भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 81
* अध्याय ११ *७१
अहं वै सर्वभावानामात्मा सर्वान्तरा शिवा।<br>शाश्वतैश्वर्यविज्ञानमूर्तिः सर्वप्रवर्तिका॥ ६४॥मैं ही सभी पदार्थोंकी आत्मा, सभीके अंदर रहनेवाली, कल्याणकारिणी, सनातन ऐश्वर्य तथा विज्ञानकी मूर्ति और सभीको प्रवृत्त करनेवाली हूँ। मैं अनन्त और अनन्त महिमावाली तथा संसारसागरसे पार उतारनेवाली हूँ। मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करती हूँ, मेरे ऐश्वर्यमय रूपको देखो॥ ६४-६५॥
अनन्तानन्तमहिमा संसारार्णवतारिणी।<br>दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे रूपमैश्वरम्॥ ६५॥
एतावदुक्त्वा विज्ञानं दत्त्वा हिमवते स्वयम्।<br>स्वं रूपं दर्शयामास दिव्यं तत् पारमेश्वरम्॥ ६६॥इतना कहकर तथा हिमवान्‌को स्वयं विशिष्ट ज्ञान प्रदान कर (देवीने) अपना वह परमेश्वरमय दिव्य रूप दिखलाया॥ ६६॥
कोटिसूर्यप्रतीकाशं तेजोबिम्बं निराकुलम्।<br>ज्वालामालासहस्राढ्यं कालानलशतोपमम्॥ ६७॥(हिमवान्‌ने) करोड़ों सूर्यके समान (प्रकाशमान) तेजःपुञ्ज, स्थिर, हजारों ज्वालामालाओंसे युक्त, सैकड़ों कालाग्निके समान, भयंकर दाढ़ोंवाला, दुर्धर्ष, जटामण्डलोंसे मण्डित, हाथमें त्रिशूल और वरमुद्रा धारण किये, भयानक, घोर रूप एवं प्रशान्त, सौम्य मुखवाला, अनन्त आश्चर्योंसे युक्त, चन्द्रकलासे चिह्नित, करोड़ों चन्द्रमाओंकी आभावाला मुकुट धारण किये, हाथमें गदा लिये, नूपुरोंसे सुशोभित, दिव्य वस्त्र एवं माला धारण किये, दिव्य सुगन्धित अनुलेपन किये हुए, शङ्ख-चक्रधारी, कमनीय, तीन नेत्रवाले, चर्माम्बरधारी, ब्रह्माण्डके बाहर एवं भीतर (सर्वत्र) स्थित, बाहर तथा भीतर सर्वत्र श्रेष्ठ, सर्वशक्तिमय, शुभ्र, सभी आकारोंसे युक्त, सनातन, ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु और श्रेष्ठ योगियोंद्वारा वन्दित चरणकमलोंवाला, सभी ओर हाथ, पैर, आँख, सिर एवं मुखवाला और सभीको आवृत्त कर स्थित रहनेवाला (देवीका वह) परमेश्वर-रूप देखा॥ ६७-७३॥
दंष्ट्राकरालं दुर्धर्षं जटामण्डलमण्डितम्।<br>त्रिशूलवरहस्तं च घोररूपं भयानकम्॥ ६८॥
प्रशान्तं सौम्यवदनमनन्ताश्चर्यसंयुतम्।<br>चन्द्रावयवलक्ष्माणं चन्द्रकोटिसमप्रभम्॥ ६९॥
किरीटिनं गदाहस्तं नूपुरैरुपशोभितम्।<br>दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्॥ ७०॥
शङ्खचक्रधरं काम्यं त्रिनेत्रं कृत्तिवाससम्।<br>अण्डस्थं चाण्डबाह्यस्थं बाह्याभ्यन्तरं परम्॥ ७१॥
सर्वशक्तिमयं शुभ्रं सर्वाकारं सनातनम्।<br>ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रयोगीन्द्रैर्वन्द्यमानपदाम्बुजम् ॥ ७२॥
सर्वतः पाणिपादान्तं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।<br>सर्वमावृत्य तिष्ठन्तं ददर्श परमेश्वरम्॥ ७३॥
दृष्ट्वा तदीदृशं रूपं देव्या माहेश्वरं परम्।<br>भयेन च समाविष्टः स राजा हृष्टमानसः॥ ७४॥देवीके इस प्रकारके उस परम माहेश्वर रूपको देखकर वे (पर्वतोंके) राजा (हिमवान्) भयसे आविष्ट* होते हुए भी प्रसन्न मनवाले हो गये। (और) अपनी आत्मामें आत्माको प्रतिष्ठितकर (आत्मनिष्ठ होकर) ओङ्कारका स्मरण करते हुए (वे) परमेश्वरीके एक हजार आठ नामोंसे उनकी स्तुति करने लगे— ॥ ७४-७५॥
आत्मन्याधाय चात्मानमोङ्कारं समनुस्मरन्।<br>नाम्नामष्टसहस्रेण तुष्टाव परमेश्वरीम्॥ ७५॥
हिमवानुवाच<br>शिवोमा परमा शक्तिरनन्ता निष्कलामला।<br>शान्ता माहेश्वरी नित्या शाश्वती परमाक्षरा॥ ७६॥<br>अचिन्त्या केवलानन्त्या शिवात्मा परमात्मिका।<br>अनादिरव्यया शुद्धा देवात्मा सर्वगाचला॥ ७७॥हिमवान्‌ने कहा— (हे देवी! आप) शिवा, उमा, परमा शक्ति, अनन्ता, निष्कला, अमला, शान्ता, माहेश्वरी, नित्या, शाश्वती, परमाक्षरा, अचिन्त्या, केवला, अनन्त्या, शिवात्मिका, परमात्मिका, अनादि, अव्यया, शुद्धा, देवात्मिका, सर्वगा, अचला॥ ७६-७७॥

* अपनी पुत्रीमें परस्परविरोधी अनेक रूपोंको देखकर भयभीत होना स्वाभाविक है, पर ऐश्वर्यसम्पन्न देवी ही मेरी पुत्री है— यह अनुभव कर प्रसन्नचित्त होना भी स्वाभाविक ही है।