लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'गङ्गे अमू' (ये दो गङ्गाएं हैं) यहां गकारोत्तर एकार एदन्त द्विवचन है¹। इस की इस सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो जाती है । प्रगृह्या-सञ्ज्ञा होने से प्लुत-प्रगृह्या अचि नित्यम् (५०) सूत्र द्वारा प्रकृतिभाव हो जाता है । अतः यहां एङः पदान्तादति (४३) सूत्र से पूर्वरूप एकादेश नहीं होता । नोट—यहां कई विद्यार्थी 'हरी', 'विष्णू', 'गङ्गे' आदि पदों को ही ईद्वन्त, ऊदन्त तथा एदन्त द्विवचन माना करते हैं, यह उन की भूल हुआ करती है । इस भूल से सावधान रहना चाहिये । यहां ईकार, ऊकार तथा एकार ही ईद्वन्त, ऊदन्त तथा एदन्त द्विवचन हैं । प्रक्रिया ऊपर लिख दी है, आगे सुबन्तों में स्पष्ट हो जायेगी । [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(५२) अदसो मात् ।१।१।१२॥ अस्मात् परावीदूतो प्रगृह्यौ स्तः । अमी ईशाः । रामकृष्णवामू आसाते । मात् किम् ? अमुकेऽत्र ॥ अर्थः—अदस् शब्द के मकार से परे ईत् और ऊत् प्रगृह्य-सञ्ज्ञक हों । व्याख्या—अदसः ६।१। [अवयव-षष्ठी] । मात् ।५।१। [दिग्योगे पञ्चमी] । ईदूत् ।१।१। प्रगृह्यम् ।१।१। (ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् से) । अर्थ - (अदसः) अदस् शब्द के अवयव (मात्) मकार से परे (ईदूत्) ईत् और ऊत् (प्रगृह्यम्) प्रगृह्य- सञ्ज्ञक होते हैं । 'अदस्' शब्द सर्वनाम है । इसका प्रयोग दूरस्थ पदार्थ के निर्देश में होता है । यथा—असौ बालः (वह बालक है) । इस की तीनों लिङ्गों में रूपमाला यथा— (पुल्लिङ्ग में) प्र०—असौ, अमू, अमी । द्वि०—अमुम्, अमू, अमून् । तृ०— अमुना, अमूभ्याम्, अमीभिः । च०—अमुष्मै, अमूभ्याम्, अमीभ्यः । प०—अमुष्मात्, अमूभ्याम्, अमीभ्यः । ष०—अमुष्य, अमुयोः, अमीषाम् । स०—अमुष्मिन्, अमुयोः, अमीषु । (स्त्रीलिङ्ग में) प्र०—असौ, अमू, अमूः । द्वि०—अमूम्, अमू, अमूः । तृ०— अमुया, अमूभ्याम्, अमूभिः । च०—अमुष्यै, अमूभ्याम्, अमूभ्यः । प०—अमुष्याः, अमूभ्याम्, अमूभ्यः । ष०—अमुष्याः, अमुयोः, अमूषाम् । स०-अमुष्याम्, अमुयोः, अमूषु । (नपुंसक में) प्र०—अदः, अमू, अमूनि । द्वि०—अदः, अमू अमूनि । आगे पुंवत् । अदस् शब्द के मकार से परे ईत् और ऊत् पुल्लिङ्ग में प्रथमा के बहुवचन तथा प्रथमा द्वितीया के द्विवचन में और स्त्रीलिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग में प्रथमा द्वितीया के १ गङ्गा शब्द से प्रथमा या द्वितीया का द्विवचन 'औ' आने पर औङ आपः (२१६) से उसे शी = ई आदेश हो कर आद् गुणः (२७) से गुण हो जाता है । यहां 'ए' यह एकादेश परादिवद्भाव से द्विवचन तथा व्यपदेशिवद्भाव से एदन्त है ।