भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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अच्-सन्धि-प्रकरणम् ८६ प्राग्रीश्वरान्निपाताः (१.४.५६) सूत्र से अष्टाध्यायी में निपातों का अधिकार आरम्भ किया जाता है; अर्थात् इस सूत्र से ले कर अधिरीश्वरे (१.४.९६) सूत्र- पर्यन्त निपात-सञ्ज्ञक कहे गये हैं। इसी अधिकार में पाणिनि ने प्रादय उपसर्गाः क्रिया- योगे ऐसा एक सूत्र पढ़ा है। इस का अर्थ यह है—'प्र' आदि वाईस शब्द क्रियायोग में निपात-सञ्ज्ञक होते हुए उपसर्ग-सञ्ज्ञक होते हैं। अब इस अर्थ से यह दोष उत्पन्न होता है कि जहां क्रिया-योग नहीं, वहां निपात-सञ्ज्ञा नहीं हो सकती। परन्तु हमें तो क्रियायोग में उपसर्ग-सञ्ज्ञा के साथ साथ तथा क्रियायोगाभाव में भी निपात-सञ्ज्ञा करनी इष्ट है। भाष्यकार भगवान् पतञ्जलि ने इस एक सूत्र से ये दोनों कार्य न होते देख कर इस के दो विभाग कर दिये हैं। (१) प्रादयः। (२) उपसर्गाः क्रिया- योगे। तो अब प्रथम सूत्र से क्रियायोगाभाव में तथा दूसरे सूत्र से क्रियायोग में निपात- सञ्ज्ञा सिद्ध हो जाती है। क्रियायोगाभाव में निपात-सञ्ज्ञा करने का प्रयोजन— 'यज्ञदत्तोऽपि मूर्खः' इत्यादि में 'अपि' से परे सुँब्लुक् आदि कार्य करना है। क्रियायोग में निपात-सञ्ज्ञा करने का प्रयोजन—'प्राच्छति' आदि में अव्ययसंज्ञा करके विभक्ति का लुक् करना है। द्रव्य अर्थ में प्रादियों की निपात-सञ्ज्ञा नहीं होती। यथा प्रादियों में 'वि' शब्द पढ़ा गया है; यदि इस का अर्थ पक्षी होगा तो द्रव्यार्थक होने से इस की निपात- सञ्ज्ञा न होगी। निपात न होने से यह अव्यय न होगा और तब इस से परे सुँप् का लुक् भी न होगा—विः = पक्षी, विं पश्य, विना तुल्यं वायुयानम् । अब अग्रिम सूत्र द्वारा निपातों की प्रगृह्य-संज्ञा विधान करते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(५५) निपात एकाजनाङ् ।१।१।१४॥ एकोऽच् निपात आङ्वर्जः¹ प्रगृह्यः स्यात् । इ इन्द्रः । उ उमेशः । वाक्य-स्मरणयोरङित् । आ एवं नु मन्यसे । आ एवं किल तत् । अन्यत्र ङित् —ईषदष्णम् = ओष्णम् ।। अर्थः—आङ् को छोड़ कर एक अच् मात्र निपात प्रगृह्यसञ्ज्ञक हो । व्याख्या—निपातः ।१।१। एकाज् ।१।१। अनाङ् ।१।१। प्रगृह्यः ।१।१।(ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् से)। समासः—एकश्चासावच् = एकाच्, कर्मधारय-समासो न तु बहुव्रीहिः। न आङ् = अनाङ्, नञ्तत्पुरुषः। अर्थः—(अनाङ्)आङ् से भिन्न (एकाज्) एक अच् रूप (निपातः) निपात (प्रगृह्यः) प्रगृह्य-संज्ञक होता है। उदाहरण यथा— इ इन्द्रः [ओह ! यह इन्द्र है] । उ उमेशः [जान पड़ता है कि यह महादेव है]। यहां 'इ' और 'उ' एक अच्-रूप तथा अद्रव्यार्थक होने से चादयोऽसत्त्वे (५३) द्वारा निपात संज्ञक हैं;अतः इस सूत्र से इन की प्रगृह्य-संज्ञा हो कर प्लुतप्रगृह्या अचि० (५०) द्वारा प्रकृतिभाव के कारण अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से प्राप्त सवर्ण-दीर्घ १. वर्ज्यते = त्यज्यत इति वर्जः, कर्मणि घञ्-प्रत्ययः । आङा वर्जः—आङ्वर्जः, तृतीया- तत्पुरुषः । आङ्भिन्न इत्यर्थः ।