लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ें८८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् १७ बालावभू अश्नीत । १८ कुमार्यावभू अश्नीत । १६ ते अत्र । २० कन्ये आसाते । २१ अमू इन्द्र प्रस्थे दृष्टौ । २२ कवी आगच्छत । (११) ‘मात् किम् ? अमुवेऽत्र’ इस अंश की व्याख्या करते हुए प्रत्युदाहरण में दोष की उद्भावना कर के उस का समाधान करें । (१२) ‘हरी एतौ’ में कौन ईदन्त द्विवचन है, सप्रमाण स्पष्ट करें । (१३) ‘गवाक्ष’ प्रयोग के अन्य विकल्प ‘गोअक्ष, गोऽक्ष’ क्यों नहीं बनते ? (१४) अलोऽन्त्यस्य, अनेकाल् शित् सर्वस्य, ङिच्च—इन तीन परिभाषाओं में कौन उत्सर्ग और कौन अपवाद है ? प्रत्येक का उदाहरण-प्रदर्शन- पूर्वक स्पष्टीकरण करें । अब निपातों की प्रगृह्य-सञ्ज्ञा के लिये निपात-विधायक सूत्र लिखते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(५३) चादयोऽसत्त्वे । १ । ४ । ५७ ॥ अद्रव्यार्थाश्चादयो निपाता स्युः ॥ अर्थः—यदि चादियों का द्रव्य अर्थ न हो तो उन की निपात-सञ्ज्ञा होती है । व्याख्या—चादयः ।१।३। असत्त्वे ।७।१। निपाता ।१।३। (प्राग्रीश्वरान्निपाताः यह अधिकृत है) । समास — च = च-शब्द आदिर्येषान्ते चादयः, तद्गुणसंविज्ञान- बहुव्रीहि-समास । न सत्त्वम्=असत्त्वम्, तस्मिन्=असत्त्वे, नञ्-तत्पुरुष । यह प्रसज्य-प्रतिषेध है, यदि पर्युदास प्रतिषेध मानें तो अनर्थक चादियों की निपात-सञ्ज्ञा न हो सकेगी । अर्थ — (असत्त्वे) द्रव्य अर्थ न होने पर (चादयः) ‘च’ आदि शब्द (निपाता ) निपात-सञ्ज्ञक होते हैं । जिस में सङ्ख्या पाई जाए या जिस के लिये सर्वनाम का प्रयोग हो सके, उसे ‘द्रव्य’ कहते हैं । चादि-गण आगे ‘अव्यय-प्रकरण’ में आ जायेगा । उदाहरण यथा— ‘लोधं नयन्ति पशु मन्यमाना’ यहां ‘पशु’ शब्द का अर्थ ‘सम्यक् = ठीक प्रकार से’ ऐसा है । अतः यह अद्रव्यवाची होने से निपात संज्ञक होता है । यदि ‘पशु’ का अर्थ ‘जान- वर’ होगा, तो वह द्रव्यवाची होने से निपात-सञ्ज्ञक न होगा । यथा—पशुं नयन्ति । निपात सञ्ज्ञा होने से (३६७) सूत्र द्वारा ‘अव्यय’ सञ्ज्ञा हो जाती है, इस से विभक्ति का लुक् हो जाता है, यह सब आगे ‘अव्यय-प्रकरण’ में सविस्तर लिखेंगे । [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(५४) प्रादयः । १ । ४ । ५८ ॥ एतेऽपि तथा ॥ अर्थ —अद्रव्यार्थक प्रादि भी निपात-सञ्ज्ञक होते हैं । व्याख्या—असत्त्वे ।७।१। (चादयोऽसत्त्वे से)। प्रादयः ।१।३। निपाता ।१।३। (प्राग्रीश्वरान्निपाताः यह अधिकृत है) । अर्थ —(असत्त्वे) द्रव्य अर्थ न होने पर (प्रादयः) ‘प्र’ आदि शब्द (निपाता ) निपात संज्ञक होते हैं । प्रादि-गण पीछे (३५) सूत्र पर मूल में ही आ चुका है ।