भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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८२ भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

प्लुत १।१।२। (वाक्यस्य टे प्लुत उदात्त यह अधिकार आ रहा है)। वा इत्यव्ययपदम्। [भाष्यकार ने सम्पूर्ण प्लुत के प्रकरण को विकल्प कर दिया है, अत यहाँ पर 'वा' प्राप्त हो जाता है]। ह्वेञ् स्पर्धायां शब्दे च (भ्वा० उ०) धातु से भाव में 'क्त' प्रत्यय करने पर 'हूत' शब्द सिद्ध होता है। इस का अर्थ 'बुलाना' है। परन्तु यहाँ इस से 'सम्बोधन = अच्छी तरह से जनाना' अर्थ अभिप्रेत है। अर्थ — (दूरात्) दूर से (हूते) सम्यग्बोध कराने में प्रयुक्त (वाक्यस्य) जो वाक्य उस की (टे) टि के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (प्लुत) प्लुत हो जाता है। जिस देश में ठहरे हुए का वाक्य सम्बोध्यमान [सम्यक् जनाया जाता हुआ] साधारण प्रयत्न से न सुन सके किन्तु विशेष प्रयत्न से सुन सकता हो उस देश को 'दूर' कहते हैं। उस दूर देश से किसी को कुछ जनाने या बुलाने के लिये जो वाक्य प्रयुक्त किया जाता है उस की टि को विकल्प कर के प्लुत होता है। उदाहरण यथा—हम से देवदत्त ऐसे स्थान पर ठहरा हुआ है जहा हम उस साधारण प्रयत्न से बोल कर कुछ बोध नहीं करा सकते, तो अब हमारा स्थान 'दूर' हुआ। इस दूर स्थान से हम ने जो 'एहि देवदत्त !' 'सक्तून् पिब देवदत्त !' इत्यादि वाक्य प्रयुक्त किये उन वाक्यो की टि को विकल्प कर के प्लुत होगा। (प्लुत-पक्ष मे) (प्लुताभाव-पक्ष मे) (१) एहि देवदत्त ३ ! (१) एहि देवदत्त ! (२) सक्तून् पिब देवदत्त ३ ! (२) सक्तून् पिब देवदत्त ! यहा यह ध्यान म रखना चाहिये कि जिस वाक्य मे हूयमान (सम्यग् जनाया जाता हुआ) अन्त म होगा उसी वाक्य की टि को प्लुत होगा, जहा हूयमान अन्त मे न होगा उस वाक्य की टि को प्लुत न होगा। यथा—'देवदत्त ! एहि', 'देवदत्त ! सक्तून् पिब' यहा हूयमान = देवदत्त अन्त मे नही है, अत वाक्य की टि को प्लुत न होगा। किञ्च वाक्य की टि को होने वाला यह प्लुत हलन्त टि के अच् के स्थान पर ही होता है क्योकि प्लुत अचों का ही धर्म माना गया है। यथा—सक्तून् पिब यक्ष- वर्मन्३ । यहा 'अन्' टि के अकार को ही प्लुत हुआ है। इस प्रकार प्लुत का विधान कर अब उस का यहा उपयोग दिखाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(५०) प्लुत-प्रगृह्या अचि नित्यम्। ६।१।१२५॥ एतेऽचि प्रकृत्या स्युः । आगच्छ कृष्ण ३ अत्र गौश्चरति ॥ अर्थ —प्लुत और प्रगृह्य-सञ्ज्ञक अच् परे होने पर प्रकृति से रहते हैं। व्याख्या—प्लुत प्रगृह्या १।२। अचि ७।१। नित्यम् १।२। (क्रियाविशेषण- मेतत्) । प्रकृत्या ३।१। (प्रकृत्यान्तःपादम् स) । समास —प्लुताश्च प्रगृह्याश्च = प्लुत-प्रगृह्या, इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ —(प्लुत प्रगृह्या ) प्लुत और प्रगृह्य-सञ्ज्ञक (अचि) अच् परे होने पर (नित्यम्) नित्य (प्रकृत्या) प्रकृति से = स्वभाव से = वैसे के वैसे अर्थात् सन्धि-कार्य से रहित रहते हैं। उदाहरण यथा—'आगच्छ कृष्ण ३