लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
अब प्रसङ्गतः प्राप्त हुए द्वित्व को कह कर पुनः इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च (५६) सूत्र पर निषेधक वार्त्तिक लिखते हैं— [लघु०] वा०—(६) न समासे ॥ वाप्यश्व ॥ अर्थ —समास में असवर्ण अच् परे होने पर पदान्त इक् को ह्रस्व नहीं होता । व्याख्या—वापी+अश्व [वावडी में घोडा । वाप्यामश्व =वाप्यश्व, सह सुपा (६०६) इति समास ।] यहां समास में विभक्तियों का लुक् होने पर प्रत्यय- लोपे प्रत्यय-लक्षणम् (१६०) सूत्र द्वारा ईकार पदान्त हो जाता है, इसे असवर्ण अच् (अ) परे होने पर पूर्वसूत्र (५६) से ह्रस्व प्राप्त था जो अब इस वार्त्तिक के निषेध के कारण नहीं होता । इको यणचि (१५) से यण् हो कर विभक्ति लाने से—'वाप्यश्व' सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार— सुध्युपास्य मध्वरि गौर्यात्मज नद्युदय चार्वङ्गी, मात्राज्ञा वध्वागमनम्, लाकृति' प्रभृति समास में भी समझ लेना चाहिये । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(६१) ऋत्यकः ।६।१।१२४॥ ऋति परे पदान्ता अकः प्राग्वद् वा । ब्रह्म ऋषि । ब्रह्मर्षि । पदान्ता त्किम् ? आर्च्छत् ॥ अर्थ —ऋत् (ह्रस्व ऋकार) परे होने पर पदान्त अक् विकल्प से ह्रस्व हो । व्याख्या—ऋति ।७।१। पदान्तस्य ।६।१। (एङः पदान्तादति से विभक्ति- विपरिणाम द्वारा)। अकः ।६।१। ह्रस्वः ।१।१। शाकल्यस्य ।६।१। (इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च से )। अर्थ —(ऋति) ह्रस्व ऋवर्ण परे होने पर (पदान्तस्य) पदान्त (अकः) अक् के स्थान पर (ह्रस्व ) ह्रस्व हो जाता है (शाकल्यस्य) शाकल्य आचार्य के मत में । अन्य आचार्यों के मत में न होने से विकल्प हो जायेगा । उदाहरण यथा— 'ब्रह्मा+ऋषि' यहां 'ऋषि' शब्द का आदि ऋत् परे है, अतः मकारोत्तर पदान्त आकार को विकल्प करके ह्रस्व होकर—'ब्रह्म ऋषि' तथा ह्रस्वाभावपक्ष में आद् गुणः (२७) से गुण, रपर होकर— ब्रह्मर्षि' बना । [अथवा 'ब्रह्म+ऋषि' ऐसे छेद में ह्रस्व को ह्रस्व होगा । ब्रह्मणः =वेदस्य ऋषिः —ब्रह्मर्षिरित्यादिविग्रह ] । पूर्व (५६) सूत्र सवर्ण परे होने पर प्रवृत्त नहीं होता था तथा अकार को ह्रस्व भी नहीं करता था, इन दोनों आवश्यकताओं के लिये यह सूत्र बनाया गया है । जैसा कि महाभाष्य में कहा है—सवर्णार्थम् अनिगन्तार्थञ्च । सवर्ण परे होने पर यथा— होतृ ऋद्धय, होतॄद्धय । यहां पूर्व-सूत्र प्रवृत्त नहीं हो सकता था । अकार का उदाहरण—ब्रह्मऋषि, ब्रह्मर्षि । ध्यान रहे कि जहां २ ह्रस्व करेंगे वहां २ पूर्ववत् ह्रस्वविधान के सामर्थ्य से स्वर-सन्धि नहीं होगी । इस सूत्र में भी पूर्ववत् 'पदान्त' का ग्रहण होता है, अतः अपदान्त अक् को ह्रस्व नहीं होता । उदाहरण यथा—'आ+ऋच्छत्' [यह तौदादिक 'ऋच्छ' अथवा भौवादिक 'ऋ' धातु के लङ् लकार के प्रथम-पुरुष का एकवचन है । 'आ' यह यहां