये तीन अन्य मुख्य शक्तियाँ हैं। विप्रेन्द्रो! अनन्त मायाके द्वारा ही सभी शक्तियोंसे युक्त शक्तिमानोंका निर्माण हुआ है, किंतु वह (माया) अनादि है। सभी शक्तियोंकी आत्मरूप वह माया बड़ी कठिनतासे निवारण करने योग्य और बड़े ही कष्टसे पार करने योग्य है। सभी शक्तियोंके स्वामी मायावी प्रभु स्वयं काल हैं और कालको भी उत्पन्न करनेवाले हैं॥ ३६—३८॥ |
| करोति कालः सकलं संहरेत् काल एव हि ।<br>कालः स्थापयते विश्वं कालाधीनमिदं जगत् ॥ ३९ ॥ | काल ही सब कुछ (उत्पन्न) करता है और काल ही (सबका) संहार करता है। विश्वकी स्थापना काल करता है और कालके ही अधीन यह सारा जगत् है॥ ३९॥ |
| लब्ध्वा देवाधिदेवस्य संनिधिं परमेष्ठिनः ।<br>अनन्तस्याखिलेशस्य शम्भोः कालात्मनः प्रभोः ॥ ४० ॥<br><br>प्रधानं पुरुषो माया माया चैवं प्रपद्यते ।<br>एका सर्वगतानन्ता केवला निष्कला शिवा ॥ ४१ ॥ | देवाधिदेव, परमेष्ठी, अनन्त और अखिल (विश्व)—के स्वामी कालात्मा प्रभु शम्भुका सांनिध्य प्राप्तकर वही माया शक्ति, प्रधान, पुरुष एवं माया नामकी शक्तिका रूप धारण करती है। वह शक्ति अद्वितीय सर्वत्र व्याप्त, अन्त-रहित, केवल, भेदशून्य और कल्याणकारिणी है॥ ४०-४१॥ |
| एका शक्तिः शिवैकोऽपि शक्तिमानुच्यते शिवः ।<br>शक्तयः शक्तिमन्तोऽन्ये सर्वशक्तिसमुद्भवाः ॥ ४२ ॥<br><br>शक्तिशक्तिमतोर्भेदं वदन्ति परमार्थतः ।<br>अभेदं चानुपश्यन्ति योगिनस्तत्त्वचिन्तकाः ॥ ४३ ॥<br><br>शक्तयो गिरिजा देवी शक्तिमन्तोऽथ शंकरः ।<br>विशेषः कथ्यते चायं पुराणे ब्रह्मवादिभिः ॥ ४४ ॥ | शक्ति एक है और शिव भी एक हैं। शिव शक्तिमान् कहे जाते हैं। अन्य सभी शक्तियाँ तथा शक्तिमान् (इसी) शक्तिसे उत्पन्न हैं। शक्ति और शक्तिमान्में भेद कहा जाता है, किंतु तत्त्वका चिन्तन करनेवाले योगीजन (उनमें) परमार्थतः अभेदका ही दर्शन करते हैं। जितनी भी शक्तियाँ हैं वे गिरिजादेवी और जितने भी शक्तिमान् हैं वे शंकर हैं। ब्रह्मवादियोंके द्वारा पुराणमें इनके विषयमें विशेष (रूपसे) कहा जाता है॥ ४२—४४॥ |
| भोग्या विश्वेश्वरी देवी महेश्वरपतिव्रता ।<br>प्रोच्यते भगवान् भोक्ता कपर्दी नीललोहितः ॥ ४५ ॥<br><br>मन्ता विश्वेश्वरो देवः शंकरो मन्मथान्तकः ।<br>प्रोच्यते मतिरीशानी मन्तव्या च विचारतः ॥ ४६ ॥ | महेश्वरकी पतिव्रता देवी विश्वेश्वरीको भोग्या और नीललोहित जटाधारी भगवान् (शंकर)—को भोक्ता कहा गया है। कामदेवका अन्त करनेवाले, विश्वके स्वामी देव शंकरको मनन करनेवाला मन्ता और ईशानीको मति एवं विचारद्वारा मानने योग्य (मन्तव्या) कहा गया है॥ ४५-४६॥ |
| इत्येतदखिलं विप्राः शक्तिशक्तिमदुद्भवम् ।<br>प्रोच्यते सर्ववेदेषु मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ४७ ॥<br><br>एतत् प्रदर्शितं दिव्यं देव्या माहात्म्यमुत्तमम् ।<br>सर्ववेदान्तवेदेषु निश्चितं ब्रह्मवादिभिः ॥ ४८ ॥ | ब्राह्मणो! तत्त्वद्रष्टा मुनियोंके द्वारा सभी वेदोंमें यही कहा गया है कि यह सम्पूर्ण विश्व शक्ति एवं शक्तिमान्से प्रादुर्भूत है। इस प्रकार ब्रह्मवादियोंके द्वारा समस्त वेदान्त एवं वेदोंमें निश्चित किये गये देवीके दिव्य एवं उत्तम माहात्म्यका यह वर्णन किया गया॥ ४७-४८॥ |
| एकं सर्वगतं सूक्ष्मं कूटस्थमचलं ध्रुवम् ।<br>योगिनस्तत् प्रपश्यन्ति महादेव्याः परं पदम् ॥ ४९ ॥ | महादेवीका जो सर्वव्यापक, सूक्ष्म, कूटस्थ, अचल तथा ध्रुव परम पद है, उसका योगी साक्षात्कार करते हैं॥ ४९॥ |