संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय ७ * | ४९ |
|---|---|
| उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे।<br>ब्रह्मणो हि प्रजासर्गं सृजतस्तु प्रजापतेः॥ ५८ ॥<br><br>सृष्ट्वा चतुष्टयं सर्गं देवर्षिपितृमानुषम्।<br>ततोऽसृजच्च भूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ५९॥<br>यक्षान् पिशाचान् गन्धर्वांस्तथैवाप्सरसः शुभाः।<br>नरकिन्नररक्षांसि वयःपशुमृगोरगान्।<br>अव्ययं च व्ययं चैव द्वयं स्थावरजङ्गमम्॥ ६० ॥<br><br>तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्टौ प्रतिपेदिरे।<br>तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः॥ ६१॥<br><br>हिंस्त्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते।<br>तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात् तत् तस्य रोचते॥ ६२ ॥<br><br>महाभूतेषु नानात्वमिन्द्रियार्थेषु मूर्तिषु।<br>विनियोगं च भूतानां धातैव व्यदधात् स्वयम्॥ ६३ ॥<br><br>नामरूपं च भूतानां कृत्यानां च प्रपञ्चनम्।<br>वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः॥ ६४॥<br><br>आर्षाणि चैव नामानि याश्च वेदेषु दृष्टयः।<br>शर्वर्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः॥ ६५ ॥<br><br>यथर्तवृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये।<br>दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु॥ ६६ ॥ | प्रजापति ब्रह्माके द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि करते समय उनके शरीरसे उच्च एवं निम्न (कोटिक अन्य भी) प्राणियोंकी सृष्टि हुई। देवता, ऋषि, पितर तथा मनुष्य—इन चार प्रकारकी सृष्टि करके (ब्रह्माने) चर तथा अचर (सभी) प्राणियोंकी सृष्टि की॥ ५८-५९॥<br><br>यक्षों, पिशाचों, गन्धर्वों तथा शुभ अप्सराओं, नरों, किन्नरों, राक्षसों, पक्षियों, पशुओं, मृगों तथा सर्पोंको उत्पन्न किया। नित्य एवं अनित्य-भेदसे चर एवं अचर सृष्टि दो प्रकारकी है। पहलेकी सृष्टियोंमें उन (प्राणियों)-के जो-जो कर्म निश्चित थे अगली सृष्टियोंमें भी उत्पन्न होकर वे बार-बार उन्हीं कर्मोंको प्राप्त करते हैं॥ ६०-६१॥<br><br>इसीलिये उसी प्रकारकी भावना (संस्कार)-से प्रेरित होकर (वे प्राणी) हिंसक, अहिंसक, कोमल, क्रूर, धर्म-अधर्म तथा सत्य एवं असत्यकी प्रवृत्तियाँ प्राप्त करते हैं और वही (कर्म) उन्हें रुचिकर भी लगता है॥ ६२ ॥<br><br>विधाताने स्वयं ही प्राणियोंकी इन्द्रियोंके विषयों, महाभूतों एवं मूर्तियोंमें भिन्नता और विनियोगकी व्यवस्था की है। उन महेश्वरने प्रारम्भमें वेदके शब्दोंसे ही प्राणियोंके नाम और रूप तथा कर्मोंकी विविधताका निर्माण किया। वेदोंमें जिन सिद्धान्तों और आर्ष नामोंका प्रतिपादन हुआ है, उन्हीं नामोंको ब्रह्मा (प्रलयकालीन) रात्रिके अन्तमें उत्पन्न पदार्थोंको प्रदान करते हैं॥ ६३–६५॥<br><br>प्रलयकालसे पूर्व जो ऋतुएँ और ऋतुओंके चिह्न तथा अनेक प्रकारके रूप (आकार) दिखलायी देते थे, अगले युगोंमें वे उन्हीं-उन्हीं (नाम-रूपों तथा) भावोंमें प्रकट होकर दिखलायी देते हैं॥ ६६ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तमोऽध्यायः॥ ७ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७॥
५० * कूर्मपुराण *
आठवाँ अध्याय
सृष्टि-वर्णनमें ब्रह्माजीसे मनु और शतरूपाका प्रादुर्भाव, स्वायम्भुव मनुके वंशका वर्णन, दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंका वर्णन तथा उनका विवाह, धर्म तथा अधर्मकी संतानोंका विवरण
| श्रीकूर्म उवाच | श्रीकूर्मने कहा— |
|---|---|
| एवं भूतानि सृष्टानि स्थावराणि चराणि च।<br>यदा चास्य प्रजाः सृष्टा न व्यवर्धन्त धीमतः॥ १ ॥<br><br>तमोमात्रावृतो ब्रह्मा तदाशोचत दुःखितः।<br>ततः स विदधे बुद्धिमर्थनिश्चयगामिनीम्॥ २ ॥ | इस प्रकार स्थावर तथा जङ्गम प्राणियोंकी सृष्टि हुई, किंतु जब उन बुद्धिमान् (ब्रह्मा)-द्वारा उत्पन्न की गयी प्रजाओंमें वृद्धि नहीं हुई, तब तमोगुणकी अधिकतासे आवृत ब्रह्मा दुःखी होकर चिन्ता करने लगे और फिर उन्होंने अर्थका निश्चय करनेवाली बुद्धिको ग्रहण किया॥ १-२॥ |
| अथात्मनि समद्राक्षीत् तमोमात्रां नियामिकाम्।<br>रजःसत्त्वं च संवृत्य वर्तमानां स्वधर्मतः॥ ३ ॥<br><br>तमस्तद् व्यनुदत् पश्चात् रजः सत्त्वेन संयुतः।<br>तत् तमः प्रतिनुन्नं वै मिथुनं समजायत॥ ४ ॥ | तदनन्तर उन्होंने स्वधर्मानुसार रजोगुण एवं सत्त्वगुणको आवृत कर स्थित रहनेवाली तथा (कर्मकी) नियामिका (तमोवृत्ति)-को अपनी आत्मामें देखा। तत्पश्चात् सत्त्वगुणसे संयुक्त रजोगुणने उस तमोगुणको दूर किया और दूर हुआ वह तम दो भागोंमें विभक्त हो गया॥ ३-४॥ |
| अधर्माचरणो विप्रा हिंसा चाशुभलक्षणा।<br>स्वां तनुं स ततो ब्रह्मा तामपोहत् भास्वराम्॥ ५ ॥ | हे ब्राह्मणो ! (इस प्रकार दो भागोंमें विभक्त हुए तमसे) अधर्माचरण और अशुभ लक्षणोंवाली हिंसा उत्पन्न हुई। तब ब्रह्माजीने अपने उस प्रकाशमान शरीरको छोड़ दिया॥ ५॥ |
| द्विधाकरोत् पुनर्देहमर्धेन पुरुषोऽभवत्।<br>अर्धेन नारी पुरुषो विराजमसृजत् प्रभुः॥ ६ ॥ | पुनः (पुरातन) पुरुष प्रभुने अपने शरीरको दो भागोंमें बाँटा। आधेसे पुरुष हुआ और आधेसे नारी। तत्पश्चात् (उन्होंने) विराट् पुरुषको उत्पन्न किया॥ ६॥ |
| नारीं च शतरूपाख्यां योगिनीं ससृजे शुभाम्।<br>सा दिवं पृथिवीं चैव महिम्ना व्याप्य संस्थिता॥ ७ ॥ | उन्होंने 'शतरूपा' नामवाली कल्याणमयी योगिनी नारीको बनाया, वह पृथिवी-लोक तथा द्युलोकको अपनी महिमासे व्याप्तकर प्रतिष्ठित हुई॥ ७॥ |
| योगैश्वर्यबलोपेता ज्ञानविज्ञानसंयुता।<br>योऽभवत् पुरुषात् पुत्रो विराडव्यक्तजन्मनः॥ ८ ॥<br><br>स्वायम्भुवो मनुर्देवः सोऽभवत् पुरुषो मुनिः।<br>सा देवी शतरूपाख्या तपः कृत्वा सुदुश्चरम्॥ ९ ॥<br><br>भर्तारं ब्रह्मणः पुत्रं मनुमेवान्वपद्यत।<br>तस्माच्च शतरूपा सा पुत्रद्वयमसूयत॥ १० ॥ | (वह शतरूपा नामवाली नारी) योगके ऐश्वर्य एवं बलसे सम्पन्न तथा ज्ञान-विज्ञानसे युक्त थी। (और) जो पुरुषसे अव्यक्तजन्मा ब्रह्माका विराट् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, वह देवपुरुष मुनि स्वायम्भुव मनुके रूपमें प्रसिद्ध हुआ। शतरूपा नामवाली उस देवीने अत्यन्त कठोर तप करके ब्रह्माजीके पुत्र (स्वायम्भुव) मनुको ही (अपना) पति बनाया और शतरूपाने उनसे (मनुसे) दो पुत्र उत्पन्न किये॥ ८-१०॥ |
| प्रियव्रतोत्तानपादौ कन्याद्वयमनुत्तमम्।<br>तयोः प्रसूतिं दक्षाय मनुः कन्यां ददौ पुनः॥ ११ ॥ | (ये ही) प्रियव्रत तथा उत्तानपाद नामक दो पुत्र थे। (इनके अतिरिक्त) दो श्रेष्ठ कन्याएँ भी हुईं। उन दो कन्याओंमेंसे स्वायम्भुव मनुने प्रसूति नामक एक कन्या दक्ष प्रजापतिको प्रदान की॥ ११॥ |
| * अध्याय ८ * | ५१ |
|---|---|
| प्रजापतिरथाकूतिं मानसो जगृहे रुचिः ।<br>आकृत्यां मिथुनं जज्ञे मानसस्य रुचेः शुभम् ।<br>यज्ञश्च दक्षिणा चैव याभ्यां संवर्धितं जगत् ॥ १२ ॥ | आकूति नामक दूसरी कन्याको (ब्रह्माजीके) मानस पुत्र रुचि प्रजापतिने ग्रहण किया। मानस पुत्र रुचि प्रजापतिने आकूतिसे दो संतानें प्राप्त कीं—यज्ञ और दक्षिणा, जिनसे संसार वृद्धिको प्राप्त हुआ ॥ १२ ॥ |
| यज्ञस्य दक्षिणायां तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे ।<br>यामा इति समाख्याता देवाः स्वायम्भुवेऽन्तरे ॥ १३ ॥<br>प्रसूत्यां च तथा दक्षश्चतस्रो विंशतिं तथा ।<br>ससर्ज कन्या नामानि तासां सम्यक् निबोधत ॥ १४ ॥<br>श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिर्मेधा क्रिया तथा ।<br>बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदशी ॥ १५ ॥<br>पत्न्यर्थं प्रतिजग्राह धर्मो दाक्षायणीः शुभाः ।<br>ताभ्यः शिष्टा यवीयस्य एकादश सुलोचनाः ॥ १६ ॥ | यज्ञके दक्षिणासे बारह पुत्र उत्पन्न हुए जो स्वायम्भुव मन्वन्तरमें 'याम' इस नामसे प्रसिद्ध देवता हुए और दक्ष प्रजापतिने प्रसूतिसे चौबीस कन्याओंको उत्पन्न किया, उनके नामोंको भलीभाँति सुनो—(वे हैं—) श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि तथा तेरहवीं कन्याका नाम है कीर्ति ॥ १३-१५ ॥<br>दक्ष प्रजापतिकी इन (तेरह दाक्षायणी) मङ्गलमयी कन्याओंको धर्मने पत्नीरूपमें ग्रहण किया। उन (तेरह कन्याओं)-के अतिरिक्त इनसे सुन्दर आँखोंवाली दक्षकी ग्यारह, अवस्थामें छोटी कन्याएँ और थीं (जिनके नाम हैं—) ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, संतति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा तथा स्वधा ॥ १६-१७ ॥ |
| ख्यातिः सत्यथ सम्भूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा ।<br>संततिश्चानसूया च ऊर्जा स्वाहा स्वधा तथा ॥ १७ ॥<br>भृगुर्भवो मरीचिश्च तथा चैवाङ्गिरा मुनिः ।<br>पुलस्त्यः पुलहश्चैव क्रतुः परमधर्मवित् ॥ १८ ॥<br>अत्रिर्वसिष्ठो वह्निश्च पितरश्च यथाक्रमम् ।<br>ख्यात्याद्या जगृहुः कन्या मुनयो मुनिसत्तमाः ॥ १९ ॥ | श्रेष्ठ मुनियो! ख्याति, सती आदि जो (ग्यारह) कन्याएँ थीं, उन्हें क्रमशः भृगु, मरीचि, अङ्गिरा मुनि, पुलस्त्य, पुलह, परम धर्मज्ञ क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ नामक मुनियों, अग्निदेव और पितरोंने ग्रहण किया ॥ १८-१९ ॥ |
| श्रद्धया आत्मजः कामो दर्पो लक्ष्मीसुतः स्मृतः ।<br>धृत्यास्तु नियमः पुत्रस्तुष्ट्याः संतोष उच्यते ॥ २० ॥ | श्रद्धाका पुत्र 'काम' तथा लक्ष्मीका पुत्र 'दर्प' नामसे कहा जाता है। धृतिका 'नियम' नामक पुत्र तथा तुष्टिका (पुत्र) 'संतोष' कहलाता है ॥ २० ॥ |
| पुष्ट्या लाभः सुतश्चापि मेधापुत्रः श्रुतस्तथा ।<br>क्रियायाश्चाभवत् पुत्रो दण्डः समय एव च ॥ २१ ॥ | पुष्टिका पुत्र 'लाभ' और मेधाका पुत्र 'श्रुत' हुआ। क्रियाका पुत्र 'दण्ड' हुआ और वही 'समय' भी कहलाता है। |
| बुद्ध्या बोधः सुतस्तद्वदप्रमादो व्यजायत ।<br>लज्जाया विनयः पुत्रो वपुषो व्यवसायकः ॥ २२ ॥ | बुद्धिसे 'बोध' नामक पुत्र और उसी प्रकार 'अप्रमाद' नामक पुत्र भी हुआ। लज्जाका 'विनय' नामक पुत्र और वपुका 'व्यवसायक' हुआ। |
| क्षेमः शान्तिसुतश्चापि सुखं सिद्धिरजायत ।<br>यशः कीर्तिसुतस्तद्वदित्येते धर्मसूनवः ॥ २३ ॥ | 'क्षेम' शान्तिका पुत्र और 'सुख' सिद्धिका पुत्र हुआ। इसी प्रकार कीर्तिका 'यश' नामक पुत्र हुआ। ये सभी धर्मके पुत्र हुए। |
| कामस्य हर्षः पुत्रोऽभूद् देवानन्दो व्यजायत ।<br>इत्येष वै सुखोदर्कः सर्गो धर्मस्य कीर्तितः ॥ २४ ॥ | कामका 'हर्ष' नामक पुत्र हुआ, जो देवताओंको आनन्द देनेवाला हुआ। यही (इतनी) धर्मकी सुखदायक सृष्टि कहलाती है ॥ २१-२४ ॥ |
| जज्ञे हिंसा त्वधर्माद् निकृतिं चानृतं सुतम् ।<br>निकृत्यनृतयोर्जज्ञे भयं नरक एव च ॥ २५ ॥ | अधर्मसे हिंसाने निकृति तथा अनृत नामक पुत्रको उत्पन्न किया। निकृति और अनृतसे भय तथा नरक नामक पुत्र उत्पन्न हुए। |
| माया च वेदना चैव मिथुनं त्विदमेतयोः ।<br>भयाज्जज्ञेऽथ वै माया मृत्युं भूतापहारिणम् ॥ २६ ॥ | माया तथा वेदना—ये दो इनकी क्रमशः भय एवं नरककी पत्नियाँ हैं। मायाने भयसे समस्त प्राणियोंको मार देनेवाले मृत्युको उत्पन्न किया ॥ २५-२६ ॥ |
५२ * कूर्मपुराण *
वेदना च सुतं चापि दुःखं जज्ञेऽथ रौरवात्।
मृत्योर्व्याधिजराशोकसृष्णाक्रोधाश्च जज्ञिरे ॥ २७ ॥
वेदनाने भी रौरव (नरक नामक पति)-से दुःख नामक पुत्र उत्पन्न किया। मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा तथा क्रोध उत्पन्न हुए ॥ २७ ॥
दुःखोत्तराः स्मृता होते सर्वे चाधर्मलक्षणाः।
नैषां भार्यास्ति पुत्रो वा सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतसः ॥ २८ ॥
ये सभी उत्तरोत्तर अधिक दुःखदायी कहे गये हैं और अधर्माचरण ही इनका लक्षण है। इनकी न कोई स्त्री है और न कोई पुत्र। ये सभी ऊर्ध्वरेता हैं ॥ २८ ॥
इत्येष तामसः सर्गो जज्ञे धर्मनियामकः।
संक्षेपेण मया प्रोक्ता विसृष्टिर्मुनिपुंगवाः ॥ २९ ॥
श्रेष्ठ मुनियो! इस प्रकार धर्मनियामकने तामस सर्गकी सृष्टि की। मैंने संक्षेपमें इस विशिष्ट सृष्टिका वर्णन किया ॥ २९ ॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८ ॥
नवाँ अध्याय
शेषशायी नारायणकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति तथा उसी कमलसे ब्रह्माका प्राकट्य, विष्णु-मायाद्वारा ब्रह्माका मोहित होकर विष्णुसे विवाद करना, भगवान् शंकरका प्राकट्य, विष्णुद्वारा ब्रह्माको शिवका माहात्म्य बताना, ब्रह्माद्वारा शिवकी स्तुति तथा शिव और विष्णुके एकत्वका प्रतिपादन
सूत उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं नारदाद्या महर्षयः।
प्रणम्य वरदं विष्णुं पप्रच्छुः संशयान्विताः ॥ १ ॥
सूतजी बोले— नारद आदि महर्षियोंने यह वचन सुननेपर संशयग्रस्त होते हुए वरदाता विष्णुको प्रणामकर इस प्रकार पूछा— ॥ १ ॥
ऋषय ऊचुः
कथितो भवता सर्गो मुख्यादीनां जनार्दन।
इदानीं संशयं चेममस्माकं छेत्तुमर्हसि ॥ २ ॥
कथं स भगवानीशः पूर्वजोऽपि पिनाकधृक्।
पुत्रत्वमगमच्छम्भोर्ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥ ३ ॥
कथं च भगवाञ्जज्ञे ब्रह्मा लोकपितामहः।
अण्डजो जगतामीशस्तन्नो वक्तुमिहार्हसि ॥ ४ ॥
ऋषियोंने कहा— हे जनार्दन! आपने मुख्य आदिकी सृष्टिका वर्णन किया। अब इस समय जो संशय हमें हो रहा है, उसे आप दूर करें—(ब्रह्मासे) पूर्वमें उत्पन्न होनेपर भी पिनाक नामक धनुषको धारण करनेवाले ईश भगवान् शिव किस प्रकार अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके पुत्रत्वको प्राप्त हुए और कैसे जगत्के स्वामी लोकपितामह अण्डज (हिरण्यगर्भ) भगवान् ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई, उसे आप हमें बतायें ॥ २-४ ॥
श्रीकूर्म उवाच
शृणुध्वमृषयः सर्वे शांकरस्यामितौजसः।
पुत्रत्वं ब्रह्मणस्तस्य पद्मयोनित्वमेव च ॥ ५ ॥
श्रीकूर्म बोले— ऋषियो! आप सभी सुनें— अमित तेजस्वी शंकर ब्रह्माके पुत्र-रूपमें कैसे हुए और कैसे ब्रह्मा कमलसे उत्पन्न हुए ॥ ५ ॥
अतीतकल्पावसाने तमोभूतं जगत् त्रयम्।
आसीदेकार्णवं सर्वं न देवाद्या न चर्षयः ॥ ६ ॥
विगत कल्पकी समाप्तिपर तीनों लोकोंमें घोर अन्धकार व्याप्त हो गया। सर्वत्र केवल जल-ही-जल था। न कोई देवता आदि थे और न कोई ऋषिजन ॥ ६ ॥
| * अध्याय ९ * | ५३ |
|---|---|
| तत्र नारायणो देवो निर्जने निरुपप्लवे।<br>आश्रित्य शेषशयनं सुष्वाप पुरुषोत्तमः ॥ ७ ॥ | उस जनशून्य अत्यन्त शान्त (समुद्रमें) पुरुषोत्तम नारायणदेव शेषनागकी शय्याका आश्रय लेकर सोये हुए थे ॥ ७ ॥ |
| सहस्रशीर्षा भूत्वा स सहस्राक्षः सहस्रपात्।<br>सहस्रबाहुः सर्वज्ञश्चिन्त्यमानो मनीषिभिः ॥ ८ ॥<br><br>पीतवासा विशालाक्षो नीलजीमूतसन्निभः।<br>महाविभूतिर्भोगात्मा योगिनां हृदयालयः ॥ ९ ॥<br><br>कदाचित् तस्य सुप्तस्य लीलार्थं दिव्यमद्भुतम्।<br>त्रैलोक्यसारं विमलं नाभ्यां पङ्कजमुद्बभौ ॥ १० ॥<br><br>शतयोजनविस्तीर्णं तरुणादित्यसंनिभम्।<br>दिव्यगन्धमयं पुण्यं कर्णिकाकेसरान्वितम् ॥ ११ ॥ | हजारों सिर, हजारों नेत्र, हजारों चरण, हजारों बाहुवाले होकर वे विद्वानोंके चिन्तनके विषयरूप, सर्वज्ञ, पीतवस्त्रधारी, विशाल नेत्रवाले, नीले बादलके समान वर्णवाले, महाविभूतिस्वरूप, योगियोंके हृदयमें निवास करनेवाले योगात्मा (नारायण) जब किसी समय शेषशय्यापर शयन कर रहे थे, तब उनकी नाभिसे लीला करनेके लिये दिव्य अद्भुत, तीनों लोकोंका साररूप, एक स्वच्छ कमल प्रकट हुआ। (वह कमल) सौ योजन विस्तारवाला, तरुण आदित्यके समान प्रकाशमान, पुण्यमय दिव्य गन्धसे सम्पन्न और कर्णिकाएँ तथा केसरसे समन्वित था ॥ ८-११ ॥ |
| तस्यैव सुचिरं कालं वर्तमानस्य शार्ङ्गिणः।<br>हिरण्यगर्भो भगवांस्तं देशमुपचक्रमे ॥ १२ ॥<br><br>स तं करेण विश्वात्मा समुत्थाप्य सनातनम्।<br>प्रोवाच मधुरं वाक्यं मायया तस्य मोहितः ॥ १३ ॥ | शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करनेवाले शार्ङ्गधन्वा (नारायण) इसी रूपमें बहुत समयसे निवास कर रहे थे तभी एक समय भगवान् हिरण्यगर्भ उस स्थानपर गये। उनकी मायासे मुग्ध उन विश्वात्माने उन (सुप्त) सनातन (पुरुष)-को हाथसे उठाकर यह मधुर वचन कहा— ॥ १२-१३ ॥ |
| अस्मिन्नेकार्णवे घोरे निर्जने तमसावृते।<br>एकाकी को भवाञ्छेते ब्रूहि मे पुरुषर्षभ ॥ १४ ॥ | हे पुरुषश्रेष्ठ! अन्धकारसे आवृत इस घोर, निर्जन एकार्णवमें अकेले सोनेवाले आप कौन हैं? मुझे बतलायें ॥ १४ ॥ |
| तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विहस्य गरुडध्वजः।<br>उवाच देवं ब्रह्माणं मेघगम्भीरनिःस्वनः ॥ १५ ॥ | उनके इस वचनको सुनकर मेघके समान गम्भीर स्वरवाले गरुडध्वजने हँसकर ब्रह्मदेवसे कहा— ॥ १५ ॥ |
| भो भो नारायणं देवं लोकानां प्रभवाप्ययम्।<br>महायोगेश्वरं मां त्वं जानीहि पुरुषोत्तमम् ॥ १६ ॥<br><br>मयि पश्य जगत् कृत्स्नं त्वां च लोकपितामहम्।<br>सपर्वतमहाद्वीपं समुद्रैः सप्तभिर्वृतम् ॥ १७ ॥<br><br>एवमाभाष्य विश्वात्मा प्रोवाच पुरुषं हरिः।<br>जानन्नपि महायोगी को भवानिति वेधसम् ॥ १८ ॥ | (ब्रह्माजी आप) मुझे ही समस्त लोकोंकी उत्पत्ति एवं संहार करनेवाला महायोगेश्वर एवं पुरुषोत्तम नारायण-देव जानें। पर्वत और महान् द्वीपोंसे युक्त सात समुद्रोंसे घिरे हुए इस सम्पूर्ण जगत्के साथ ही समस्त लोकोंके पितामह (ब्रह्माजी) आप अपनेको भी मुझमें ही देखें। ऐसा कहकर विश्वात्मा महायोगी हरिने (सब कुछ) जानते हुए भी ब्रह्मारूपी पुरुषसे कहा—आप कौन हैं? ॥ १६-१८ ॥ |
| ततः प्रहस्य भगवान् ब्रह्मा वेदनिधिः प्रभुः।<br>प्रत्युवाचाम्बुजाभाक्षं सस्मितं श्लक्ष्णया गिरा ॥ १९ ॥ | तदनन्तर वेदनिधि प्रभु भगवान् ब्रह्माने हँसकर कमलकी आभाके समान नेत्रवाले तथा मन्द-मन्द मुसकानवाले (भगवान् विष्णुको इस प्रकार) मधुर वाणीमें उत्तर दिया— ॥ १९ ॥ |
| ५४ | * कूर्मपुराण * |
|---|
अहं धाता विधाता च स्वयम्भूः प्रपितामहः।
मय्येव संस्थितं विश्वं ब्रह्माहं विश्वतोमुखः ॥ २० ॥
श्रुत्वा वाचं स भगवान् विष्णुः सत्यपराक्रमः।
अनुज्ञाप्याथ योगेन प्रविष्टो ब्रह्मणस्तनुम् ॥ २१ ॥
त्रैलोक्यमेतत् सकलं सदेवासुरमानुषम्।
उदरे तस्य देवस्य दृष्ट्वा विस्मयमागतः ॥ २२ ॥
तदास्य वक्त्रान्निष्क्रम्य पन्नगेन्द्रनिकेतनः।
अजातशत्रुर्भगवान् पितामहमथाब्रवीत् ॥ २३ ॥
भवानप्येवमेवाद्य शाश्वतं हि ममोदरम्।
प्रविश्य लोकान् पश्यैतान् विचित्रान् पुरुषर्षभ ॥ २४ ॥
ततः प्रह्लादिनीं वाणीं श्रुत्वा तस्याभिनन्द्य च।
श्रीपतेरुदरं भूयः प्रविवेश कुशध्वजः ॥ २५ ॥
तानेव लोकान् गर्भस्थानपश्यत् सत्यविक्रमः।
पर्यटित्वा तु देवस्य ददृशेऽन्तं न वै हरेः ॥ २६ ॥
ततो द्वाराणि सर्वाणि पिहितानि महात्मना।
जनार्दनेन ब्रह्मासौ नाभ्यां द्वारमविन्दत ॥ २७ ॥
तत्र योगबलेनासौ प्रविश्य कनकाण्डजः।
उज्जहारात्मनो रूपं पुष्कराच्चतुराननः ॥ २८ ॥
विरराजारविन्दस्थः पद्मगर्भसमद्युतिः।
ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् जगद्योनिः पितामहः ॥ २९ ॥
स मन्यमानो विश्वेशमात्मानं परमं पदम्।
प्रोवाच पुरुषं विष्णुं मेघगम्भीरया गिरा ॥ ३० ॥
मैं ही धाता (धारण करनेवाला), विधाता (विधान बनानेवाला), स्वयम्भू (स्वयं ही उत्पन्न होनेवाला) और प्रपितामह हूँ। मुझमें ही (सम्पूर्ण) विश्व स्थित है। मैं सभी ओर मुखवाला ब्रह्मा हूँ॥ २०॥
सत्यपराक्रम वे भगवान् विष्णु (ब्रह्मा)-का वचन सुनकर (उनकी) आज्ञा लेकर योगबलसे ब्रह्माके शरीरमें प्रविष्ट हुए। उन देव (ब्रह्मा)-के उदरमें देवता, असुर तथा मनुष्योंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको देखकर श्रीविष्णुको (अत्यन्त) आश्चर्य हुआ। तदनन्तर नागराजकी शय्यापर निवास करनेवाले अजातशत्रु वे भगवान् (विष्णु) उनके (ब्रह्माके) मुखसे बाहर निकलकर पितामह (ब्रह्मा)-से बोले- ॥ २१-२३॥
पुरुषश्रेष्ठ! आप भी अब इसी प्रकार मेरे उदरमें प्रविष्ट होकर सदा इन विचित्र लोकोंको देखें ॥ २४॥
तब भगवान् विष्णुकी यह आह्लाद प्रदान करनेवाली वाणी सुनकर और पुनः उनका (श्रीविष्णुका) अभिनन्दन कर कुशध्वज (ब्रह्मा)-ने लक्ष्मीपति (भगवान् विष्णु)-के उदरमें प्रवेश किया। सत्यविक्रम (ब्रह्मा)-ने उन्हीं लोकोंको (भगवान् विष्णुके) उदरमें स्थित देखा (जिन्हें श्रीविष्णुने ब्रह्माके उदरमें देखा था)। देवके (उदरमें) भ्रमण करते हुए उन्हें हरि (विष्णु)-का कोई अन्त न दिखायी दिया ॥ २५-२६॥
तदनन्तर महात्मा जनार्दनने (अपनी इन्द्रियोंके) सभी द्वारोंको बंद कर दिया, तब ब्रह्माने उनकी नाभिमें द्वार प्राप्त किया। सुवर्णमय अण्डसे उत्पन्न चतुर्मुख (ब्रह्मा)-ने योगबलसे उसमें (नाभिमें) प्रवेश कर (नाभिसे उत्पन्न) कमलसे अपने रूपको बाहर निकाला ॥ २७-२८॥
पद्मगर्भके समान* शोभावाले स्वयम्भू, जगद्योनि, पितामह भगवान् ब्रह्मा अरविन्द (रक्त कमल)-पर बैठे हुए शोभित होने लगे। अपनेको सम्पूर्ण विश्वका स्वामी तथा परम पद (आश्रय) मानते हुए उन्होंने (ब्रह्माने) मेघके समान गम्भीर वाणीमें पुरुषोत्तम विष्णुसे कहा- ॥ २९-३०॥
* रक्त कमलके भीतर जैसी अरुणिमा होती है वैसी अरुणिमा (लालिमा-ललाई)-से सुशोभित।
| * अध्याय ९ * | ५५ |
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| किं कृतं भवतेदानीमात्मनो जयकाङ्क्षया।<br>एकोऽहं प्रबलो नान्यो मां वै कोऽभिभविष्यति ॥ ३१ ॥ | आपने अपनी विजयकी आकांक्षासे इस समय यह क्या किया (अपनी सभी इन्द्रियोंके द्वारोंको क्यों बंद कर दिया?)। एकमात्र मैं ही सबसे बड़ा बलशाली हूँ और कोई नहीं है, मुझे कौन पराजित कर पायेगा? ॥ ३१ ॥ | | श्रुत्वा नारायणो वाक्यं ब्रह्मणो लोकतन्त्रिणः।<br>सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यं बभाषे मधुरं हरिः ॥ ३२ ॥ | लोकनियामक ब्रह्माका वचन सुनकर नारायण हरिने सान्त्वनापूर्वक यह मधुर वाक्य कहा— ॥ ३२ ॥ | | भवान् धाता विधाता च स्वयम्भूः प्रपितामहः।<br>न मात्सर्याभियोगेन द्वाराणि पिहितानि मे ॥ ३३ ॥<br><br>किन्तु लीलार्थमेवैतन्न त्वां बाधितुमिच्छया।<br>को हि बाधितुमन्विच्छेद देवदेवं पितामहम् ॥ ३४॥<br><br>न तेऽन्यथावगन्तव्यं मान्यो मे सर्वथा भवान्।<br>सर्वमन्वय कल्याणं यन्मयापहृतं तव ॥ ३५ ॥<br><br>अस्माच्च कारणाद् ब्रह्मन् पुत्रो भवतु मे भवान्।<br>पद्मयोनिरिति ख्यातो मत्प्रियार्थं जगन्मय ॥ ३६ ॥ | आप ही धाता, विधाता और स्वयम्भू पितामह हैं। (मैंने) ईर्ष्या-द्वेषके कारण अपने (शरीरके) द्वारोंको बंद नहीं किया, अपितु लीला करनेकी इच्छासे ही मैंने ऐसा किया न कि आपको बाधा पहुँचानेकी दृष्टिसे। देवाधिदेव पितामह आपको भला कौन बाधा पहुँचाना चाहेगा। आपको कुछ अन्यथा नहीं समझना चाहिये। आप मेरे लिये सभी प्रकारसे मान्य हैं। मेरे द्वारा जो आपका अपहरण हुआ है, उसमें आप सभी प्रकारसे अपना कल्याण ही समझें। इसी कारण ब्रह्मन्! मेरी प्रीतिका लिये आप मेरे पुत्र बनें। जगन्मूर्त्ति! आप 'पद्मयोनि' इस नामसे विख्यात हों ॥ ३३—३६ ॥ | | ततः स भगवान् देवो वरं दत्त्वा किरीटिने।<br>प्रहर्षमतुलं गत्वा पुनुर्विष्णुमभाषत ॥ ३७ ॥ | तदनन्तर भगवान् देव (ब्रह्मा)-ने किरीटी (विष्णु)-को वर देकर अत्यन्त प्रसन्न होकर पुनः विष्णुसे कहा— ॥ ३७ ॥ | | भवान् सर्वात्मकोऽनन्तः सर्वेषां परमेश्वरः।<br>सर्वभूतान्तरात्मा वै परं ब्रह्म सनातनम् ॥ ३८ ॥<br><br>अहं वै सर्वलोकानामात्मा लोकमहेश्वरः।<br>मन्मयं सर्वमेवेदं ब्रह्माहं पुरुषः परः ॥ ३९ ॥<br><br>नावाभ्यां विद्यते ह्यन्यो लोकानां परमेश्वरः।<br>एका मूर्त्तिर्द्विधा भिन्ना नारायणपितामहौ ॥ ४० ॥ | आप सभीके आत्मरूप हैं, अनन्त हैं और सभीके परम ईश्वर हैं। आप सभी प्राणियोंकी अन्तरात्मा हैं तथा आप ही सनातन परब्रह्म हैं। मैं ही सभी लोकोंकी आत्मा एवं लोकमहेश्वर हूँ। यह सब कुछ मेरा ही स्वरूप है। मैं परम पुरुष ब्रह्मा हूँ। हम दोनोंके अतिरिक्त लोकोंका परमेश्वर दूसरा अन्य कोई नहीं है, नारायण और पितामहके रूपमें एक मूर्ति ही दो भागोंमें विभक्त हुई है ॥ ३८—४० ॥ | | तेनैवमुक्तो ब्रह्माणं वासुदेवोऽब्रवीदिदम्।<br>इयं प्रतिज्ञा भवतो विनाशाय भविष्यति ॥ ४१ ॥<br><br>किं न पश्यसि योगेशं ब्रह्माधिपतिमव्ययम्।<br>प्रधानपुरुषेशानं वेदाहं परमेश्वरम् ॥ ४२ ॥<br><br>यं न पश्यन्ति योगीन्द्राः सांख्या अपि महेश्वरम्।<br>अनादिनिधनं ब्रह्म तमेव शरणं व्रज ॥ ४३ ॥ | उनके (ब्रह्माके) द्वारा ऐसा कहे जानेपर वासुदेव ब्रह्मासे इस प्रकार बोले—यह प्रतिज्ञा* आपके विनाशका कारण बनेगी। क्या आप ब्रह्माधिपति योगेश्वर, अव्यय एवं प्रधान पुरुष ईशान (शंकर)-को नहीं देख रहे हैं? मैं उन परमेश्वरको जानता हूँ। योगीन्द्र तथा सांख्यशास्त्रके ज्ञाता भी जिन महेश्वरका दर्शन नहीं कर पाते, आप उन्हीं अनादिनिधन ब्रह्मकी शरण ग्रहण करें ॥ ४१—४३ ॥ |
* हम दोनोंके अतिरिक्त दूसरा परमेश्वर नहीं है—यह प्रतिज्ञा।
५६ * कूर्मपुराण *
| ततः क्रुद्धोऽम्बुजाभाक्षं ब्रह्मा प्रोवाच केशवम्।<br>भवान् न नूनमात्मानं वेत्ति तत् परमक्षरम्॥ ४४॥<br><br>ब्रह्माणं जगतामेकमात्मानं परमं पदम्।<br>नावाभ्यां विद्यते ह्यन्यो लोकानां परमेश्वरः॥ ४५॥<br><br>संत्यज्य निद्रां विपुलां स्वमात्मानं विलोकय।<br>तस्य तत् क्रोधजं वाक्यं श्रुत्वा विष्णुर्भाषत॥ ४६॥<br><br>मा मैवं वद कल्याण परिवादं महात्मनः।<br>न मेऽस्त्यविदितं ब्रह्मन् नान्यथाहं वदामि ते॥ ४७॥<br><br>किन्तु मोहयति ब्रह्मन् भवन्तं पारमेश्वरी।<br>मायाशेषविशेषाणां हेतुरात्मसमुद्भवा॥ ४८॥ | तदनन्तर क्रुद्ध ब्रह्माने कमलकी आभाके समान नेत्रवाले केशवसे कहा—निश्चित ही आप अपने-आपको वह परम अक्षर, जगत्का एकमात्र आत्मरूप, ब्रह्मरूप, परम पद (शरण) नहीं जान रहे हैं। हम दोनोंके अतिरिक्त लोकोंका परमेश्वर और दूसरा कोई विद्यमान नहीं है। आप दीर्घ निद्राका परित्याग कर अपने-आपको देखें (पहचानें)। उनके (ब्रह्माके) इस क्रोधयुक्त वचनको सुनकर विष्णुने कहा—हे कल्याण! इस प्रकार न कहें, इस प्रकार न कहें, (यह उन) महात्माकी निन्दा है। ब्रह्मन्! मेरे लिये कुछ भी अज्ञात नहीं है, मैं आपसे असत्य नहीं कह रहा हूँ। किंतु ब्रह्मन्! आत्मासे समुद्भूत समस्त विशेषोंकी हेतुभूत परमेश्वरकी माया ही आपको मोहित कर रही है॥ ४४—४८॥ |
| एतावदुक्त्वा भगवान् विष्णुस्तूष्णीं बभूव ह।<br>ज्ञात्वा तत् परमं तत्त्वं स्वमात्मानं महेश्वरम्॥ ४९॥ | इतना कहकर भगवान् विष्णु अपने आत्मरूप महेश्वरको उस सर्वोत्कृष्ट परम तत्त्वके रूपमें जानकर चुप हो गये॥ ४९॥ |
| कुतोऽप्यपरिमेयात्मा भूतानां परमेश्वरः।<br>प्रसादं ब्रह्मणे कर्तुं प्रादुरासीत् ततो हरः॥ ५०॥<br><br>ललाटनयनोऽनन्तो जटामण्डलमण्डितः।<br>त्रिशूलपाणिर्भगवांस्तेजसां परमो निधिः॥ ५१॥<br><br>दिव्यां विशालां ग्रथितां ग्रहैः सार्केन्दुतारकैः।<br>मालामत्यद्भूताकारां धारयन् पादलम्बिनीम्॥ ५२॥ | तदनन्तर ब्रह्माके ऊपर अनुग्रह करनेके लिये प्राणियोंके परम ईश्वर अपरिमेयात्मा (असीम सामर्थ्यसम्पन्न) हर (भगवान् शंकर) वहाँ प्रादुर्भूत हो गये। उन अनन्त (भगवान् शंकर)-के ललाटमें नेत्र था। वे जटामण्डलसे सुशोभित थे। तेजके परम निधि वे भगवान् हाथमें त्रिशूल लिये थे। उन्होंने सूर्य, चन्द्रमा, ग्रहों तथा नक्षत्रोंसे गूँथी हुई अद्भुत आकारवाली चरणोंतक लटकती हुई लम्बी दिव्य विशाल मालाको धारण कर रखा था॥ ५०—५२॥ |
| तं दृष्ट्वा देवमीशानं ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>मोहितो माययात्यर्थं पीतवाससमब्रवीत्॥ ५३॥<br><br>क एष पुरुषोऽनन्तः शूलपाणिस्त्रिलोचनः।<br>तेजोराशिरमेयात्मा समायाति जनार्दन॥ ५४॥ | उन ईशानदेवको देखकर मायासे अत्यन्त मोहित लोकपितामह ब्रह्माने (अपनी रक्षाके लिये) पीताम्बरधारी (विष्णु)-से कहा—हे जनार्दन! हाथमें त्रिशूल धारण किये, त्रिनेत्रधारी, तेजकी राशिरूप, अमेयात्मा यह कौन अनन्त पुरुष (यहाँ) चला आ रहा है॥ ५३—५४॥ |
| तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विष्णुर्दानवमर्दनः।<br>अपश्यदीश्वरं देवं ज्वलन्तं विमलेऽम्भसि॥ ५५॥<br><br>ज्ञात्वा तत्परमं भावमैश्वरं ब्रह्मभावनम्।<br>प्रोवाचोत्थाय भगवान् देवदेवं पितामहम्॥ ५६॥ | उनके (ब्रह्माके) इस वचनको सुनकर दानवोंका मर्दन करनेवाले विष्णुने निर्मल जलमें देदीप्यमान देव ईश्वरको देखा। ईश्वर-सम्बन्धी उस परम भावरूप ब्रह्मभावको जानकर (महेश्वरमें परम तत्त्वका दर्शनकर) भगवान् (विष्णु) उठकर गये और देवदेव पितामहसे कहने लगे—॥ ५५—५६॥ |
| अयं देवो महादेवः स्वयंज्योतिः सनातनः।<br>अनादिनिधनोऽचिन्त्यो लोकानामीश्वरो महान्॥ ५७॥ | ये देव स्वयं प्रकाशित होनेवाले, सनातन, आदि और अन्तसे रहित, अचिन्त्य, महान्, समस्त लोकोंके ईश्वर महादेव हैं॥ ५७॥ |
- अध्याय ९ * ५७
| शंकरः शम्भुरीशानः सर्वात्मा परमेश्वरः।<br>भूतानामधिपो योगी महेशो विमलः शिवः॥ ५८ ॥<br><br>एष धाता विधाता च प्रधानपुरुषेश्वरः।<br>यं प्रपश्यन्ति यतयो ब्रह्मभावेन भाविताः॥ ५९ ॥<br><br>सृजत्येष जगत् कृत्स्नं पाति संहरते तथा।<br>कालो भूत्वा महादेवः केवलो निष्कलः शिवः॥ ६० ॥<br><br>ब्रह्माणं विदधे पूर्वं भवन्तं यः सनातनः।<br>वेदांश्च प्रददौ तुभ्यं सोऽयमायाति शंकरः॥ ६१ ॥<br><br>अस्यैव चापरां मूर्तिं विश्वयोनिं सनातनीम्।<br>वासुदेवाभिधानां मामवेहि प्रपितामह॥ ६२॥<br><br>किं न पश्यसि योगेशं ब्रह्माधिपतिमव्ययम्।<br>दिव्यं भवतु ते चक्षुर्येन द्रक्ष्यसि तत्परम्॥ ६३॥<br><br>लब्ध्वा शैवं तदा चक्षुर्विष्णोर्लोकपितामहः।<br>बुबुधे परमेशानं पुरतः समवस्थितम्॥ ६४॥<br><br>स लब्ध्वा परमं ज्ञानमैश्वरं प्रपितामहः।<br>प्रपेदे शरणं देवं तमेव पितरं शिवम्॥ ६५ ॥<br><br>ओंकारं समनुस्मृत्य संस्तभ्यात्मानमात्मना।<br>अथर्वशिरसा देवं तुष्टाव च कृताञ्जलिः॥ ६६॥<br><br>संस्तुतस्तेन भगवान् ब्रह्मणा परमेश्वरः।<br>अवाप परमां प्रीतिं व्याजहार स्मयन्निव॥ ६७॥<br><br>मत्समस्त्वं न संदेहो मद्भक्तश्च यतो भवान्।<br>मयैवोत्पादितः पूर्वं लोकसृष्ट्यर्थमव्ययम्॥ ६८ ॥<br><br>त्वमात्मा ह्यादिपुरुषो मम देहसमुद्भवः।<br>वरं वरय विश्वात्मन् वरदोऽहं तवानघ॥ ६९ ॥<br><br>स देवदेववचनं निशम्य कमलोद्भवः।<br>निरीक्ष्य विष्णुं पुरुषं प्रणम्याह वृषध्वजम्॥ ७० ॥<br><br>भगवन् भूतभव्येश महादेवाम्बिकापते।<br>त्वामेव पुत्रमिच्छामि त्वया वा सदृशं सुतम्॥ ७१ ॥ | ये शंकर, शम्भु, ईशान, सर्वात्मा, परमेश्वर, समस्त प्राणियोंके एकमात्र स्वामी, योगी, महेश, विमल एवं शिवरूप (कल्याणरूप) हैं। ये ही धाता, विधाता, प्रधान पुरुष और ईश्वर हैं। यतिजन (संन्यासी लोग) ब्रह्मकी भावनासे भावित होकर जिनका दर्शन करते हैं वे ही केवल, निष्कल, महादेव शिव काल बनकर सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं, रक्षा करते हैं और संहार करते हैं॥ ५८-६० ॥<br><br>ये वे ही शंकर आ रहे हैं, जिन सनातन (देव)-ने पूर्वकालमें आप ब्रह्माको बनाया और आपको वेद प्रदान किया। प्रपितामह ! मुझे इनकी ही विश्वयोनि, सनातन एवं वासुदेव नामवाली दूसरी मूर्ति समझो। क्या आप ब्रह्माके भी अधिपति, अव्यय योगेश्वरको नहीं देख रहे हैं? आपकी दिव्य दृष्टि हो जाय, जिससे आप उस परम (तत्त्व)-को देख सकें ॥ ६१-६३ ॥<br><br>विष्णुसे इस प्रकार शैव-नेत्र (शिव-सम्बन्धी ज्ञान) प्राप्तकर लोक-पितामह (ब्रह्मा)-ने सामने अवस्थित परम ईशानको जाना। उन प्रपितामह (ब्रह्मा)-ने ईश्वर-सम्बन्धी परम ज्ञान प्राप्तकर उन्हीं पितृरूप देव शिवकी शरण ग्रहण की। ओंकार (तत्त्व)-का अनुस्मरणकर और आत्माद्वारा मनका निरोधकर उन्होंने अथर्ववेदके मन्त्रोंसे हाथ जोड़ते हुए (उन) देवकी प्रार्थना की ॥ ६४-६६ ॥<br><br>उन ब्रह्माके द्वारा स्तुति किये जानेपर भगवान् परमेश्वर (शिव)-को परम प्रीति प्राप्त हुई और वे मुसकराते हुए (इस प्रकार) बोले- ॥ ६७॥<br><br>तुम मेरे भक्त हो, इसलिये निःसंदेह तुम मेरे ही समान हो। मेरे द्वारा ही पहले संसारकी सृष्टि करनेके लिये तुम अव्ययको उत्पन्न किया गया था। मेरी देहसे उत्पन्न तुम (मेरी ही) आत्मा और आदि पुरुष हो। हे अनघ ! विश्वात्मन् ! वर माँगो। मैं तुम्हें वर प्रदान करूँगा ॥ ६८-६९ ॥<br><br>कमलसे उत्पन्न उन ब्रह्माने देवाधिदेव (शंकर)-के इस वचनको सुनकर विष्णुकी ओर देखा और उन (परम) पुरुष वृषध्वज (शंकर)-को प्रणामकर उनसे कहा- ॥ ७० ॥<br><br>हे भगवन् ! भूत एवं भविष्यके स्वामी ! महादेव ! अम्बिकाके पति ! मैं आपको ही पुत्र-रूपमें अथवा आपके ही समान पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छा करता हूँ ॥ ७१ ॥ |
५८
- कूर्मपुराण *
| मोहितोऽस्मि महादेव मायया सूक्ष्मया त्वया।<br>न जाने परमं भावं याथातथ्येन ते शिव ॥ ७२ ॥ | महादेव! मैं आपकी सूक्ष्म मायाद्वारा मोहित कर लिया गया हूँ। शिव! मैं आपके परम भावको यथार्थ-रूपमें नहीं जानता हूँ। देव! आप ही भक्तोंके माता-पिता, भाई तथा मित्र हैं। आप प्रसन्न हों। मैं आपके चरणकमलोंमें प्रणाम करता हूँ और आपकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ७२-७३॥ |
| त्वमेव देव भक्तानां भ्राता माता पिता सुहृत्।<br>प्रसीद तव पादाब्जं नमामि शरणं गतः॥ ७३॥ | |
| स तस्य वचनं श्रुत्वा जगन्नाथो वृषध्वजः।<br>व्याजहार तदा पुत्रं समालोक्य जनार्दनम्॥ ७४॥ | तदनन्तर जगत्के स्वामी वृषध्वज (शंकर)-ने उनके वचन सुनकर पुत्र (रूप) जनार्दन (विष्णु)-की ओर देखकर (ब्रह्मासे) कहा—॥ ७४॥ |
| यदर्थितं भगवता तत् करिष्यामि पुत्रक।<br>विज्ञानमैश्वरं दिव्यमुत्पत्स्यति तवानघ ॥ ७५ ॥ | हे पुत्रक! तुमने जैसी इच्छा की है मैं वैसा ही करूँगा। अनघ! तुम्हें ईश्वर-सम्बन्धी दिव्य ज्ञान प्राप्त होगा। मेरे द्वारा तुम्हीं सभी प्राणियोंके प्रथम स्रष्टाके रूपमें नियुक्त किये गये हो। अतः देवेश! लोकपितामह! तुम वैसा ही करो। ये नारायण एवं अनन्त (भगवान् विष्णु) मेरी ही श्रेष्ठ मूर्ति हैं। ये ईशान हरि तुम्हारे योग-क्षेमका वहन करनेवाले होंगे॥ ७५-७७॥ |
| त्वमेव सर्वभूतानामादिकर्ता नियोजितः।<br>तथा कुरुष्व देवेश मया लोकपितामह॥ ७६ ॥ | |
| एष नारायणोऽनन्तो ममैव परमा तनुः।<br>भविष्यति तवेशानो योगक्षेमवहो हरिः॥ ७७ ॥ | |
| एवं व्याहृत्य हस्ताभ्यां प्रीतात्मा परमेश्वरः।<br>संस्पृश्य देवं ब्रह्माणं हरिं वचनमब्रवीत् ॥ ७८ ॥ | ऐसा कहकर प्रसन्नचित्त परमेश्वर (शिव)-ने हाथोंसे देव ब्रह्माका स्पर्शकर हरि (विष्णु)-से कहा—हे जगन्मूर्ति! तुम्हारी भक्तिसे मैं तुमपर सर्वथा प्रसन्न हूँ। वर माँगो। तत्त्वतः हम दोनों भिन्न नहीं हैं॥ ७८-७९॥ |
| तुष्टोऽस्मि सर्वथाहं ते भक्त्या तव जगन्मय।<br>वरं वृणीष्व नह्यावां विभिन्नौ परमार्थतः॥ ७९ ॥ | |
| श्रुत्वाथ देववचनं विष्णुर्विश्वजगन्मयः।<br>प्राह प्रसन्नया वाचा समालोक्य चतुर्मुखम्॥ ८० ॥ | इसके बाद महादेवका वचन सुनकर विश्वमय, जगन्मय विष्णुने चतुर्मुख ब्रह्माकी ओर देखकर प्रीतियुक्त वाणीमें (महादेवसे) कहा—मेरे लिये यही श्लाघनीय वर है कि मैं आप परमेश्वर परमात्माका दर्शन कर रहा हूँ। मेरी आपमें भक्ति हो॥ ८०-८१॥ |
| एष एव वरः श्लाघ्यो यदहं परमेश्वरम्।<br>पश्यामि परमात्मानं भक्तिर्भवतु मे त्वयि॥ ८१ ॥ | |
| तथेत्युक्त्वा महादेवः पुनर्विष्णुमभाषत।<br>भवान् सर्वस्य कार्यस्य कर्ताहमधिदैवतम्॥ ८२ ॥ | 'ऐसा ही हो', यह कहकर महादेवने पुनः विष्णुसे कहा—आप सभी कार्योंके कर्ता हैं और मैं अधिदेवता हूँ। यह सब कुछ मेरा और आपका ही रूप है, इसमें कोई संदेह नहीं है। आप चन्द्रमा हैं, मैं सूर्य हूँ। आप रात्रि हैं, मैं दिन हूँ। आप प्रकृति हैं और मैं ही अव्यक्त पुरुष हूँ। आप ज्ञानरूप हैं और मैं ज्ञाता हूँ, आप मायारूप हैं और मैं ईश्वर हूँ। आप विद्यात्मिका शक्ति हैं, मैं शक्तिमान् ईश्वर हूँ और निष्कल देव परस्वरूप नारायण भी मैं ही हूँ॥ ८२-८५॥ |
| मन्मयं त्वन्मयं चैव सर्वमेतन्न संशयः।<br>भवान् सोमस्त्वहं सूर्यो भवान् रात्रिरहं दिनम्॥ ८३ ॥ | |
| भवान् प्रकृतिरव्यक्तमहं पुरुष एव च।<br>भवान् ज्ञानमहं ज्ञाता भवान् मायाहमीश्वरः॥ ८४ ॥ | |
| भवान् विद्यात्मिका शक्तिः शक्तिमानहमीश्वरः।<br>योऽहं सुनिष्कलो देवः सोऽपि नारायणः परः॥ ८५ ॥ | |
| एकीभावेन पश्यन्ति योगिनो ब्रह्मवादिनः।<br>त्वामनाश्रित्य विश्वात्मन् न योगी मामुपैष्यति।<br>पालयैतज्जगत् कृत्स्नं सदेवासुरमानुषम्॥ ८६ ॥ | ब्रह्मवादी योगी (हम दोनोंको) एक भावसे ही देखते हैं। हे विश्वात्मन्! बिना आपका आश्रय ग्रहण किये योगी मुझे प्राप्त नहीं कर सकते हैं। आप देवता, असुर तथा मनुष्योंसे युक्त इस सम्पूर्ण जगत्का पालन करें॥ ८६॥ |
- अध्याय १० * ५९
इतीदमुक्त्वा भगवाननादिः
स्वमायया मोहितभूतभेदः।
जगाम जन्मर्धिविनाशहीनं
धामैकमव्यक्तमनन्तशक्तिः ॥ ८७ ॥
ऐसा कहकर अपनी मायासे सम्पूर्ण प्राणियोंको मोहित करनेवाले अनादि एवं अनन्तशक्तिसम्पन्न भगवान् जन्म, विकास एवं विनाशसे रहित (अपने) अव्यक्त धाम (स्थान)-को चले गये॥ ८७ ॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें नवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ॥
दसवाँ अध्याय
विष्णुद्वारा मधु तथा कैटभका वध, नाभिकमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा सनकादिकी सृष्टि, ब्रह्मासे रुद्रकी उत्पत्ति, रुद्रकी अष्टमूर्तियों, आठ नामों तथा आठ पत्नियोंका वर्णन, रुद्रके द्वारा अनेक रुद्रोंकी उत्पत्ति तथा पुनः वैराग्य ग्रहण करना, ब्रह्माद्वारा रुद्रकी स्तुति तथा माहात्म्य-वर्णन, रुद्रद्वारा ब्रह्माको ज्ञानकी प्राप्ति, महादेवका त्रिमूर्तित्व और ब्रह्माद्वारा अनेक प्रकारकी सृष्टि
श्रीकूर्म उवाच
गते महेश्वरे देवे स्वाधिवासं पितामहः।
तदेव सुमहत् पद्मं भेजे नाभिसमुत्थितम्॥ १॥
श्रीकूर्मने कहा—महेश्वर देवके अपने निवास-स्थानपर चले जानेके बाद पितामह (ब्रह्मा), (भगवान् विष्णुकी) नाभिसे उत्पन्न उसी विशाल सुन्दर कमलपर रहने लगे॥ १॥
अथ दीर्घेण कालेन तत्राप्रतिमपौरुषौ।
महासुरौ समायातौ भ्रातरौ मधुकैटभौ॥ २॥
क्रोधेन महताविष्टौ महापर्वतविग्रहौ।
कर्णान्तरसमुद्भूतौ देवदेवस्य शार्ङ्गिणः॥ ३॥
तावागतौ समीक्ष्याह नारायणमजो विभुः।
त्रैलोक्यकण्टकावेतावसुरौ हन्तुमर्हसि॥ ४॥
एक लम्बा समय व्यतीत हो जानेपर वहाँ अतुलित शक्तिवाले मधु तथा कैटभ नामक दो असुर आये, जो परस्पर भाई थे। देवोंके भी देव शार्ङ्गधारी भगवान् विष्णुके कानसे उत्पन्न तथा विशाल पर्वतके समान शरीरवाले और महान् क्रोधसे आविष्ट उन दोनों (मधु-कैटभ)-को आया हुआ देखकर अजन्मा, विभु (ब्रह्मा)-ने नारायणसे कहा—ये दोनों असुर तीनों लोकोंके लिये कण्टक हैं, आप इन्हें मारें॥ २—४॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हरिनारायणः प्रभुः।
आज्ञापयामास तयोर्वधार्थं पुरुषावुभौ॥ ५॥
उनके इस वचनको सुनकर प्रभु नारायण हरिने उन दोनोंका वध करनेके लिये (जिष्णु तथा विष्णु नामक) दो पुरुषोंको आज्ञा दी॥ ५॥
तदाज्ञया महद्युद्धं तयोस्ताभ्यामभूद् द्विजाः।
व्यनयत् कैटभं विष्णुर्जिष्णुश्च व्यनयन्मधुम्॥ ६॥
ततः पद्मासनासीनं जगन्नाथं पितामहम्।
बभाषे मधुरं वाक्यं स्नेहाविष्टमना हरिः॥ ७॥
हे ब्राह्मणो! उनकी आज्ञासे उन (विष्णु तथा जिष्णु)-से उन दोनों (मधु-कैटभ) असुरोंका महान् युद्ध हुआ। विष्णुने कैटभको जीता और जिष्णुने मधुको जीता। तदनन्तर स्नेहसे आविष्ट मनवाले हरिने कमलके आसनपर आसीन तथा जगन्नाथ पितामहसे मधुर वचन कहा—॥ ६-७॥
अस्मान्मयोच्यमानस्त्वं पद्मादवतर प्रभो।
नाहं भवन्तं शक्नोमि वोढुं तेजोमयं गुरुम्॥ ८॥
प्रभो! मेरे कहनेसे आप अब इस कमलसे नीचे उतरें। तेजोमय, बहुत भारी आपको ढोनेमें मैं असमर्थ हूँ॥ ८॥
६० * कूर्मपुराण *
| ततोऽवतीर्य विश्वात्मा देहमाविश्य चक्रिणः।<br>अवाप वैष्णवीं निद्रामेकीभूयाथ विष्णुना ॥ ९ ॥ | तब विश्वात्मा (ब्रह्मा) नीचे उतरे और चक्र धारण करनेवाले विष्णुकी देहमें प्रविष्ट होकर वैष्णवी निद्राको प्राप्त हो गये। इस प्रकार विष्णुसे उनकी एकात्मता हो गयी ॥ ९ ॥ |
|---|---|
| सहस्रशीर्षनयनः शङ्खचक्रगदाधरः।<br>ब्रह्मा नारायणाख्योऽसौ सुष्वाप सलिले तदा ॥ १० ॥<br><br>सोऽनुभूय चिरं कालमानन्दं परमात्मनः।<br>अनाद्यनन्तमद्वैतं स्वात्मानं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ११ ॥<br><br>ततः प्रभाते योगात्मा भूत्वा देवश्चतुर्मुखः।<br>ससर्ज सृष्टिं तद्रूपां वैष्णवं भावमाश्रितः ॥ १२ ॥ | तब हजारों सिर तथा हजारों नेत्रवाले और शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले वे नारायण नामवाले ब्रह्मा जलमें सो गये। उन्होंने बहुत समयतक परमात्माके अनादि, अनन्त, आत्मस्वरूप, ब्रह्मसंज्ञक अद्वैत आनन्दका अनुभव किया। तदनन्तर प्रभातकाल होनेपर योगात्मा देव चतुर्मुख होकर और वैष्णव भावका आश्रय ग्रहणकर उसी प्रकारकी (वैष्णवी) सृष्टि करने लगे ॥ १०–१२ ॥ |
| पुरस्तादसृजद् देवः सनन्दं सनकं तथा।<br>ऋभुं सनत्कुमारं च पूर्वजं तं सनातनम् ॥ १३ ॥<br><br>ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः परं वैराग्यमास्थिताः।<br>विदित्वा परमं भावं न सृष्टौ दधिरे मतिम् ॥ १४ ॥<br><br>तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ पितामहः।<br>बभूव नष्टचेता वै मायया परमेष्ठिनः ॥ १५ ॥<br><br>ततः पुराणपुरुषो जगन्मूर्तिर्जनार्दनः।<br>व्याजहारात्मनः पुत्रं मोहनाशाय पद्मजम् ॥ १६ ॥ | उन देवने सर्वप्रथम पूर्वजोंके भी पूर्वज सनन्दन, सनक, ऋभु, सनत्कुमार तथा सनातनको उत्पन्न किया। (सुख-दुःख आदि) द्वन्द्व एवं मोह (आसक्ति)-से सर्वथा शून्य एवं परम वैराग्यभावमें स्थित इन सनक आदि ऋषियोंने परम तत्त्वको जानकर सृष्टिकार्यमें अपनी बुद्धि नहीं लगायी। उन (सनकादि)-के इस प्रकारके लोक-सृष्टिसे सर्वथा निरपेक्षभावको देखकर पितामह (ब्रह्मा) परमेष्ठी (परमात्मा—जनार्दन)-की मायासे मोहित हो गये। तब जगन्मूर्ति, पुराणपुरुष, जनार्दनने (नाभि) कमलसे उत्पन्न अपने पुत्र (ब्रह्मा)-का मोह नष्ट करनेके लिये उनसे कहा— ॥ १३–१६ ॥ |
| विष्णुरुवाच<br>कच्चिन्न विस्मृतो देवः शूलपाणिः सनातनः।<br>यदुक्तवानात्मनोऽसौ पुत्रत्वे तव शंकरः ॥ १७ ॥ | **विष्णु बोले—**कहीं आप शूलपाणि सनातन-देवको भूल तो नहीं गये? उन शंकरने अपनेको आपके पुत्र-रूपमें होनेकी बात कही थी ॥ १७ ॥ |
| अवाप्य संज्ञां गोविन्दात् पद्मयोनिः पितामहः।<br>प्रजाः स्रष्टुमनास्तेपे तपः परमदुश्चरम् ॥ १८ ॥<br><br>तस्यैवं तप्यमानस्य न किञ्चित् समवर्तत।<br>ततो दीर्घेण कालेन दुःखात् क्रोधोऽभ्यजायत ॥ १९ ॥ | गोविन्दसे चेतना प्राप्तकर पद्मयोनि पितामह प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छासे परम दुश्चर तप करने लगे। उनके इस प्रकार (दीर्घकालतक) तप करनेपर (भी) किसी भी प्रकारकी सृष्टि नहीं हुई। बहुत समय बीत जानेपर उन्हें दुःखसे क्रोध उत्पन्न हुआ ॥ १८–१९ ॥ |
| क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः।<br>ततस्तेभ्योऽश्रुबिन्दुभ्यो भूताः प्रेतास्तथाभवन् ॥ २० ॥<br><br>सर्वांस्तानश्रुजान् दृष्ट्वा ब्रह्मात्मानमनिन्दत।<br>जहौ प्राणांश्च भगवान् क्रोधाविष्टः प्रजापतिः ॥ २१ ॥ | क्रोधाविष्ट उनके (ब्रह्माके) नेत्रोंसे आँसूकी बूँदें गिरीं। तब उन आँसुओंकी बूँदोंसे भूत-प्रेत उत्पन्न हुए। आँसुओंसे उत्पन्न उन सब (भूत-प्रेतों)-को देखकर क्रोधाविष्ट प्रजापति भगवान् ब्रह्माने अपनी ही निन्दा की और अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया ॥ २०–२१ ॥ |
| तदा प्राणमयो रुद्रः प्रादुरासीत् प्रभोर्मुखात्।<br>सहस्रादित्यसंकाशो युगान्तदहनोपमः ॥ २२ ॥ | तदनन्तर प्रभुके मुखसे हजारों सूर्यके समान देदीप्य-मान तथा प्रलयकालीन अग्निके सदृश प्राणमय रुद्र प्रकट हुए ॥ २२ ॥ |
* अध्याय १० *
६१
| रुरोद सुस्वरं घोरं देवदेवः स्वयं शिवः।<br>रोदमानं ततो ब्रह्मा मा रोदीरित्यभाषत।<br>रोदनाद् रुद्र इत्येवं लोके ख्यातिं गमिष्यसि ॥ २३॥ | देवोंके भी देव स्वयं शिव उच्च स्वरमें घोर रुदन करने लगे। तब रुदन करते हुए उनसे ब्रह्माने 'मत रोओ'—इस प्रकारसे कहा। तुम रुदन करनेके कारण 'रुद्र' इस नामसे संसारमें प्रसिद्धि प्राप्त करोगे ॥ २३॥ |
| अन्यानि सप्त नामानि पत्नीः पुत्रांश्च शाश्वतान्।<br>स्थानानि चैषामष्टानां ददौ लोकपितामहः ॥ २४॥ | लोकपितामहने (उन्हें रुद्रके अतिरिक्त) अन्य सात नाम, (आठ) पत्नियाँ, शाश्वत (दीर्घायु) पुत्र और आठ स्थानों* (मूर्तियों)-को प्रदान किया ॥ २४॥ |
| भवः शर्वस्तथेशानः पशूनां पतिरेव च।<br>भीमश्चोग्रो महादेवस्तानि नामानि सप्त वै॥ २५॥<br>सूर्यो जलं मही वह्निर्वायुराकाशमेव च।<br>दीक्षितो ब्राह्मणश्चन्द्र इत्येता अष्टमूर्तयः ॥ २६॥ | भव, शर्व, ईशान, पशुपति, भीम, उग्र तथा महादेव—ये सात नाम हैं। सूर्य, जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश, दीक्षित ब्राह्मण तथा चन्द्र—ये (रुद्रकी) आठ मूर्तियाँ हैं ॥ २५-२६॥ |
| स्थानेष्वेतेषु ये रुद्रं ध्यायन्ति प्रणमन्ति च।<br>तेषामष्टतनुर्देवो ददाति परमं पदम् ॥ २७॥ | जो इन आठ स्थानों (मूर्तिरूपों)-में रुद्रका ध्यान करते हैं और उन्हें प्रणाम करते हैं, उन्हें अष्टमूर्तिरूप देव (भगवान् शिव अपना) परम पद देते हैं ॥ २७॥ |
| सुवर्चला तथैवोमा विकेशी च तथा शिवा।<br>स्वाहा दिशश्च दीक्षा च रोहिणी चेति पत्नयः ॥ २८॥ | सुवर्चला, उमा, विकेशी, शिवा, स्वाहा, दिशाएँ, दीक्षा तथा रोहिणी—ये ही (रुद्रकी आठ) पत्नियाँ हैं। |
| शनैश्चरस्तथा शुक्नो लोहिताङ्गो मनोजवः।<br>स्कन्दः सर्गोऽथ संतानो बुधश्चैषां सुताः स्मृताः ॥ २९॥ | शनैश्चर, शुक्र, लोहिताङ्ग (मंगल), मनोजव (कामदेव), स्कन्द, सर्ग, संतान तथा बुध—ये (आठ उनके) पुत्र कहे गये हैं ॥ २८-२९॥ |
| एवम्प्रकारो भगवान् देवदेवो महेश्वरः।<br>प्रजाधर्मं च कामं च त्यक्त्वा वैराग्यमाश्रितः ॥ ३०॥ | इस प्रकारके देवाधिदेव भगवान् महेश्वरने प्रजाधर्म (सृष्टिकार्य) एवं काम (वासना)-का परित्यागकर वैराग्यका आश्रय ग्रहण किया। उस शाश्वत, परम अमृतरूपी अक्षर ब्रह्मका आस्वादनकर और आत्मामें आत्मतत्त्वका आधानकर वे ईश्वरभावमें स्थित हो गये ॥ ३०-३१॥ |
| आत्मन्याधाय चात्मानमैश्वरं भावमास्थितः।<br>पीत्वा तदक्षरं ब्रह्म शाश्वतं परमामृतम् ॥ ३१॥ | |
| प्रजाः सृजेति चादिष्टो ब्रह्मणा नीललोहितः।<br>स्वात्मना सदृशान् रुद्रान् ससर्ज मनसा शिवः ॥ ३२॥ | ब्रह्माके द्वारा 'प्रजाकी सृष्टि करो' इस प्रकारका आदेश प्राप्तकर नीललोहित शिवने मनसे अपने ही समान रुद्रोंकी सृष्टि की ॥ ३२॥ |
| कपर्दिनो निरातङ्कान् नीलकण्ठान् पिनाकिनः।<br>त्रिशूलहस्तानृष्टिघ्नान् महानन्दांस्त्रिलोचनान् ॥ ३३॥ | प्रभुने सैकड़ों करोड़ जटाजूट धारण करनेवाले, भयरहित, नीलकण्ठ, पिनाकपाणि, हाथमें त्रिशूल धारण किये, ऋष्टिघ्न, महान् आनन्दस्वरूप, तीन नेत्रयुक्त, जरा-मरणसे रहित, विशाल वृषभोंको वाहनरूपमें स्वीकार करनेवाले सर्वज्ञ तथा वीतराग (रुद्रों)-को उत्पन्न किया ॥ ३३-३४॥ |
| जरामरणनिर्मुक्तान् महावृषभवाहनान्।<br>वीतरागांश्च सर्वज्ञान् कोटिकोटिशतान् प्रभुः ॥ ३४॥ | |
| तान् दृष्ट्वा विविधान् रुद्रान् निर्मलान् नीललोहितान्।<br>जरामरणनिर्मुक्तान् व्याजहार हरं गुरुः ॥ ३५॥ | गुरु (ब्रह्मा)-ने जरा-मरणसे रहित, नीललोहित एवं निर्मल उन अनेक रुद्रोंको देखकर हर (शिव)-से कहा ॥ ३५॥ |
* ये आठ स्थान सूर्य, जल आदि आगे गिनाये गये हैं। इनमें रुद्रका निवास है। इसीलिये ये आठ रुद्रकी मूर्ति माने जाते हैं।
६२ * कूर्मपुराण *
| मा स्त्राक्षीरीदृशीर्देव प्रजा मृत्युविवर्जिताः ।<br>अन्याः सृजस्व भूतेश जन्ममृत्युसमन्विताः ॥ ३६ ॥ | हे देव! मृत्युसे रहित इस प्रकारकी सृष्टि मत करो। भूतेश! जन्म एवं मृत्युवाली दूसरी प्रकारकी सृष्टि करो॥ ३६॥ |
| ततस्तमाह भगवान् कपर्दी कामशासनः ।<br>नास्ति मे तादृशः सर्गः सृज त्वमशुभाः प्रजाः ॥ ३७ ॥ | तदनन्तर कामपर शासन करनेवाले जटाजूटधारी भगवान् (शिव)—ने उनसे कहा—मेरे पास उस प्रकारकी (जन्म-मृत्युसे युक्त) सृष्टि नहीं है। (ऐसी) अशुभ प्रजाओंको आप ही उत्पन्न करें। तबसे उन देवने अशुभ प्रजाओंकी सृष्टि नहीं की। (और) अपने आत्मज उन रुद्रोंके साथ वे निवृत्तात्मा (क्रियारहित)—के रूपमें स्थित हो गये। इसी कारण देवोंमें देव उन शूलधारी (शंकर)—का स्थाणुत्व हुआ (अर्थात् वे ‘स्थाणु’^१ इस नामसे प्रसिद्ध हो गये) ॥ ३७-३८ ॥ |
| ततः प्रभृति देवोऽसौ न प्रसूतेऽशुभाः प्रजाः ।<br>स्वात्मजैरेव तै रुद्रैर्निवृत्तात्मा ह्यतिष्ठत ।<br>स्थाणुत्वं तेन तस्यासीद् देवदेवस्य शूलिनः ॥ ३८ ॥<br>ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यं तपः सत्यं क्षमा धृतिः ।<br>स्रष्टृत्वमात्मसम्बोधो ह्यधिष्ठातृत्वमेव च ॥ ३९ ॥ | भगवान् शंकरमें ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, तप, सत्य, क्षमा, धृति, स्रष्टृत्व, आत्मज्ञान तथा अधिष्ठातृत्व—ये दस अव्यय (शाश्वत) गुण सदा प्रतिष्ठित रहते हैं। ये पिनाक धारण करनेवाले शंकर ही साक्षात् परमेश्वर हैं ॥ ३९-४० ॥ |
| अव्ययानि दशैतानि नित्यं तिष्ठन्ति शंकरे ।<br>स एव शंकरः साक्षात् पिनाकी परमेश्वरः ॥ ४० ॥<br>ततः स भगवान् ब्रह्मा वीक्ष्य देवं त्रिलोचनम् ।<br>सहैव मानसैः पुत्रैः प्रीतिविस्फारिलोचनः ॥ ४१ ॥ | तदनन्तर प्रीतिसे विकसित नेत्रवाले भगवान् ब्रह्माने तीन नेत्रोंवाले देव (शंकर)—को मानस पुत्रोंके साथ देखा। ब्रह्माने अपनी ज्ञान-दृष्टिसे ईश्वर-सम्बन्धी परात्पर भावको जानकर जगत्के एकमात्र स्वामी (भगवान् शंकर)—की अपने मस्तकपर हाथोंकी अंजलि बाँधकर स्तुति की ॥ ४१-४२ ॥ |
| ज्ञात्वा परतरं भावमैश्वरं ज्ञानचक्षुषा ।<br>तुष्टाव जगतामेकं कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम् ॥ ४२ ॥ | |
| ब्रह्मोवाच<br>नमस्तेऽस्तु महादेव नमस्ते परमेश्वर ।<br>नमः शिवाय देवाय नमस्ते ब्रह्मरूपिणे ॥ ४३ ॥<br><br>नमोऽस्तु ते महेशाय नमः शान्ताय हेतवे ।<br>प्रधानपुरुषेशाय योगाधिपतये नमः ॥ ४४ ॥<br><br>नमः कालाय रुद्राय महाग्रासाय शूलिने ।<br>नमः पिनाकहस्ताय त्रिनेत्राय नमो नमः ॥ ४५ ॥<br><br>नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं ब्रह्मणो जनकाय ते ।<br>ब्रह्मविद्याधिपतये ब्रह्मविद्याप्रदायिने ॥ ४६ ॥ | ब्रह्माने कहा—महादेव! आपको नमस्कार है। परमेश्वर! आपको नमस्कार है। शिवको नमस्कार है। ब्रह्मरूपी देवको नमस्कार है। महेश! आपको नमस्कार है। शान्तिके मूलहेतु! आपको नमस्कार है। प्रधान पुरुषेश! आपको नमस्कार है तथा योगाधिपति आपको नमस्कार है। काल, रुद्र, महाग्रास^२ तथा शूलीको नमस्कार है। हाथमें पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। तीन नेत्रवालेको बार-बार नमस्कार है। त्रिमूर्तिस्वरूप आपको नमस्कार है। ब्रह्माके उत्पत्तिकर्ता आपके लिये नमस्कार है। ब्रह्मविद्याके अधिपति और ब्रह्मविद्या प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ४३—४६ ॥ |
१-स्थाणु-ठूँठ। ठूँठकी ही तरह निष्क्रिय होनेसे शिवको स्थाणु कहा गया है।
२-महाप्रलयमें भगवान् शंकर समस्त प्राणियोंको अपनी गोदमें सुला लेते हैं—इसलिये महाग्रास कहे जाते हैं।
- अध्याय १० * ६३
| नमो वेदरहस्याय कालकालाय ते नमः।<br>वेदान्तसारसाराय नमो वेदात्ममूर्तये ॥ ४७ ॥<br><br>नमो बुद्धाय शुद्धाय योगिनां गुरवे नमः।<br>प्रहीणशोकैर्विविधैर्भूतैः परिवृताय ते ॥ ४८ ॥<br><br>नमो ब्रह्मण्यदेवाय ब्रह्माधिपतये नमः।<br>त्रियम्बकाय देवाय नमस्ते परमेष्ठिने ॥ ४९ ॥ | वेदोंके रहस्यरूपको नमस्कार है। कालके भी काल आपको नमस्कार है। वेदान्तसारके भी सारको नमस्कार है। वेदात्ममूर्तिको नमस्कार है। शुद्ध-बुद्धस्वरूपको नमस्कार है। योगियोंके गुरुको नमस्कार है। शोकोंसे रहित विविध भूतोंसे घिरे हुए आपको नमस्कार है। ब्रह्मण्यदेवको नमस्कार है। ब्रह्माधिपतिके लिये नमस्कार है। त्रिलोचन परमेष्ठी देवको नमस्कार है ॥ ४७–४९ ॥ |
| नमो दिग्वाससे तुभ्यं नमो मुण्डाय दण्डिने।<br>अनादिमलहीनाय ज्ञानगम्याय ते नमः ॥ ५० ॥<br><br>नमस्ताराय तीर्थाय नमो योगर्द्धिहेतवे।<br>नमो धर्माधिगम्याय योगगम्याय ते नमः ॥ ५१ ॥<br><br>नमस्ते निष्प्रपञ्चाय निराभासाय ते नमः।<br>ब्रह्मणे विश्वरूपाय नमस्ते परमात्मने ॥ ५२ ॥ | दिगम्बर ! आपको नमस्कार है। मुण्ड (की माला) एवं दण्ड धारण करनेवालेको नमस्कार है। अनादि तथा मलरहित (शुद्धरूप), ज्ञानगम्य आपको नमस्कार है। तारक एवं तीर्थरूप तथा योगविभूतियोंके मूल कारणको नमस्कार है। धर्म (धर्माचरण)-के द्वारा प्राप्य, योगगम्य आपको नमस्कार है। निष्प्रपञ्चको नमस्कार है। निराभास ! आपको नमस्कार है। विश्वरूप ब्रह्म परमात्माको नमस्कार है ॥ ५०–५२ ॥ |
| त्वयैव सृष्टमखिलं त्वय्येव सकलं स्थितम्।<br>त्वया संह्रियते विश्वं प्रधानाद्यं जगन्मय ॥ ५३ ॥<br><br>त्वमीश्वरो महादेवः परं ब्रह्म महेश्वरः।<br>परमेष्ठी शिवः शान्तः पुरुषो निष्कलो हरः ॥ ५४ ॥<br><br>त्वमक्षरं परं ज्योतिस्त्वं कालः परमेश्वरः।<br>त्वमेव पुरुषोऽनन्तः प्रधानं प्रकृतिस्तथा ॥ ५५ ॥ | जगन्मय ! आपके द्वारा ही यह सम्पूर्ण (जगत्) रचा गया है, आपमें ही यह सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है और आप ही प्रधानादि समस्त विश्वका संहार करते हैं। आप ईश्वर, महादेव, परब्रह्म, महेश्वर, परमेष्ठी, शिव, शान्त, पुरुष, निष्कल तथा हर हैं। आप अक्षर, परम ज्योति हैं, आप काल तथा परमेश्वर हैं और आप ही प्रधान पुरुष, प्रकृति तथा अनन्त हैं ॥ ५३–५५ ॥ |
| भूमिरापोऽनलो वायुर्व्योमाहंकार एव च।<br>यस्य रूपं नमस्यामि भवन्तं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ५६ ॥<br><br>यस्य द्यौर्भवन्मूर्धा पादौ पृथ्वी दिशो भुजाः।<br>आकाशमुदरं तस्मै विराजे प्रणमाम्यहम् ॥ ५७ ॥<br>संतापयति यो विश्वं स्वभाभिर्भासयन् दिशः।<br>ब्रह्मतेजोमयं नित्यं तस्मै सूर्यात्मने नमः ॥ ५८ ॥<br><br>हव्यं वहति यो नित्यं रौद्री तेजोमयी तनुः।<br>कव्यं पितृगणानां च तस्मै वह्नयात्मने नमः ॥ ५९ ॥<br><br>आप्यायति यो नित्यं स्वधाम्ना सकलं जगत्।<br>पीयते देवतासंघैस्तस्मै सोमात्मने नमः ॥ ६० ॥ | भूमि, जल, वायु, अग्नि, आकाश एवं अहंकार—ये जिसके रूप हैं, उन ब्रह्मसंज्ञक आपको नमस्कार करता हूँ। द्युलोक जिनका मस्तक है, पृथ्वी पैर है, दिशाएँ जिनकी भुजाएँ हैं और आकाश जिनका उदर है, उन विराट् पुरुषको मेरा प्रणाम है। जो अपने प्रकाशसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करते हुए विश्वको अपेक्षित उष्णता प्रदान करते हैं, उन नित्य ब्रह्म तेजोमय सूर्यरूपको नमस्कार है। जो अपने रौद्र तेजोमय शरीरसे (देवताओंको) हव्य तथा पितरोंको कव्य पहुँचाते हैं, उन अग्निस্বরূপ (देव)-को नमस्कार है। जो अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत्को नित्य संतृप्त करते हैं और देवतासमूहके द्वारा जिनका पान किया जाता है, उन सोमरूप चन्द्रदेवको नमस्कार है ॥ ५६–६० ॥ |
| बिभर्त्यशेषभूतानि योऽन्तश्चरति सर्वदा।<br>शक्तिर्माहेश्वरी तुभ्यं तस्मै वाय्वात्मने नमः ॥ ६१ ॥ | जो सम्पूर्ण प्राणियोंका भरण-पोषण करती है और जो (सभी प्राणियोंके) भीतर सदा विचरण करती है, ऐसी वायुरूपात्मक माहेश्वरीशक्ति आपको नमस्कार है ॥ ६१ ॥ |
६४ * कूर्मपुराण *
| सृजत्यशेषमेवेदं यः स्वकर्मानुरूपतः।<br>स्वात्मन्यवस्थितस्तस्मै चतुर्वक्त्रात्मने नमः॥ ६२॥ | जो प्राणियोंके अपने-अपने कर्मोंके अनुसार इस सम्पूर्ण (जगत्)-की सृष्टि करते हैं, उन अपनी आत्मामें प्रतिष्ठित चतुर्मुखात्मक (ब्रह्मा)-को नमस्कार है। |
| यः शेषशयने शेते विश्वमावृत्य मायया।<br>स्वात्मानुभूतियोगेन तस्मै विश्वात्मने नमः॥ ६३॥ | जो अपने आत्मामें प्रतिष्ठित अनुभूतिरूप योगसे (प्रेरित) मायाद्वारा सम्पूर्ण विश्वको आवृतकर शेष (शेषनाग)-की शय्यापर शयन करते हैं, उन विश्वात्माको नमस्कार है। |
| बिभर्ति शिरसा नित्यं द्विसप्तभुवनात्मकम्।<br>ब्रह्माण्डं योऽखिलाधारस्तस्मै शेषात्मने नमः॥ ६४॥ | जो चौदह भुवनोंवाले ब्रह्माण्डको नित्य अपने सिरपर धारण किये रहते हैं और जो सभीके आश्रय हैं, उन शेषात्माको नमस्कार है॥ ६२-६४॥ |
| यः परान्ते परानन्दं पीत्वा दिव्यैकसाक्षिकम्।<br>नृत्यत्यनन्तमहिमा तस्मै रुद्रात्मने नमः॥ ६५॥ | जो महाप्रलयकालमें दिव्य एवं एकमात्र साक्षीरूप परमानन्दका आस्वादन करते हुए नृत्य करते हैं, उन अनन्त महिमावाले रुद्रात्माको नमस्कार है। |
| योऽन्तरा सर्वभूतानां नियन्ता तिष्ठतीश्वरः।<br>तं सर्वसाक्षिणं देवं नमस्ये भवतस्तनुम्॥ ६६॥ | जो ईश्वर सभी प्राणियोंके भीतर नियन्ताके रूपमें प्रतिष्ठित रहते हैं, उन सर्वसाक्षी देव और उनके शरीररूप (देव)-को मैं नमस्कार करता हूँ। |
| यं विनिद्रा जितश्वासाः संतुष्टाः समदर्शिनः।<br>ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः॥ ६७॥ | निद्रारहित, श्वासको जीतनेवाले, संतुष्ट तथा समदर्शी (योगीजन समाधिमें) जिस ज्योति या प्रकाशका दर्शन करते हैं, उन योगात्माको नमस्कार है। |
| यया संतरते मायां योगी संक्षीणकल्मषः।<br>अपारतरपर्यन्तां तस्मै विद्यात्मने नमः॥ ६८॥ | जिस (विद्या)-के द्वारा पुण्यात्मा योगीजन अत्यन्त कठिनतासे पार की जा सकनेवाली मायाको सरलतासे पार कर लेते हैं, उस विद्यास्वरूप (देव)-को नमस्कार है। |
| यस्य भासा विभातीदमद्वयं तमसः परम्।<br>प्रपद्ये तत् परं तत्त्वं तद्रूपं परमेश्वरम्॥ ६९॥ | जिसके प्रकाशसे यह (विश्व) प्रकाशित होता है, मैं (उस) अन्धकारसे सर्वथा रहित अर्थात् प्रकाशस्वरूप और अद्वितीय परम तत्त्व-स्वरूप (तद्रूप परम-तत्त्व मात्र ही जिनका स्वरूप है, उन) परमेश्वरकी शरण ग्रहण करता हूँ। |
| नित्यानन्दं निराधारं निष्कलं परमं शिवम्।<br>प्रपद्ये परमात्मानं भवन्तं परमेश्वरम्॥ ७०॥ | मैं नित्यानन्दस्वरूप, निराधार, निष्कल परमात्मा, परमेश्वर आप परम शिवकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ६५-७०॥ |
| एवं स्तुत्वा महादेवं ब्रह्मा तद्भावभावितः।<br>प्राञ्जलिः प्रणतस्तस्थौ गृणन् ब्रह्म सनातनम्॥ ७१॥ | इस प्रकार महादेवकी स्तुतिकर ब्रह्मा उनकी भावनासे भावित होकर सनातन ब्रह्मको सम्बोधित करते हुए विनयपूर्वक हाथ जोड़े हुए खड़े हो गये॥ ७१॥ |
| ततस्तस्मै महादेवो दिव्यं योगमनुत्तमम्।<br>ऐश्वर्यं ब्रह्मसद्भावं वैराग्यं च ददौ हरः॥ ७२॥ | तदनन्तर महादेव हरने उन्हें सर्वश्रेष्ठ दिव्य योग (ज्ञान), ऐश्वर्य, ब्रह्मकी सद्भावना (ब्रह्मविषयक उत्तम भाव) तथा वैराग्य प्रदान किया। |
| कराभ्यां सुशुभाभ्यां च संस्पृश्य प्रणतार्तिहा।<br>व्याजहार स्वयं देवः सोऽनुगृह्य पितामहम्॥ ७३॥ | शरणागतोंका कष्ट हरनेवाले उन (शंकर) देवने स्वयं अपने मनोरम एवं कल्याणकारी हाथोंके द्वारा उनका (ब्रह्माका) स्पर्श किया और उनपर अनुग्रह करके वे बोले-॥ ७२-७३॥ |
* अध्याय १० *
६५
| यत्त्वयाभ्यर्थितं ब्रह्मन् पुत्रत्वे भवतो मम।<br>कृतं मया तत् सकलं सृजस्व विविधं जगत्॥ ७४॥<br><br>त्रिधा भिन्नोऽस्म्यहं ब्रह्मन् ब्रह्मविष्णुहराख्यया।<br>सर्गरक्षालयगुणैर्निष्कलः परमेश्वरः॥ ७५॥<br><br>स त्वं ममाग्रजः पुत्रः सृष्टिहेतोर्विनिर्मितः।<br>ममैव दक्षिणादङ्गाद् वामाङ्गात् पुरुषोत्तमः॥ ७६॥<br><br>तस्य देवादिदेवस्य शम्भोर्हृदयदेशतः।<br>सम्बभूवाथ रुद्रोऽसावहं तस्यापरा तनुः॥ ७७॥<br><br>ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्मन् सर्गस्थित्यन्तहेतवः।<br>विभज्यात्मानमेकोऽपि स्वेच्छया शंकरः स्थितः॥ ७८॥ | ब्रह्मन्! जो आपने 'मेरा पुत्र बनें' इस प्रकारसे मुझसे प्रार्थना की थी, मैंने उसे (रुद्ररूपमें उत्पन्न होकर) पूर्ण कर दिया। (अब आप) विविध प्रकारके जगत्की सृष्टि करें। ब्रह्मन्! मैं ही निष्कल परमेश्वर सृष्टि, रक्षा एवं प्रलय—इन तीन गुणोंसे भावित होकर ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव—इन नामोंसे तीन रूपोंमें विभक्त हूँ। आप मेरे ज्येष्ठ पुत्र हैं और सृष्टिकी रचनाके लिये मेरे ही दाहिने अङ्गसे आप बनाये गये हैं। मेरे ही बायें अङ्गसे पुरुषोत्तम विष्णु उत्पन्न हैं। उन्हीं देवोंमें आदिदेव शम्भुके हृदयप्रदेशसे मैं ही रुद्ररूपमें प्रादुर्भूत हूँ और उन्हींकी अपर मूर्ति हूँ। हे ब्रह्मन्! ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव (क्रमशः) सृष्टि, स्थिति तथा संहारके हेतु हैं। एक होते हुए भी वे शंकर अपनी इच्छासे अपनेको (तीन रूपोंमें) विभक्तकर स्थित रहते हैं॥ ७४–७८॥ |
| तथान्यानि च रूपाणि मम मायाकृतानि तु।<br>निरूपः केवलः स्वच्छो महादेवः स्वभावतः॥ ७९॥ | इसी प्रकार अन्य भी जो रूप हैं, वे सब मेरी मायाद्वारा ही निर्मित हैं। स्वरूपतः महादेव स्वच्छ, रूपरहित एवं अद्वितीय हैं॥ ७९॥ |
| एभ्यः परतरो देवस्त्रिमूर्तिः परमा तनुः।<br>माहेश्वरी त्रिनयना योगिनां शान्तिदा सदा॥ ८०॥ | वे देव इन त्रिमूर्तियों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश)-से उत्कृष्ट एवं श्रेष्ठ शरीरवाले हैं। तीन नेत्रोंवाली वह माहेश्वरी मूर्ति योगियोंको सदा शान्ति प्रदान करनेवाली है॥ ८०॥ |
| तस्या एव परां मूर्ति मामवेहि पितामह।<br>शाश्वतैश्वर्यविज्ञानतेजोयोगसमन्विताम् ॥ ८१॥<br><br>सोऽहं ग्रसामि सकलमधिष्ठाय तमोगुणम्।<br>कालो भूत्वा न तमसा मामन्योऽभिभविष्यति॥ ८२॥<br><br>यदा यदा हि मां नित्यं विचिन्तयसि पद्मज।<br>तदा तदा मे सांनिध्यं भविष्यति तवानघ॥ ८३॥ | पितामह! मुझे सनातन ऐश्वर्य, विज्ञान, तेज एवं योगसे समन्वित उनकी वही परा मूर्ति समझो। वही मैं कालरूप होकर तमोगुणका आश्रय लेकर समस्त विश्वको ग्रस्त कर लेता हूँ, कोई दूसरा तमद्वारा मुझे अभिभूत नहीं कर सकता। निष्पाप कमलोद्भव! जब-जब मुझ सनातनका तुम ध्यान करोगे, तब-तब तुम मेरी समीपता प्राप्त करोगे॥ ८१–८३॥ |
| एतावदुक्त्वा ब्रह्माणं सोऽभिवन्द्य गुरुं हरः।<br>सहैव मानसैः पुत्रैः क्षणादन्तरधीयत॥ ८४॥ | इतना कहकर गुरु (पिता) ब्रह्माकी वन्दना करके वे हर (महेश्वर) मानस पुत्रोंके साथ क्षणभरमें ही अन्तर्धान हो गये॥ ८४॥ |
| सोऽपि योगं समास्थाय ससर्ज विविधं जगत्।<br>नारायणाख्यो भगवान् यथापूर्वं प्रजापतिः॥ ८५॥<br><br>मरीचिभृग्वङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।<br>दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजद् योगविद्यया॥ ८६॥<br><br>नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः।<br>सर्वे ते ब्रह्मणा तुल्याः साधका ब्रह्मवादिनः॥ ८७॥ | नारायण नामवाले उन भगवान्ने योगका अवलम्बन कर प्रजापतिने जैसी सृष्टि पूर्वमें की थी, वैसी ही विविध प्रकारके जगत्की सृष्टि की। योगविद्यासे उन्होंने मरीचि, भृगु, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठको उत्पन्न किया। पुराणोंके अनुसार यह निश्चित है कि ये नौ ब्रह्माण कहलाते हैं। ये सभी ब्रह्माके समान हैं, साधक हैं और ब्रह्मवादी हैं॥ ८५–८७॥ |
| ६६ | * कूर्मपुराण * |
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| संकल्पं चैव धर्मं च युगधर्मांश्च शाश्वतान्।<br>स्थानाभिमानिनः सर्वान् यथा ते कथितं पुरा॥ ८८॥ | जैसा पहले बताया गया था तदनुसार संकल्प, धर्म, सनातन युगधर्म तथा सभी स्थानाभिमानी (देवताओं)- का वर्णन तुम्हें सुनाया गया॥ ८८॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे दशमोऽध्यायः॥ १०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १०॥
ग्यारहवाँ अध्याय
सती और पार्वतीका आविर्भाव, देवी-माहात्म्य, हैमवती-माहात्म्य, देवीका अष्टोत्तरसहस्रनामस्तोत्र, हिमवान्द्वारा देवीकी स्तुति एवं हिमवान्को देवीद्वारा उपदेश, देवीसहस्रनामस्तोत्र-जपका माहात्म्य
| श्रीकूर्म उवाच | |
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| एवं सृष्ट्वा मरीच्यादीन् देवदेवः पितामहः।<br>सहैव मानसैः पुत्रैस्तताप परमं तपः॥ १॥ | श्रीकूर्मने कहा—इस प्रकार मरीचि आदिकी सृष्टि करके देवोंके देव पितामह (ब्रह्मा अपने) मानस पुत्रोंके साथ परम तप करने लगे॥ १॥ |
| तस्यैवं तपतो वक्त्राद् रुद्रः कालाग्निसंनिभः।<br>त्रिशूलपाणिरीशानः प्रादुरासीत् त्रिलोचनः॥ २॥<br><br>अर्धनारीनरवपुः दुष्प्रेक्ष्योऽतिभयंकरः।<br>विभजात्मानमित्युक्त्वा ब्रह्मा चान्तर्दधे भयात्॥ ३॥ | इस प्रकार तप करते हुए उनके मुखसे कालाग्निके समान अति भयंकर, हाथमें त्रिशूल धारण किये, कठिनतासे देखे जाने योग्य, अर्धनारीश्वरका शरीर धारण किये हुए, त्रिलोचन ईशान रुद्र प्रकट हुए। 'अपना विभाग करो' ऐसा कहकर ब्रह्मा भयसे अन्तर्धान हो गये॥ २-३॥ |
| तथोक्तोऽसौ द्विधा स्त्रीत्वं पुरुषत्वमथाकरोत्।<br>बिभेद पुरुषत्वं च दशधा चैकधा पुनः॥ ४॥ | (ब्रह्माके द्वारा) ऐसा कहे जानेपर उन्होंने स्त्री तथा पुरुषरूपसे दो भाग कर दिये। पुनः पुरुषभागको दस और एक—इस प्रकार ग्यारह भागोंमें बाँट दिया। ये ग्यारह रुद्र त्रिभुवनेश्वर कहलाते हैं। ब्राह्मणो! कपाली-ईश आदि ये सभी एकादश रुद्र देवताओंके कार्यमें नियोजित हैं॥ ४-५॥ |
| एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः।<br>कपालीशादयो विप्रा देवकार्ये नियोजिताः॥ ५॥ | |
| सौम्यासौम्यैस्तथा शान्ताशान्तैः स्त्रीत्वं च स प्रभुः।<br>बिभेद बहुधा देवः स्वरूपैरसितैः सितैः॥ ६॥<br><br>ता वै विभूतयो विप्रा विश्रुताः शक्तयो भुवि।<br>लक्ष्मादयो याभिरीशा विश्वं व्याप्नोति शांकरी॥ ७॥ | उन प्रभु देवने सौम्य और रौद्र, शान्त और अशान्त तथा श्वेत और कृष्णरूपोंसे स्त्रीभागको भी अनेक रूपोंमें विभक्त किया। हे विप्रो! ये ही विभूतियाँ शक्तियोंके रूपमें लक्ष्मी आदि नामोंसे संसारमें विख्यात हैं। शंकरकी शक्ति ईशा इन्हींके द्वारा विश्वमें व्याप्त है॥ ६-७॥ |
| विभज्य पुनरीशानी स्वात्मानं शंकराद् विभोः।<br>महादेवनियोगेन पितामहमुपस्थिता॥ ८॥<br><br>तामाह भगवान् ब्रह्मा दक्षस्य दुहिता भव।<br>सापि तस्य नियोगेन प्रादुरासीत् प्रजापतेः॥ ९॥ | पुनः ईशानी (ईशा) अपनेको विभु शंकरसे विभक्तकर महादेवके निर्देशसे वे पितामहके पास गयीं। भगवान् ब्रह्माने इनसे कहा—'दक्षकी पुत्री बनो।' ये भी उनके आदेशसे दक्ष प्रजापतिके यहाँ उत्पन्न हुईं (इन्हींका नाम सती है)॥ ८-९॥ |
| * अध्याय ११ * | ६७ |
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| नियोगाद् ब्रह्मणो देवीं ददौ रुद्राय तां सतीम्।<br>दक्षाद् रुद्रोऽपि जग्राह स्वकीयामेव शूलभृत्॥ १०॥ | (दक्षने) ब्रह्माकी आज्ञासे इन सतीदेवीको रुद्रको प्रदान कर दिया। त्रिशूलधारी रुद्रने भी दक्षसे अपनी ही शक्तिको ग्रहण किया॥ १०॥ |
| प्रजापतिं विनिन्द्यैषा कालेन परमेश्वरी।<br>मेनायामभवत् पुत्री तदा हिमवतः सती॥ ११॥ | कालान्तरमें (यज्ञमें अपने आराध्य शिवका भाग न देखकर) दक्ष प्रजापतिकी निन्दा कर (तथा अपने शरीरका परित्याग कर) वे परमेश्वरी सती पुनः हिमवान्से मेनाकी पुत्री (पार्वती) बनीं। पर्वतश्रेष्ठ हिमवान्ने भी पार्वतीको |
| स चापि पर्वतवरो ददौ रुद्राय पार्वतीम्।<br>हिताय सर्वदेवानां त्रिलोकस्यात्मनोऽपि च॥ १२॥ | सभी देवताओं, तीनों लोकों तथा स्वयं अपने भी कल्याणके लिये रुद्रको समर्पित कर दिया॥ ११-१२॥ |
| सैषा माहेश्वरी देवी शंकरार्धशरीरिणी।<br>शिवा सती हैमवती सुरासुरनमस्कृता॥ १३॥ | ये ही शंकरके आधे शरीरमें स्थित रहनेवाली माहेश्वरी देवी शिवा, सती तथा हैमवतीके रूपमें देवताओं एवं असुरोंद्वारा पूजित हैं। इन्द्रसहित सभी |
| तस्याः प्रभावमतुलं सर्वे देवाः सवासवाः।<br>विदन्ति मुनयो वेत्ति शंकरो वा स्वयं हरिः॥ १४॥ | देवता, मुनि, शंकर अथवा स्वयं हरि इनके अतुल प्रभावको जानते हैं॥ १३-१४॥ |
| एतद् वः कथितं विप्राः पुत्रत्वं परमेष्ठिनः।<br>ब्रह्मणः पद्मयोनित्वं शंकरस्यामितौजसः॥ १५॥ | हे विप्रो! इस प्रकार मैंने आप लोगोंसे अमित तेजस्वी शंकरके पुत्रत्व (पुत्र होनेका) और परमेष्ठी ब्रह्माके पद्मयोनित्व (पद्मयोनि होने)-का वर्णन किया॥ १५॥ |
| सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्याथ मुनयः कूर्मरूपेण भाषितम्।<br>विष्णुना पुनरेवैनं पप्रच्छुः प्रणता हरिम्॥ १६॥ | सूत बोले— कूर्मरूप धारण किये हुए विष्णुके इस कथनको सुनकर मुनियोंने पुनः हरि (कूर्मरूपधारी विष्णु)-को प्रणाम करते हुए उनसे इस प्रकार पूछा—॥ १६॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>कैषा भगवती देवी शंकरार्धशरीरिणी।<br>शिवा सती हैमवती यथावद् ब्रूहि पृच्छताम्॥ १७॥ | ऋषियोंने कहा— (भगवन्!) शंकरके आधे शरीररूपसे प्रतिष्ठित शिवा, सती तथा हैमवती (इत्यादि नामवाली) ये देवी भगवती कौन हैं? हम सभी पूछनेवालोंको आप यथार्थरूपमें बतलायें। उन मुनियोंके इस वचनको |
| तेषां तद् वचनं श्रुत्वा मुनीनां पुरुषोत्तमः।<br>प्रत्युवाच महायोगी ध्यात्वा स्वं परमं पदम्॥ १८॥ | सुनकर पुरुषोंमें उत्तम महायोगी (विष्णु)-ने अपने परम पदका ध्यान करके उन्हें बताया—॥ १७-१८॥ |
| श्रीकूर्म उवाच<br>पुरा पितामहेनोक्तं मेरुपृष्ठे सुशोभनम्।<br>रहस्यमेतद् विज्ञानं गोपनीयं विशेषतः॥ १९॥ | श्रीकूर्म बोले— प्राचीन कालमें अत्यन्त रमणीय मेरु गिरिके पृष्ठपर (बैठकर) पितामह (ब्रह्मा)-ने यह रहस्यपूर्ण ज्ञान कहा था। यह विशेषरूपसे गोपनीय है। सांख्यशास्त्रके तत्त्वज्ञोंके लिये यह परम सांख्य (तत्त्वज्ञान) |
| सांख्यानां परमं सांख्यं ब्रह्मविज्ञानमुत्तमम्।<br>संसारार्णवमग्नानां जन्तूनामेकमोचनम्॥ २०॥ | एवं उत्तम ब्रह्मज्ञान है। यह संसार-सागरमें निमग्न प्राणियोंकी मुक्तिका एकमात्र साधन है॥ १९-२०॥ |
| या सा माहेश्वरी शक्तिर्ज्ञानरूपातिलालसा।<br>व्योमसंज्ञा परा काष्ठा सेयं हैमवती मता॥ २१॥ | (महेश्वरकी) जो ज्ञानरूप, उत्कृष्ट इच्छारूप, व्योम नामवाली तथा पराकाष्ठारूप (अन्तिम प्राप्तव्य) वह माहेश्वरी शक्ति है, ये वही हैमवती कही जाती हैं। |
| शिवा सर्वगतानन्ता गुणातीता सुनिष्कला।<br>एकानेकविभागस्था ज्ञानरूपातिलालसा॥ २२॥ | (ये हैमवती शक्ति) कल्याण करनेवाली, सर्वत्र व्याप्त, अनन्त, गुणातीत, नितान्त भेदशून्य, अद्वितीय तथा अनेक रूपोंमें स्थित रहनेवाली, ज्ञानरूप, परम इच्छारूप। |
६८ * कूर्मपुराण *
अनन्या निष्कले तत्त्वे संस्थिता तस्य तेजसा।
स्वाभाविकी च तन्मूला प्रभा भानोरिवामला॥ २३॥
एका माहेश्वरी शक्तिरनेकोपाधियोगतः।
परावरेण रूपेण क्रीडते तस्य संनिधौ॥ २४॥
सेयं करोति सकलं तस्याः कार्यमिदं जगत्।
न कार्यं नापि करणमीश्वरस्येति सूरयः॥ २५॥
चतस्रः शक्तयो देव्याः स्वरूपत्वेन संस्थिताः।
अधिष्ठानवशात् तस्याः शृणुध्वं मुनिपुंगवाः॥ २६॥
शान्तिर्विद्या प्रतिष्ठा च निवृत्तिश्चेति ताः स्मृताः।
चतुर्व्यूहस्ततो देवः प्रोच्यते परमेश्वरः॥ २७॥
अनया परया देवः स्वात्मानन्दं समश्नुते।
चतुर्ष्वपि च वेदेषु चतुर्मूर्तिर्महेश्वरः॥ २८॥
अस्यास्त्वनादिसंसिद्धमैश्वर्यमतुलं महत्।
तत्सम्बन्धादनन्ताया रुद्रेण परमात्मना॥ २९॥
सैषा सर्वेश्वरी देवी सर्वभूतप्रवर्तिका।
प्रोच्यते भगवान् कालो हरिः प्राणो महेश्वरः॥ ३०॥
तत्र सर्वमिदं प्रोतमोतं चैवाखिलं जगत्।
स कालोऽग्निर्हरो रुद्रो गीयते वेदवादिभिः॥ ३१॥
कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः।
सर्वे कालस्य वशगा न कालः कस्यचिद् वशे॥ ३२॥
प्रधानं पुरुषस्तत्त्वं महानात्मा त्वहंकृतिः।
कालेनान्यानि तत्त्वानि समाविष्टानि योगिना॥ ३३॥
तस्य सर्वजगत्सूतिः शक्तिर्मायेति विश्रुता।
तयेदं भ्रामयेदीशो मायावी पुरुषोत्तमः॥ ३४॥
सैषा मायात्मिका शक्तिः सर्वाकारा सनातनी।
वैश्वरूप्यं महेशस्य सर्वदा सम्प्रकाशयेत्॥ ३५॥
अनन्य तथा उन (शिव)-के तेजसे निष्कल तत्त्वमें प्रतिष्ठित रहनेवाली, सूर्यकी प्रभाके सदृश स्वच्छ तथा उनके आश्रित एवं स्वभावतः प्रवृत्त होनेवाली हैं। वह एक ही माहेश्वरी शक्ति अनेक उपाधियों (नाम-रूपों)-के संयोगसे उत्तम तथा निम्न रूपसे उन (शिव)-के समीप क्रीडा करती रहती हैं। वे ही यह सम्पूर्ण (सृष्टि इत्यादिका) कार्य करती हैं। यह जगत् उन्हींका कार्य है। ईश्वरका न कोई कार्य है और न कोई करण (साधन) ही होता है—ऐसा विद्वानोंका मत है॥ २१-२५॥
हे श्रेष्ठ मुनियो! उन देवीकी अधिष्ठान (आश्रय)-भेदसे अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित चार शक्तियाँ हैं, उन्हें आप सुनें॥ २६॥
उन शक्तियोंको शान्ति, विद्या, प्रतिष्ठा तथा निवृत्ति—इस प्रकारसे कहा गया है और इसीलिये (अर्थात् इन चारों शक्तियोंसे सम्पन्न होनेके कारण) परमेश्वर देवको भी चतुर्व्यूहात्मक¹ कहा जाता है। इस पराशक्तिके द्वारा देव (महेश्वर) स्वात्मानन्दका उपभोग करते हैं। चारों ही वेदोंमें चतुर्मूर्ति महेश्वर वर्णित हैं॥ २७-२८॥
उन रुद्र परमात्माके सम्बन्धसे इस अनन्ता (शक्ति)-का महान् अतुलनीय ऐश्वर्य सिद्ध है। वे ही ये सर्वेश्वरी देवी सभी प्राणियोंको प्रवर्तित करती हैं। भगवान् काल, हरि, प्राण तथा महेश्वर कहे जाते हैं॥ २९-३०॥
उनमें ही यह सम्पूर्ण जगत् ओतप्रोत है। वेदवादियों (वैदिकों)-के द्वारा वे ही काल, अग्नि, हर तथा रुद्र-रूपमें गाये जाते हैं। काल सभी प्राणियोंकी सृष्टि करता है, काल ही प्रजाओंका संहार करता है। सभी कालके वशीभूत हैं और काल किसीके वशमें नहीं है। (वह काल ही) प्रधान, पुरुष, तत्त्व, महान्, आत्मा तथा अहंकार है। योगी² कालमें ही अन्य सभी तत्त्व समाविष्ट हैं॥ ३१-३३॥
सम्पूर्ण जगत्को उनकी (ईशकी) संतान और उनकी शक्तिको माया कहा गया है। मायावी पुरुषोत्तम ईश उस (माया)-के द्वारा ही इस (जगत्)-को भ्रमित (मोहित) करते हैं। वही यह सर्वाकारा, सनातनी मायात्मिका शक्ति महेशके विश्वरूपत्वको सदा प्रकाशित करती रहती है॥ ३४-३५॥
१-व्यूहका अर्थ शक्ति है।
२-कालमें सभी प्रकारका सामर्थ्य है, इसलिये कालको योगी कहा गया है।