लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ हल्-सन्धि-प्रकरणम् अब हलों अर्थात् व्यञ्जनों का व्यञ्जनों के साथ मेल दिखाया जायेगा। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(६२) स्तोः श्चुना श्चुः ।८।४।४०॥ सकारतवर्गयोः शकारचवर्गाभ्यां योगे शकारचवर्गौ स्तः। रामश्शेते। रामश्चिनोति। सच्चित्। शार्ङ्गिञ्जय॥ अर्थ.—सकार तवर्ग के स्थान पर, शकार चवर्ग के साथ योग होने पर शकार चवर्ग हो जाता है। व्याख्या—स्तोः ।६।१। श्चुना ।३।१। श्चुः ।१।१। समास — स् च तुश्च = स्तु, तस्य = स्तोः, समाहार-द्वन्द्व। यद्यपि समाहार-द्वन्द्व में नपुंसकलिंग होता है, तथापि यहां सौत्र पुंस्त्व जानना चाहिए। श् च चुश्च = श्चुः तेन = श्चुना, समाहार- द्वन्द्व। अत्र सहयोगे तृतीया बोध्या। सकार और तवर्ग को 'स्तु' तथा शकार और चवर्ग को 'श्चु' कहा गया है। अर्थ — (स्तोः) सकार तवर्ग के स्थान पर (श्चुना) शकार चवर्ग के साथ (श्चुः) शकार चवर्ग हो जाता है। तात्पर्य यह है कि शकार- चवर्ग के साथ यदि सकार-तवर्ग का आगे या पीछे कहीं योग (मेल) हो तो सकार-तवर्ग के स्थान पर भी शकार-चवर्ग हो जाता है। यहां स्थानी—स्, त्, थ्, द्, ध्, न् ये ६ वर्ण और इन के स्थान पर होने वाले आदेश—श्, च्, छ्, ज्, झ्, ञ् ये भी ६ वर्ण हैं। अतः दोनों ओर समान संख्या होने से ये आदेश यथासंख्यमनुदेशः० (२३) परिभाषा के अनुसार क्रमशः होंगे, अर्थात् स् को श्, त् को च्, थ् को छ्, द् को ज्, ध् को झ् तथा न् को ञ् ही आदेश होगा। ध्यान रहे कि यहां स्थानी और आदेश के विषय में तो यथासंख्य होता है परन्तु योग के विषय में यथासंख्य नहीं होता, अर्थात् यहां यह नहीं समझना चाहिये कि सकार को शकार—शकार के योग में, तकार को चकार—चकार के योग में, थकार को छकार—छकार के योग में, दकार को जकार—जकार के योग में, धकार को झकार—झकार के योग में तथा नकार को ञकार—ञकार के योग में ही होता है। किन्तु योग चाहे किसी 'श्चु' का हो—सकार को शकार, तकार को चकार, थकार को छकार, दकार को जकार, धकार को झकार तथा नकार को ञकार ही होगा। यदि योग के विषय में भी यथासंख्य होता तो शात् (६३) सूत्र से निषेध करने की कुछ आवश्यकता न होती, क्योंकि शकार से परे तो तब तवर्ग को चवर्ग प्राप्त ही नहीं हो सकता था। अतः निषेध करने से ज्ञात होता है कि योग के विषय में आचार्य यथासंख्य नहीं चाहते। उदाहरण यथा— (१) रामश्शेते (राम सोता है)। 'रामस् + शेते' [राम शब्द से सुं प्रत्यय करने पर ससजुषो रुः (१०५) से रुँ तथा खरवसानयोर्विसर्जनीयः (६३) से विसर्ग