लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअच्-सन्धि-प्रकरणम् ७६ अर्थात् अनुबन्धों के कारण किसी को अनेकाल् नहीं मान लेना चाहिये जब तक कि उस के अन्य अल् अनेक न हों । जिस की इत्सञ्ज्ञा होती है उसे अनुबन्ध कहते हैं । ‘इश्’ आदि में शकार आदि की इत्सञ्ज्ञा होती है अतः शकार आदि अनुबन्ध हैं । अब यदि ‘इश्’ में अनुबन्ध शकार को छोड़ दें तो केवल ‘इ’ रह जाता है । तब यह अनेकाल् नहीं रहता; अतः यह सम्पूर्ण स्थानी के स्थान पर प्राप्त नहीं हो सकता । इस लिये ‘शित्’ ग्रहण आवश्यक है । [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(४६) ङिच्च ।१।१।५२॥ ङिदनेकालप्यन्त्यस्यैव स्यात् ॥ अर्थः—ङित् आदेश चाहे अनेकाल् भी क्यों न हो अन्त्य अल् के स्थान पर ही होता है । व्याख्या—ङित् ।१।१। च इत्यव्ययपदम् । अन्त्यस्य ।६।१।(अलोऽन्त्यस्य से)। समासः—ङ् (ङकारः) इत् यस्य स ङित्, बहुव्रीहि-समासः । अर्थः—(ङित्) ङकार इत् वाला आदेश (अन्त्यस्य) अन्त्य (अलः) अल् के स्थान पर होता है । यह सूत्र अनेकाल् शित् सर्वस्य (४५) सूत्र का अपवाद है । जिस आदेश के ङकार की इत्सञ्ज्ञा होती हो फिर वह चाहे अनेक अलों वाला भी क्यों न हो सम्पूर्ण स्थानी के स्थान पर न होकर अन्त्य अल् के स्थान पर ही होगा । इस सूत्र का उदाहरण अग्रिम सूत्र पर देखें । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(४७) अवङ् स्फोटायनस्य ।६।१।१२६॥ पदान्ते एङन्तस्य गोरवङ् वा स्यादचि । गवाग्रम् । गोऽग्रम् । पदान्ते किम् ? गवि ॥ अर्थः—पदान्त में जो एङ्, तदन्त गो-शब्द को अच् परे होने पर विकल्प कर के अवङ् आदेश हो जाता है । व्याख्या—पदान्तस्य ।६।१। (एङः पदान्तादति से विभक्ति-विपरिणाम कर के प्राप्त होता है । इस का सप्तमी विभक्ति में भी विपरिणाम हो सकता है जैसा कि ग्रन्थकार ने किया है) । एङः ।६।१। (एङः पदान्तादति से विभक्ति-विपरिणाम कर के प्राप्त होता है; यह ‘गोः’ पद का विशेषण है, अतः इस से तदन्त-विधि हो कर ‘एङन्तस्य’ बन जाता है)। गोः ।६।१। (सर्वत्र विभाषा गोः से)। अचि ।७।१। (इको यणचि से) । अवङ् ।१।१। स्फोटायनस्य ।६।१। (यहां ‘स्फोटायन’ ग्रहण उस के सत्कार के लिये है, क्योंकि ‘विभाषा’ पद तो पीछे से आ ही जाता है) । अर्थः—(पदान्तस्य ) पद के अन्त वाला (एङन्तस्य) जो एङ्, तदन्त (गोः) गो-शब्द के स्थान पर (अचि) अच् परे रहते (अवङ्) अवङ् आदेश हो जाता है (स्फोटायनस्य) स्फोटायन आचार्य के मत में । ‘स्फोटायन’ पाणिनि से पूर्ववर्त्ती व्याकरण के आचार्य हो चुके हैं; कहते हैं कि ये वैयाकरणों में प्रसिद्ध स्फोटतत्त्व के उपज्ञाता थे । इस सूत्र में पाणिनि ने उन