संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ७० | * कूर्मपुराण * |
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आनन्दमक्षरं ब्रह्म केवलं निष्कलं परम्।
योगिनस्तत् प्रपश्यन्ति महादेव्याः परं पदम्॥ ५०॥
परात्परतरं तत्त्वं शाश्वतं शिवमच्युतम्।
अनन्तप्रकृतौ लीनं देव्यास्तत् परमं पदम्॥ ५१॥
शुभं निरञ्जनं शुद्धं निर्गुणं द्वैतवर्जितम्।
आत्मोपलब्धिविषयं देव्यास्तत् परमं पदम्॥ ५२॥
सैषा धात्री विधात्री च परमानन्दमिच्छताम्।
संसारतापानखिलान् निहन्तीश्वरसंश्रया॥ ५३॥
तस्माद् विमुक्तिमन्विच्छन् पार्वतीं परमेश्वरीम्।
आश्रयेत् सर्वभावानामात्मभूतां शिवात्मिकाम्॥ ५४॥
लब्ध्वा च पुत्रीं शर्वाणीं तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्।
सभार्यः शरणं यातः पार्वतीं परमेश्वरीम्॥ ५५॥
तां दृष्ट्वा जायमानां च स्वेच्छयैव वराननाम्।
मेना हिमवतः पत्नी प्राहेदं पर्वतेश्वरम्॥ ५६॥
मेनोवाच
पश्य बालाममिमां राजन् राजीवसदृशाननाम्।
हिताय सर्वभूतानां जाता च तपसावयोः॥ ५७॥
सोऽपि दृष्ट्वा ततः पुत्रीं तरुणादित्यसंनिभाम्।
कपर्दिनीं चतुर्वक्त्रां त्रिनेत्रामतिलालसाम्॥ ५८॥
अष्टहस्तां विशालाक्षीं चन्द्रावयवभूषणाम्।
निर्गुणां सगुणां साक्षात् सदसद्व्यक्तिवर्जिताम्॥ ५९॥
प्रणम्य शिरसा भूमौ तेजसा चातिविह्वलः।
भीतः कृताञ्जलिस्तस्याः प्रोवाच परमेश्वरीम्॥ ६०॥
हिमवानुवाच
का त्वं देवि विशालाक्षि शशाङ्कावयवाङ्किते।
न जाने त्वामहं वत्से यथावद् ब्रूहि पृच्छते॥ ६१॥
गिरीन्द्रवचनं श्रुत्वा ततः सा परमेश्वरी।
व्याजहार महाशैलं योगिनामभयप्रदा॥ ६२॥
देव्युवाच
मां विद्धि परमां शक्तिं परमेश्वरसमाश्रयाम्।
अनन्यामव्ययामेकां यां पश्यन्ति मुमुक्षवः॥ ६३॥
महादेवीका जो आनन्दमय, अविनाशी, ब्रह्मरूप, अद्वितीय एवं भेदरहित परम पद है, योगी उसका दर्शन करते हैं। देवीका वह परम पद परसे भी परतर, तत्त्वरूप, सनातन, कल्याणकारी, अच्युत तथा अनन्त प्रकृतिमें लीन है। देवीका वह परम पद शुभ निरञ्जन, शुद्ध, निर्गुण, द्वैतरहित और आत्मज्ञानका विषय है। परम आनन्द चाहनेवालोंके लिये वे ही धात्री तथा विधात्री हैं। वे ईश्वरके आश्रयसे संसारके सारे पापोंका विनाश करती हैं। इसलिये मोक्षकी इच्छा करनेवालोंको चाहिये कि वे सभी भावोंकी आत्मस्वरूपा शिवात्मिका परमेश्वरी पार्वतीका आश्रय ग्रहण करें॥ ५०-५४॥
अत्यन्त कठोर तप करनेके अनन्तर शर्वाणी (शंकर-प्रिया)-को पुत्रीरूपमें प्राप्तकर (हिमवान् अपनी) भार्याके साथ परमेश्वरी पार्वतीकी शरणमें गये। अपनी इच्छासे उत्पन्न उस श्रेष्ठ मुखवालीको देखकर हिमवान्की पत्नी मेनाने गिरिराज हिमालयसे इस प्रकार कहा— ॥ ५५-५६॥
मेना बोलीं— राजन्! कमलके समान मुखवाली इस बालिकाको देखो। (यह) हम दोनोंकी तपस्या (-के प्रभाव)-से सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये उत्पन्न हुई है॥ ५७॥
तरुण सूर्यके समान (देदीप्यमान), जटायुक्त, चतुर्मुख, तीन नेत्रोंवाली, उत्कृष्ट इच्छास्वरूप, आठ हाथों और विशाल नेत्रोंवाली, चन्द्रमाकी कलाओंके आभूषण धारण की हुई, गुणातीत एवं गुणयुक्त तथा सत्-असत्के भावोंसे रहित साक्षात् देवीको पुत्रीरूपमें देखकर हिमवान्ने भूमिपर मस्तक लगाकर प्रणाम किया और उनके तेजसे अत्यन्त विह्वल तथा भयभीत होते हुए हाथ जोड़कर उन परमेश्वरीसे कहा— ॥ ५८-६०॥
हिमवान् बोले— विशाल नेत्रोंवाली तथा चन्द्रमाकी कलाओंसे सुशोभित देवि! आप कौन हैं? वत्से! मैं आपको नहीं जानता हूँ। मुझ पूछनेवालेको आप यथार्थरूपसे बतलायें॥ ६१॥
योगियोंको अभय प्रदान करनेवाली उस परमेश्वरीने गिरिराज (हिमालय)-का वचन सुनकर महाशैलसे कहा— ॥ ६२॥
देवी बोलीं— मोक्षकी इच्छा करनेवाले (मोक्षार्थी) जिस अनन्य, अविनाशी तथा अद्वितीय (शक्ति)-का दर्शन करते हैं, परमेश्वरके आश्रयमें रहनेवाली वही परम शक्ति मुझे समझो॥ ६३॥