लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् के मत का उल्लेख किया है । यह 'अवङ्' आदेश स्फोटायन आचार्य के मत में होता है, अन्य आचार्यों के मत में नहीं होता । हमें सब आचार्य प्रमाण हैं, अतः अवङ् आदेश विकल्प से होगा¹ । उदाहरण यथा— 'गो + अग्र' यहां समास में षष्ठी के बहुवचन 'आम्' का लुक् हुआ है; अतः प्रत्यय-लोपे प्रत्यय-लक्षणम् (१६०) द्वारा सुप्तिङन्तं पदम् (१४) से 'गो' की पद- सञ्ज्ञा है । इस के अन्त में पदान्त एङ् = ओ वर्त्तमान है । इस से परे 'अग्र' शब्द का आदि अकार अच् भी वर्त्तमान है । अतः इस सूत्र से 'गो' को अवङ् आदेश प्राप्त होता है । अलोऽन्त्यस्य (२१) से इस आदेश की अन्त्य अल् = ओकार के स्थान पर प्राप्ति होती है, परन्तु अनेक अलों वाला होने के कारण अनेकाल् शित् सर्वस्य (४५) द्वारा सम्पूर्ण 'गो' के स्थान पर प्राप्त होता है । पुनः ङिच्च (४६) सूत्र की सहायता से अन्त्य अल् 'ओ' को अवङ् आदेश हो कर —'ग् अवङ् + अग्र' हो जाता है । अब ङकार की हलन्त्यम् (१) से इत्सञ्ज्ञा और तस्य लोपः (३) से लोप हो अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्ण दीर्घ एकादेश करने पर—'गवाग्र' बना । अब विभक्ति लाने से— 'गवाग्रम्' प्रयोग सिद्ध होता है । जिस पक्ष में अवङ् आदेश नहीं होता वहां एङः पदान्तादति (४३) से पूर्व रूप हो कर 'गोऽग्रम्' प्रयोग बन जाता है । इस प्रकार प्रकृतिभाव वाले रूप सहित कुल तीन रूप हो जाते हैं । प्रकृतिभाव के पक्ष में— (१) गोअग्रम् । [सर्वत्र विभाषा गोः] । प्रकृतिभाव के अभाव में— { (२) गवाग्रम् । [अवङ् स्फोटायनस्य] । { (३) गोऽग्रम् । [एङः पदान्तादति] । यहां पदान्त ग्रहण इस लिये किया है कि अपदान्त एङन्त 'गो' को अवङ् न हो । यथा—गो + ङि = गवि । यहां गो-शब्द से परे सप्तमी का एकवचन 'ङि' प्रत्यय किया गया है, अतः यहां गो शब्द पदान्त नहीं । इस लिये अवङ् आदेश न हो कर एचोऽयवायावः (२२) से अव् आदेश हो जाता है । इस सूत्र के अन्य उदाहरण यथा— १ गवेश, गधीश । २ गवेश्वर, गवीश्वर । ३ गोऽधिप, गवाधिप, गोडधिप । ४ गवेच्छा, गविच्छा । ५ गवोदय, गवूदय । ६ गर्वाद्ध, गवूद्धि । ७ गवोढ, गवूढ । ८ गवानृतम् । ६ गवाक्ष । १० गवादनी । ध्यान रहे कि अवङ् आदेश में केवल ङकार की ही इत्सञ्ज्ञा होती है । १ वैयाकरण इस विभाषा अर्थात् विकल्प को क्वचित् व्यवस्थितविभाषा मानते हैं । जो विकल्प व्यवस्थित अर्थात् निश्चितरूप से कहीं नित्य प्रवृत्त हो और कहीं बिल्कुल नहीं उसे व्यवस्थितविभाषा कहते हैं। यह अवङ् आदेश गवाक्ष (झरोखा), गवादनी (चरगाह) आदि प्रयोगों में नित्य प्रवृत्त होता है, वहां इसके 'गोअक्ष, गोऽक्ष' आदि रूप नहीं बनते । परन्तु इसे सर्वत्र व्यवस्थितविभाषा भी नहीं समझना चाहिये जैसा कि मूलोक्त उदाहरण में इसे व्यवस्थितविभाषा नहीं माना गया ।