लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअच्-सन्धि-प्रकरणम् ८३ अत्र गौश्चरति' (आओ कृष्ण ! यहां गौ चर रही है)। यहां 'आगच्छ कृष्ण' यह एक वाक्य है। इस की टि = णकारोत्तर अकार को दूराद् धूते च (४६) से वैकल्पिक प्लुत होता है। जिस पक्ष में प्लुत होता है वहां प्रकृतिभाव हो जाने से णकारोत्तर प्लुत अकार तथा 'अत्र' शब्द के आदि अकार के स्थान पर अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ नहीं होता; वैसे का वैसा अर्थात् 'आगच्छ कृष्ण ३ ! अत्र गौश्चरति' ही रहता है। जिस पक्ष में प्लुत नहीं होता वहां प्रकृतिभाव न होने से सवर्णदीर्घ हो जाता है—आगच्छ कृष्णात्र गौश्चरति । इस के अन्य उदाहरण यथा— प्रकृतिभावपक्षे प्रकृतिभावाद्भावे (१) आगच्छ हरे ३ ! अत्र क्रीडेम । (१) आगच्छ हरेऽत्र क्रीडेम । (२) कार्यं कुरु राम ३ ! एष आगतः । (२) कार्यं कुरु रामैष आगतः । (३) आगच्छ राम ३ ! अत्रास्ति सीता । (३) आगच्छ रामात्रास्ति सीता । (४) सक्तून् पिव भीम ३ ! अहं गच्छामि । (४) सक्तून् पिव भीमाहं गच्छामि । इस सूत्र में 'नित्यम्' पद के ग्रहण का प्रयोजन इकोऽसवर्णै० (५६) पर देखें । अब प्रगृह्य के उदाहरणों के लिये प्रगृह्य-सञ्ज्ञा करने वाले सूत्र लिखते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्--(५१) ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् ।१।१।११॥ ईदूदेदन्तं द्विवचनं प्रगृह्यं स्यात्। हरी एतौ। विष्णू इमौ। गङ्गे अमू॥ अर्थः—ईदन्त उदन्त तथा एदन्त द्विवचन प्रगृह्य-सञ्ज्ञक हों । व्याख्या—ईदूदेत् ।१।१। द्विवचनम् ।१।१। प्रगृह्यम् ।१।१। समासः—ईच्च ऊच्च एच्च = ईदूदेत्, समाहारद्वन्द्वः । तपरकरणमसन्देहार्थम् । 'ईदूदेत्' यह पद 'द्वि- वचनम्' पद का विशेषण है; अतः येन विधिस्तदन्तस्य द्वारा इस से तदन्त-विधि हो जाती है। अर्थः—(ईदूदेत्) ईदन्त, उदन्त तथा एदन्त (द्विवचनम्) द्विवचन (प्रगृह्यम्) प्रगृह्यसञ्ज्ञक हों । उदाहरण यथा— 'हरी एतौ' (ये दो हरि अर्थात् घोडे वा बन्दर हैं) यहां रेफोत्तर ईकार ईदन्त द्विवचन है¹ । इस की इस सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होती है। प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होने से प्लुत- प्रगृह्या अचि नित्यम् (५०) सूत्र द्वारा प्रकृतिभाव हो जाता है; अतः एकार=अच् परे होने पर भी इको यणचि (१५) से ईकार को यण् नहीं होता । 'विष्णू इमौ' (ये दो विष्णु हैं) यहां णकारोत्तर ऊकार उदन्त द्विवचन है; इस की इस सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होती है । प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होने से प्लुत-प्रगृह्या अचि नित्यम् (५०) सूत्र द्वारा प्रकृतिभाव हो जाता है । अतः अच् परे होने पर भी इको यणचि (१५) से ऊकार को यण् नहीं होता । १. हरि शब्द से प्रथमा या द्वितीया का द्विवचन 'औ' आने पर प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से रेफोत्तर इकार तथा औ के स्थान पर पूर्व-सवर्ण-दीर्घ ईकार हो कर 'हरी' सिद्ध होता है। यहां 'ई' यह एकादेश परादिवद्भाव (अन्तादिवच्च) से द्वि- वचन तथा व्यपदेशिवद्भाव से ईदन्त है। इसी प्रकार 'विष्णू' में 'ऊ' को जानें ।