लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअच्-सन्धि-प्रकरणम् ६३ [लघु०] विधि-सूत्रम्- (५८) मय उञो वो वा ।८।३।३३॥ मयः परस्य उञो वो वा स्यादचि । किम्वुक्तम् । किमु उक्तम् ॥ अर्थः- मय् प्रत्याहार से परे उञ् निपात को विकल्प कर के 'व्' आदेश हो जाता है अच् परे हो तो । व्याख्या- मयः ।५।१। उञः ।६।१। वः ।१।१। वकारादकार उच्चारणार्थः । वा इत्यव्ययपदम् । अचि ।७।१। (ङमो ह्रस्वादचि ङमुण्नित्यम् से) । अर्थः-- (मयः) मय् प्रत्याहार से परे (उञः) उञ् के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (वः) व् आदेश होता है (अचि) अच् परे हो तो । मय् प्रत्याहार में लकार को छोड़ कर अन्य सब वर्गस्य वर्ण आ जाते हैं । उदाहरण यथा- किम् उ उक्तम् (क्या कहा ?) । यहां उञ् के एक अच् रूप निपात होने से निपात एकाजनाङ् (५५) सूत्र प्राप्त होता है । इस का बाध कर इस सूत्र से वैकल्पिक वकार हो जाता है । जहां वकार आदेश होता है वहां- 'किम्वुक्तम्' प्रयोग सिद्ध होता है । वकारादेश के अभाव में यथाप्राप्त प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो कर प्रकृतिभाव के कारण सवर्णदीर्घ नहीं होता- किम् उ उक्तम् । इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं । नोट-यह सूत्र मोऽनुस्वारः (८.३.२३) सूत्र की दृष्टि में पर त्रिपादी होने से असिद्ध है; अतः 'किम्वुक्तम्' यहां हल् = वकार परे होने पर भी मोऽनुस्वारः (७७) से मकार को अनुस्वार नहीं होता । तथा हि- त्रैपादीये वकारे तु नानुस्वारः प्रवर्त्तते । ध्यान रहे कि उञ् का ञकार हलन्त्यम् (१) से इत्सञ्ज्ञक हो कर तस्य लोपः (३) से लुप्त हो जाता है । इस प्रकार 'उ' मात्र शेष रहता है । अभ्यास (१३) (१) अधोलिखित प्रयोगों में ससूत्र सन्धि या सन्ध्यभाव दर्शाएं- १. भानविति । २. शम्बोस्तु वेदिः । ३. वाय इति । ४. अहो आश्चर्यम् । ५. तद्द्यस्य परेः । ६ शम्भो इति । ७. अथो इति । ८. उ उत्तिष्ठ । ६. नो इदानीम् । १०. ओदकान्तात् प्रियो जनोऽनुगन्तव्यः । ११. अहो अद्य महोष्णता । १२. इ इन्द्रं पश्य । १३. किमिदं सत्यम् उताहो असत्यम् । १४. किमु आवपन्तम् । (२) कहां २ 'आ' ङित् और कहां २ अङित् होता है ? सोदाहरण स्पष्ट करें । पदपाठकारों ने भी शाकल्य के इस नियम का अनुसरण किया । शाकल्यग्रहण को काशिकाकार ने विभाषार्थ माना है। इस विभाषा को व्यवस्थितविभाषा ही समझना चाहिये । तैत्तिरीयपदपाठ को छोड़ अन्य पदपाठों में प्रगृह्यसंज्ञा नित्य होती है । तैत्तिरीयपदपाठ में सन्धि उपलब्ध होती है । अत एव हरदत्तमिश्र ने यहां पदमञ्जरी में लिखा है- तत्र बह्वृचाः प्रगृह्यमेवाधीयते, तैत्तिरीयास्त्वप्रगृह्यम् ।