लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् नही होता। यहा 'इ' निपात आश्चर्य करने मे तथा 'उ' निपात वितर्क करने मे प्रयुक्त हुआ है। 'एकाच्' यहा 'एकश्चासावच् = एकाच्' [एक भी हो और वह अच् भी हो] इस प्रकार कर्मधारय-समास करना ही उचित है। यदि 'एकोऽच् यस्मिन् स एकाच्' [एक अच् जिस मे हो वह] इस प्रकार बहुव्रीहि-समास करेंगे तो-'च + अस्ति = चास्ति' मे सवर्ण-दीर्घ न हो सकेगा, क्योकि तब 'च' की भी प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो जायेगी क्योकि वह भी एक अच् वाला है। चादिगण मे 'आ' तथा प्रादिगण मे 'आङ्' इस प्रकार दो निपात पढे गये हैं। इन मे से प्रथम 'आ' की इस सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो जाती है पर दूसरे 'आङ्' की इस सूत्र मे 'अनाङ्' कहने के कारण प्रगृह्य-सञ्ज्ञा नही होती। अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि आ और आङ् ये दोनों प्रयोग मे तो 'आ' के रूप में ही मिलते हैं क्योकि हलन्त्यम् (१) द्वारा आङ् का ङकार इत् हो कर लुप्त हो जाता है, ऐसी दशा मे यह कैसे विदित हो कि यह आ है, और यह आङ् ? इस के उत्तर के लिये भाष्यकार ने यह व्यवस्था की है— ईषदर्थे क्रियायोगे मर्यादाभिविधौ च यः । एतमातं ङितं विद्याद् वाक्यस्मरणयोरङित् ॥ अर्थात्-अल्प (थोडा) अर्थ मे, क्रिया के योग मे, मर्यादा और अभिविधि अर्थ में जो आकार हो उसे ङित्—आङ् समझना चाहिये। पूर्व कही बात को अन्यथा करने के लिये प्रयुक्त वाक्य मे तथा स्मरण अर्थ मे अङित्—'आ' समझना चाहिये। (१) ईषदर्थे यथा-आ + उष्ण = ओष्णम् । [यहा प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमाया वार्त्तिक से नित्य-समास होता है। नित्य-समासो का स्वपद-विग्रह नही हुआ करता, मूल मे इसी लिये 'ईषदुष्णम्' ऐसा अस्वपद-विग्रह दिखाया गया है। 'ओष्णम्' का अर्थ है-थोडा गरम]। यहा 'आङ्' होने से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा नही होती; अतः प्रकृति- भाव न होने के कारण आद् गुणः (२७) सूत्र से गुण एकादेश हो जाता है। (२) क्रिया-योगे यथा-आ + इहि=एहि (आओ), आ + इतः=एत (वे दो आते हैं)। यहा इण् गतौ इस अदादिगणीय क्रिया का योग है; अतः 'आङ्' होने से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा नही होती। प्रगृह्य-सञ्ज्ञा न होने से प्रकृतिभाव भी नही होता; आद् गुणः (२७) से गुण हो जाता है। (३) मर्यादाया' यथा- आ + अलवरात् = आलवराद् वृष्टो मेघ (अलवर १. तेन विनेति मर्यादा, तेन सहेत्यभिविधि । मर्यादा और अभिविधि में यह भेद होता है कि मर्यादा मे अवधि का ग्रहण नही होता और अभिविधि मे ग्रहण होता है। यथा-'अलवर तक मेघ बरसा' यहा मेघ बरसने की अवधि 'अलवर' है। मर्यादा में इस अवधि का ग्रहण न होने से यह तात्पर्य होगा कि अलवर देश को