भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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हल्-सन्धि-प्रकरणम् ६६ हो पुनः वा शरि (१०४) से विकल्प कर के विसर्ग होने और तदभावपक्ष में सकार करने पर—'रामस् शेते, रामः शेते' ये दो रूप बनते हैं। यहां विसर्गाभावपक्ष में सत्व वाले रूप का ग्रहण किया गया है।] यहां सकार का शकार के साथ योग होने से उस के स्थान पर क्रमानुसार शकार आदेश हो 'रामश्शेते' प्रयोग सिद्ध होता है। अब ग्रन्थकार यह जतलाने के लिये कि योग के विषय में यथासंख्य नहीं होता; सकार का एक अन्य उदाहरण देते हैं— (२) रामश्चिनोति (राम चुनता है)। 'रामस् + चिनोति' [राम शब्द से सुँ प्रत्यय करने पर ससजुषो रुः (१०५) से उसे रुँ तथा खरवसानयोर्विसर्जनीयः (६३) से विसर्ग हो पुनः विसर्जनीयस्य सः (१०३) से सकार हो जाता है।] यहां सकार का चकार के साथ योग होने से उस के स्थान पर क्रमानुसार शकार हो 'रामश्चिनोति' प्रयोग सिद्ध होता है। (३) सच्चित् (सत् और ज्ञान)। 'सत् + चित्' यहां तकार का चकार के साथ योग है अतः उस के स्थान पर क्रमानुसार चकार हो 'सच्चित्' प्रयोग सिद्ध होता है। [वस्तुतः यहां स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.३६) के असिद्ध होने से प्रथम झलां जशो- ऽन्ते (८.२.३६) से तकार को दकार हो पुनः खरि च (८.४.५४) के असिद्ध होने से स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.३६) से दकार को जकार हो कर अन्त में खरि च (७४) से जकार को चकार हो जाता है]। (४) शार्ङ्गिञ्जय (हे विष्णो ! तुम्हारी जय हो)। 'शार्ङ्गिन् + जय' यहां नकार का जकार के साथ योग है अतः प्रकृतसूत्र से नकार के स्थान पर क्रमानुसार ञकार हो कर 'शार्ङ्गिञ्जय' प्रयोग सिद्ध होता है। योग वर्ण के आगे या पीछे दोनों अवस्थाओं में हो सकता है; किसी को यह न समझ लेना चाहिये कि यदि श्चु आगे आएंगे तो स्तु को श्चु होगा। चाहे श्चु— स्तु से आगे आए या पीछे, स्तु को श्चु हो जायेगा। यथा—'यज् + न' यहां नकार का पूर्व जकार के साथ योग होने पर उस के स्थान पर ञकार हो 'यज्ञः' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार राज्ञः, याच्ञा आदि में समझना चाहिये। शङ्का—यदि योग में आगे पीछे का नियम नहीं; तो 'अच्सन्धि' में स् को श् हो जावे, शात् (६३) सूत्र निषेध नहीं कर सकता। 'अच्त्वम्' में तकार को चकार हो जावे। समाधान - अल्पाच्तरम् (६८६) इस सूत्र के निर्देश से, सिद्धमनच्त्वात् इस वार्त्तिक के प्रयोग से तथा अकत्स्वरौ तु कर्त्तव्यौ प्रत्यङ्गं मुक्तसंशयौ इस भाष्य के प्रामाण्य से यह प्रमाणित होता है कि क्वचित् प्रत्याहार आदि के सान्निध्य में असन्देहार्थ श्चुत्व आदि संहितार्य नहीं होते। अत एव 'अच्त्वम्' में कुत्व, 'जश्त्वम्' में व्रश्चा- दिषत्व तथा 'खर्परे, शर्परे' में रेफ को विसर्ग आदि कार्य नहीं देखा जाता। [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(६३) शात् ।८।४।४३॥ शात्परस्य तवर्गस्य चुत्वं न स्यात् । विश्नः । प्रश्नः ॥