भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अर्थ —सम्बुद्धि-निमित्तक ओकार—अवैदिक अर्थात् वेद में न पाये जाने वाले 'इति' शब्द के परे होने पर विकल्प कर के प्रगृह्य-सञ्ज्ञक होता है । व्याख्या—सम्बुद्धौ ।७।१। [निमित्त-सप्तम्येषा] । ओत् ।१।१। (ओत् से) । अनार्षे ।७।१। इतौ ।७।१। प्रगृह्य ।१।१। (ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् से) । शाकल्यस्य ।६।१। समास —ऋषिर्वेदः, उक्तञ्च मेदिनीकोषे—ऋषिर्वेदे वसिष्ठादौ दीधितौ च पुमानयम् । ऋषौ (वेदे) भव =आर्षं, तत्र भव. (१०८६) इत्यण्, न आर्षं = अनार्षंस्तस्मिन् =अनार्षे, नञ्तत्पुरुषः । 'अवैदिके' इत्यर्थः । अर्थ — (अनार्षे) वेद में न पाये जाने वाले (इतौ) इति शब्द के परे होने पर (सम्बुद्धौ) सम्बुद्धि को निमित्त मान कर पैदा हुआ (ओत्) ओकार (प्रगृह्य) प्रगृह्य-सञ्ज्ञक होता है (शाकल्यस्य) शाकल्य के मत में । अन्य आचार्यों के मत में प्रगृह्य-सञ्ज्ञा नहीं होती, परन्तु हमें सब आचार्य प्रमाण हैं, यत विकल्प से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होगी । उदाहरण यथा — विष्णो इति ( 'विष्णो' यह शब्द) । विष्णु शब्द से परे सम्बुद्धि [सम्बोधन के एकवचन को सम्बुद्धि कहते हैं। देखो—एकवचनं सम्बुद्धिः (१३२)] करने पर ह्रस्वस्य गुण (१६६) सूत्र से सम्बुद्धि को निमित्त मान कर गुण हो कर—विष्णो+स् । अब एङ्घ्रस्वात् सम्बुद्धे (१३४) सूत्र से सुकार का लोप करने पर 'विष्णो' पद सिद्ध हो जाता है । इस के आगे 'इति' पद लाने से एचोऽयवायाव. (२२) द्वारा ओकार को अव् आदेश प्राप्त होना था जो अब इस सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होने से प्रकृतिभाव के कारण नहीं होता । अन्य आचार्यों के मत में प्रगृह्य-सञ्ज्ञा न होने से अव् आदेश हो कर 'विष्णव् इति' बना । अब इस दशा में पदान्त वकार का लोप शाकल्यस्य (३०) सूत्र से वैकल्पिक लोप हो जाता है । लोपपक्ष में 'विष्ण इति' (वकारलोप के असिद्ध होने से गुण नहीं होता) और लोपाभावपक्ष में 'विष्णविति' इस प्रकार कुल मिला कर तीन रूप सिद्ध होते हैं : यह उदाहरण वेद का नहीं, वेद में तो 'इति' शब्द परे होने पर प्रगृह्य- सञ्ज्ञा नहीं होती किन्तु अव् आदेश हो जाता है । यथा—एता गा ब्रह्मबन्ध्व इत्यब्रवीत् [यह काठकसंहिता (१० ६) का वचन है] । नोट—वस्तुत अन्य आचार्यों के मत में 'विष्णविति' ही रूप होता है, 'विष्ण इति' नहीं । क्योकि जब शाकल्य आचार्य के मत में ओ को अव् ही नहीं होता तो पुनः उन के मत में लोप शाकल्यस्य (३०) से वकार का लोप कैसे सम्भव हो सकता है ? काशिका आदि प्राचीन ग्रन्थों में सर्वत्र इस सूत्र पर दो ही उदाहरण लिखे मिलते हैं, लोप वाला रूप कहीं नहीं देखा जाता ।¹ १ इस सूत्र पर कई मनीषियों का विचार है कि यह सूत्र वैदिकपदपाठविषयक ही है । सर्वप्रथम आचार्य शाकल्य ने ऋग्वेद के अपने पदपाठ में वायो, विष्णो आदि ओदन्त सम्बुद्ध्यन्त पदों के आगे 'इति' शब्द लगा कर उन को निर्दिष्ट किया तथा उन के मध्य स्पष्टप्रतिपत्ति के लिये सन्धि भी नहीं की । तदनन्तर अन्य