भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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'आट्' आगम समझना चाहिये]। यहां 'आ' (आट्) पदान्त नहीं अतः ऋत् परे होने पर भी इसे ह्रस्व नहीं होता। आठश्च (१६७) से पूर्व+पर के स्थान पर 'आर्' वृद्धि होकर - 'आर्च्छत्' बन जाता है। इकोऽसवर्णे० (५६) सूत्र समास में प्रवृत्त नहीं होता है; यह सूत्र समास में भी प्रवृत्त हो जाता है। यथा - सप्तऋषीणाम्, सप्तर्षीणाम्। परन्तु उपसर्गादृति धातौ (३७) के विषय में इस की प्रवृत्ति नहीं होती - प्रार्च्छति। इस की स्पष्टता सिद्धान्त- कौमुदी में देखें। इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा - १. कन्य ऋज्वी, कन्यर्ज्वी। २. कुमारि ऋतुमती, कुमार्युतुमती। ३. प्रज्ञ ऋतम्भरा, प्रज्ञर्तम्भरा। ४. पुरुपऋषभः, पुरुपर्षभः। ५. महऋषिः, महर्षिः। ६. शङ्खधमऋद्धिः, शङ्खधमर्द्धिः। ७. कर्तृ ऋणि, कर्तृ णि। ८. पञ्च ऋतवः, पञ्चर्तवः। ९. कण्वऋषिः, कण्वर्षिः। १०. ऋपिऋणम्, ऋष्य्णम्। [लघु०] इत्यच्सन्धि-प्रकरणम् ॥ अर्थः- यहां अचों की सन्धि का प्रकरण समाप्त होता है। व्याख्या - अच्सन्धि शब्द पर विशेष टिप्पण पृष्ठ (६६) पर देखें। अभ्यास (१४) (१) इकोऽसवर्णे० तथा ऋत्यकः में 'पदान्त' की अनुवृत्ति क्यों लाते हैं ? (२) क्या समास में भी ऋत्यकः की प्रवृत्ति हो सकती है ? (३) 'प्रार्च्छति' में ह्रस्वसमुच्चित प्रकृतिभाव क्यों नहीं होता ? (४) 'सुध्युपास्यः' आदि में इकोऽसवर्णे० क्यों नहीं लगता ? (५) 'साधू इमौ' में इकोऽसवर्णे० की प्रवृत्ति होगी या नहीं ? स्पष्ट करें। (६) सवर्णार्थसनिगन्तार्थञ्च - इस वचन की व्याख्या करें। (७) ह्रस्वविधि में ऐसा कौन सा सामर्थ्य है जो स्वरसन्धि को रोकता है ? (८) निम्नस्थ प्रयोगों में सोपपत्तिक सन्धि दर्शाएं - १. नदि एति। २. अर्व्मकः। ३. देवऋषयः। ४. पितृऋणम्। ५. अर्ज्यति। ६. कर्तृ इदम्। ७. नद्यात्मा। ८. नमः परम-ऋषिभ्यः। ९. साक्षि आत्मनः। १०. वर्द्धते। -::o::- इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु- सिद्धान्तकौमुद्यामच्सन्धि- प्रकरणं समाप्तम् ॥ ल० प्र० (७)