लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअच्-सन्धि-प्रकरणम् ८५ द्विवचन में ही उपलब्ध होते हैं¹। इन में से स्त्रीलिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग वाले इस सूत्र के उदाहरण नहीं होते, क्योंकि वहां पूर्वले ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् (५१) सूत्र से ही प्रगृह्य-सञ्ज्ञा सिद्ध हो जाती है। केवल पुल्ँलिङ्ग के 'अमू, अमी' इन दो रूपों के लिये ही यह सूत्र बनाया गया है। उदाहरण यथा— अमी ईशाः (ये स्वामी हैं)। यहां पुल्ँलिङ्ग में 'अदस्' शब्द से प्रथमा का बहुवचन 'जस्' करने पर त्यदाद्यत्व, पररूप, जस् को शी आदेश तथा गुण हो कर 'अदे' बन जाता है। अब एत ईद् बहुवचने (८.२.८१) सूत्र से 'ए' को 'ई' तथा दकार को मकार करने से 'अमी' प्रयोग सिद्ध होता है। इस के आगे 'ईशाः' पद लाने से अकः सवर्णे दीर्घः (४२) द्वारा सवर्ण-दीर्घ प्राप्त होता है जो अब इस सूत्र से प्रगृह्य- सञ्ज्ञा होने से प्रकृतिभाव के कारण नहीं होता। नोट—यहां ईदूदेद्० (१.१.११) की दृष्टि में 'अमी' के स्थान पर 'अदे' है क्योंकि एत ईद् बहुवचने (८.२.८१) सूत्र त्रिपादीस्थ होने से उस की दृष्टि में असिद्ध है। 'अदे' एदन्त तो है परन्तु द्विवचन नहीं, बहुवचन है; अतः पूर्व-सूत्र प्रवृत्त नहीं हो सकता, इसलिये यह सूत्र बनाना पड़ा। यदि इस सूत्र (१.१.१२) की दृष्टि में भी एत ईद् बहुवचने (८.२.८१) सूत्र असिद्ध होने से 'अमी' के स्थान पर 'अदे' माना जाए तो यह सूत्र व्यर्थ हो जायेगा; क्योंकि तब इसे अदस् के मकार से परे ईत् ऊत् कहीं नहीं मिल सकेगा [अदस् शब्द में मकार का आना तथा उस से आगे ईत्, ऊत् का होना एत ईद् बहुवचने (३५७) तथा अदसोऽसेर्दादु दो मः (३५६) सूत्रों की ही कृपा का फल है जो दोनों असिद्ध हैं]। अतः इस की दृष्टि में 'अमी' असिद्ध नहीं होता; मकार से परे ईकार की प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो जाती है। द्वितीय उदाहरण यथा—राम-कृष्णावमू आसाते (वे दोनों बलराम और कृष्ण बैठे हैं)। यहां 'रामकृष्णौ+अमू' में एचोऽयवायावः (२२) से अव् आदेश हो जाता है। 'रामकृष्णौ' पद इस बात को जतलाने के लिये लिखा गया है कि 'अमू' पुल्ँलिङ्ग का है, स्त्रीलिङ्ग या नपुंसकलिङ्ग का नहीं। स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग का 'अमू' इस सूत्र का उदाहरण नहीं होता²। 'अमू+आसाते' यहां 'अमू' की प्रगृह्यसञ्ज्ञा होने से प्रकृतिभाव के कारण इको यणचि (१५) से यण् नहीं होता। १. यद्यपि अदस् शब्द के मकार से परे 'अमीभ्यः, अमूभ्यः, अमीषाम्' इत्यादियों में भी ईत्, ऊत् पाये जाते हैं; तथापि यहां इन का कुछ उपयोग नहीं। क्योंकि प्रगृह्य- संज्ञा स्वरसन्धि के निषेध के लिये ही करनी होती है। इन में 'भ्यः, भ्याम्' आदियों का व्यवधान पड़ने से स्वरसन्धि प्राप्त ही नहीं होती। अतः इस सूत्र के उपयोगी 'अमू' और 'अमी' ये दो ही शब्द हैं। २. स्त्रीलिङ्ग में 'अदस्' शब्द से परे प्रथमा या द्वितीया का द्विवचन 'औ' आने पर अत्व, पररूप, टाप्, औङ आपः (२१६) से शी तथा आद् गुणः (२७) से गुण हो कर 'अदे' हुआ। पुनः अदसोऽसेर्दादु दो मः (३५६) से मत्व और ऊत्व करने