भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 101

८६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् नोट- 'अदस्' शब्द से 'औ' विभक्ति लाने पर मकार को अकारादेश, पररूप तथा वृद्धि एकादेश हो कर - 'अदौ' हुआ। अब अदसोऽसेर्दादु दो म (८.२.८०) से दकार को मकार तथा औकार को ऊकार करने से अमू' सिद्ध होता है। यद्यपि 'अमू' मे ऊदन्त द्विवचन होने के कारण पूर्व-सूत्र से प्रगृह्यसञ्ज्ञा सिद्ध हो सकती थी, तथापि अदसोऽसेर्दादु दो म (८ २ ८०) से किये मत्व और ऊत्व के असिद्ध होने से उस की दृष्टि में 'अदौ' रहता था, अत यह सूत्र बनाया गया है। इस की दृष्टि में तो आरम्भ- सामर्थ्य से ही असिद्ध नही होता, यह पहले कह चुके हैं। मात् किम्? अब यहा यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि सूत्र मे 'मात्' अर्थात् 'म्' से परे' ऐसा क्यो कहा गया है ? क्योकि मकार के अतिरिक्त अन्य किसी वर्ण से परे ईत् व ऊत् अदस् के तीनों लिङ्गों के रूपो मे कही नही पाए जाते, अत 'मात्' ग्रहण न करने से भी 'अमू, अमी' शब्दो की ही प्रगृह्यसञ्ज्ञा होगी। इस का उत्तर है- अमुकेऽत्र । अर्थात् 'मात्' का ग्रहण न करने से 'अमुकेऽत्र' प्रयोग मे दोष आयेगा । तथाहि-- 'अदस्' शब्द से परे अव्यय-सर्वनाम्नामकच् प्राक्टे. (१२२६) सूत्र द्वारा 'अकच्' प्रत्यय हो कर 'अदकम्' बनने पर अदसोऽसेर्दादु दो म (३५६) से मुत्व हो- 'अमुकम्' शब्द निष्पन्न होता है। अब इस में प्रथमा या बहुवचन 'जस्' प्रत्यय लाने पर त्यदाद्यत्व, पररूप, जस शी (१५२) से शी आदेश तथा आद् गुण (२७) से गुण एकादेश हो कर 'अमुके' प्रयोग सिद्ध होता है। अब इस के आगे 'अत्र' पद लाने

पर 'अमू' प्रयोग सिद्ध होता है। यहा पूर्व-सूत्र (५१) की दृष्टि म 'अदे' होने मे एदन्त द्विवचन है, अत इस की उस सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो सकती है। इस के लिये इस सूत्र (५२) के बनाने की कोई आवश्यकता नही। इसी प्रकार नपुंसक- लिङ्ग में 'औ' आने पर त्यदाद्यत्व, पररूप, नपुंसकाच्च (२३५) से शी आदेश तथा आद् गुण' (२७) से गुण हो कर 'अदे' हुआ। पुन अदसोऽसेर्दादु दो म (३५६) से मत्व और ऊत्व करने पर 'अमू' प्रयोग सिद्ध होता है। यहाँ पर भी पूर्व-सूत्र की दृष्टि में 'अदे' होने से एदन्त द्विवचन है, अत प्रगृह्य-सञ्ज्ञा सिद्ध है। इस के लिये भी इस सूत्र के रचने की कोई आवश्यकता नही। इस से सिद्ध होता है कि-केवल पुल्लिङ्ग के 'अमू, अमी' शब्दो के लिये ही यह सूत्र बनाया गया है। ['बाले अमू आसाते' इत्यादिस्त्रीलिङ्गप्रयोगे 'कुले अमू उत्प्रेष्टे' इत्या- दिक्लीबप्रयोगे च ईदूदेद्० (५१) इत्यनेनैव प्रगृह्यता। न च 'रामकृष्णावमू आसाते' इत्यादिपुल्लिङ्गप्रयोगवद् अत्राप्यारम्भसामर्थ्याद् अदसो मात् (५२) इत्यनेनैव प्रगृह्यता किन्न स्यात् ? इति वाच्यम्; यत पुसि 'अमू आसाते' इत्यत्र तु पूर्वेण प्रगृह्यता न सम्भवतीति युक्तम् अदसो मात् (५२) इतिसूत्रे आरम्भ- सामर्थ्यम्, परतस्त्वत्र स्त्रिया क्लीवे तु पूर्वेण सिद्धाया प्रगृह्यसञ्ज्ञाया नास्त्यारम्भ- सामर्थ्यम्, अत स्त्रिया क्लीवे च ईदूदेद्० (५१) इत्यनेनैव प्रगृह्यता, पुसि अदसो मात् (५२) इत्यनेनैवेति शम् ] ।