भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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अच्-सन्धि-प्रकरणम् ८१ वकारोत्तर अकार अनुनासिक नहीं, अतः उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र से उस की इत्सञ्ज्ञा नहीं होती। यदि इस की भी इत्सञ्ज्ञा हो जाती तो लोप हो जाने से 'गवाग्रम्, गवाधिपः' आदि में सवर्णदीर्घ तथा 'गवेश्वरः, गवद्धिः' आदि में गुण न हो सकता । इस में प्रमाण है आचार्य पाणिनि का सूत्र—गवाश्वप्रभृतीनि च (२.४.११)। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(४८) इन्द्रे च ।६।१।१२०॥ गोरवङ् स्याद् इन्द्रे । गवेन्द्रः ॥ अर्थः—इन्द्र शब्द परे होने पर (एडन्त) गो शब्द को अवङ् आदेश हो । व्याख्या—एङः ।६।१। (एङः पदान्तादति से विभक्ति-विपरिणाम द्वारा । यह 'गोः' पद का विशेषण है अतः इस मे तदन्तविधि हो कर 'एडन्तस्य' बन जाता है) । गोः ।६।१। (सर्वत्र विभाषा गोः से) । इन्द्रे ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । अवङ् ।१।१। (अवङ् स्फोटायनस्य मे) । अर्थः—(एङः) एडन्त (गोः) गो शब्द के स्थान पर (अवङ्) अवङ् आदेश हो जाता है (इन्द्रे) इन्द्र शब्द परे होने पर । यह सूत्र अवङ् स्फोटायनस्य (४७) सूत्र का अपवाद है । उस से यहां विकल्प कर के अवङ् प्राप्त था; इस सूत्र से नित्य हो जाता है । उदाहरण यथा— गवेन्द्रः (श्रेष्ठ वा बड़ा बैल) । गो + इन्द्र (गवां गोपु वा इन्द्रः = श्रेष्ठः) = ग् अवङ् + इन्द्र = गव + इन्द्र = गवेन्द्रः [आद् गुणः (२७)]। 'एडन्त' इस लिये कहा है कि चित्रगु + इन्द्र (चित्रगूनामिन्द्रः = स्वामी, षष्ठी- तत्पुरुषः) = चित्रग्विन्द्रः । यहां एडन्त न होने से अवङ् आदेश न हो कर इको यणचि (१५) से यण् = वकार हो जाता है। ध्यान रहे कि सूत्र की वृत्ति में 'एडन्त' कहना ग्रन्थकार से छूट गया है। यहां 'पदान्त' की अनुवृत्ति लाने की कोई आवश्यकता नहीं; क्योंकि अपदान्त में एडन्त गो से परे इन्द्र शब्द कभी आ ही नहीं सकता । नोट—काशिकाकार जयादित्य ने इस सूत्र से अगले प्लुत-प्रगृह्या अचि नित्यम् (६.१.१२१) सूत्र में 'नित्यम्' पद का ग्रहण नहीं किया, किन्तु इसी इन्द्रे च (६.१.१२०) सूत्र में ही 'नित्यम्' पद का ग्रहण किया है । पर ऐसा मानना ठीक प्रतीत नहीं होता; क्योंकि यहां 'नित्यम्' पद के ग्रहण की कोई आवश्यकता नहीं । यदि यह कहा जाये कि—यहां 'नित्यम्' पद ग्रहण न करने से इन्द्रे च (४८) सूत्र विकल्प से अवङ् करता, क्योंकि सर्वत्र विभाषा गोः (४४) से 'विभाषा' पद की अनु- वृत्ति आ रही है—तो यह ठीक नहीं; क्योंकि इन्द्रे च (४८) सूत्र तो आरम्भ-सामर्थ्य से ही नित्य हो जायेगा, उस के लिये 'नित्यम्' पद के ग्रहण की कोई आवश्यकता नहीं । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(४६) दूराद् धूते च ।८।२।८४॥ दूरात् सम्बोधने वाक्यस्य टेः प्लुतो वा स्यात् ॥ अर्थः—दूर से सम्यग्बोध कराने में प्रयुक्त जो वाक्य उस की टि को विकल्प कर के प्लुत हो जाता है । व्याख्या—दूरात् ।५।१। हूते ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । वाक्यस्य ।६।१। टेः ।६।१। ल० प्र० (६)