भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (३) प्रादय उपसर्गाः क्रियायोगे सूत्र का योगविभाग क्यों किया जाता है ? (४) 'किम्बुक्तम्' यहां मोऽनुस्वार (७७) सूत्र क्यों प्रवृत्त नहीं होता ? (५) निपात एकाजनाङ् के 'एकाच्' पद में क्यों बहुव्रीहिसमास नहीं मानते ? (६) 'वस्तुत विष्ण इति' रूप नहीं बनता—इस कथन की व्याख्या करें। (७) उदाहरणप्रदर्शनपूर्वक मर्यादा और अभिविधि का परस्पर भेद बताए। (८) पदपाठ की दृष्टि से सम्बुद्धौ शाकल्यस्येता० सूत्र की व्याख्या करें। ० [लघु०] विधि-सूत्रम्—(५६) इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च ।६।१।१२३।। पदान्ता इको ह्रस्वा वा स्युरसवर्णेऽचि । ह्रस्वविधिसामर्थ्यान्न स्वर- सन्धि । चक्रि अत्र । चक्र्यत्र । पदान्ता इति किम् ? गौर्यौ ॥ अर्थ —असवर्ण अच् परे होने पर पदान्त इक् विकल्प कर के ह्रस्व हो जाते हैं। ह्रस्वविधि०—ह्रस्वविधान करने के सामर्थ्य से स्वर सन्धि नहीं होनी । व्याख्या—पदान्तस्य ।६।१। (एङः पदान्तादति में विभक्तिविपरिणाम करके)। इक् ।६।१। असवर्णे ।७।१। अचि ।७।१। (इको यणचि से)। ह्रस्व ।१।१। शाकल्यस्य ।६।१। च इत्यव्ययपदम्। अर्थ —(असवर्णे) असवर्ण (अचि) अच् परे होने पर (पदान्तस्य) पदान्त (इक्) इक् के स्थान पर (ह्रस्व ) ह्रस्व हो जाता है (शाकल्यस्य) शाकल्य आचार्य के मत में। अन्य आचार्यों के मत में नहीं होता, हमें सब आचार्य प्रमाण हैं अतः ह्रस्व विकल्प से होगा। उदाहरण यथा— चक्री +अत्र (विष्णु यहां हैं) यहां पदान्त इक् ईकार है, इस से परे 'अ' यह असवर्ण अच् वर्त्तमान है अतः इक् को विकल्प करके ह्रस्व हो गया। जहां ह्रस्व हुआ वहां—'चक्रि अत्र'। जहां ह्रस्व न हुआ वहां इको यणचि (१५) से यण् होकर 'चक्यत्र' इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। इस के अन्य उदाहरण यथा—१ मधु¹ अस्ति, मध्वस्ति। २ दधि अस्ति, दध्यस्ति। ३ वस्तु आनय, वस्त्वानय। ४ वारि अत्र, वार्यत्र। ५ योगि आग- च्छति, योग्यागच्छति। ६ घनि अवोचत्, घन्यवोचत्। ७ नदि एधते, नद्येधते। ८ जाह्नवि अवतरति, जाह्नव्यवतति। ९ बलि ऋक्ष , बल्यृक्ष । १० भवति एव, भवत्येव। ११ धातृ अत्र, धात्रत्र। अब जहां ह्रस्व करते हैं वहां यह शङ्का उत्पन्न होती है कि यहां इको यणचि (१५) सूत्र से यण् क्या न किया जाए ? इसका उत्तर यह है कि यदि वहां भी यण् हो जाए तो पुनः इस सूत्र से ह्रस्व करना व्यर्थ हो जायेगा, क्योंकि तब दोनों पक्षों में 'चक्यत्र' रूप समान हो जायेगा जो इस सूत्र के बिना भी इको यणचि (१५) सूत्र से सिद्ध हो सकता है। अतः इस सूत्र द्वारा ह्रस्व करने के सामर्थ्य से यहां सन्धि न १ यहां यह ध्यातव्य है कि ह्रस्वों को भी पर्जन्यवल्लक्षणप्रवृत्ति न्याय से ह्रस्व हो जाया करता है। इस का फल सन्ध्यभाव स्पष्ट ही है। यह विषय इस सूत्र के भाष्य में अत्यन्त स्पष्ट है।