भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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१०० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां - अर्थः—शकार से परे तवर्ग के स्थान पर चवर्ग नही होता । व्याख्या—शात् ।५।१। तो ।६।१। (तो. षि से) । न इत्यव्ययपदम् (न पदान्ता- ट्टोरनाम् से) । क्या नही होता ? इस जिज्ञासा के उत्पन्न होने पर सुतरा यही आयेगा कि जो प्राप्त होता है वह नही होता । शकार से परे तवर्ग के स्थान पर स्तोः श्चुना श्चुः (६२) से चवर्ग ही प्राप्त हो सकता है, अन्य कोई प्राप्त नही हो सकता' अत यहा उसी का निषेध समझना चाहिये । अर्थ —(शात्) शकार से परे (तो.) तवर्ग के स्थान पर चवर्ग (न) नही होता । उदाहरण यथा— (१) 'विश् + न' [यहा विच्छँ गतौ (तुदा०) धातु से यजयाचयतविच्छ- प्रच्छरक्षो नङ् (८६०) द्वारा नङ् प्रत्यय तथा च्छ्वोः शूडनुनासिके च (८४३) द्वारा छकार को शकार हो गया है।] यहा स्तो. श्चुना श्चुः (६२) द्वारा नकार को ञकार प्राप्त था जो अब इस सूत्र के निषेध के कारण नही होता—विश्न (गति वा प्रवेश)। (२) 'प्रश् + न' [यहा प्रच्छँ ज्ञीप्सायाम् (तुदा०) धातु से पूर्ववत् नङ् प्रत्यय तथा छकार को शकार आदेश हुआ है।] यहा स्तोः श्चुना श्चुः द्वारा नकार को ञकार प्राप्त था जो अब इस सूत्र के निषेध के कारण नही होता— प्रश्न २। इसी तरह 'क्लिश्नाति'। स्मरण रहे कि यह सूत्र (८.४.४३) स्तो श्चुना श्चुः (८.४ ३६) से परे होने के कारण पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा उस की दृष्टि मे असिद्ध होने पर भी वचन- सामर्थ्य से असिद्ध नही होता, उस का अपवाद हो जाता है। अपवादो वचनप्रामाण्याद् इति भाष्यम् । इस सूत्र से विधान किया निषेध नकार के सिवाय तवर्गस्थ अन्य वर्णों से प्राय सम्भव नही हो सकता, क्योकि 'श्' से परे 'त्, थ्, द्, ध्' होने पर व्रश्चभ्रस्ज० (३०७) द्वारा षत्व हो जाया करता है। अभ्यास (१५) (१) निम्नस्थ प्रयोगो मे सूत्रनिर्देशपूर्वक सन्धिकार्य दर्शाइए— १. ग्रामात् + चलित । २ हरिस् + छत्रधर । ३ ईश्वरात् + जगत् + जायते । ४ सोमसुत् + झन्कार । ५ तद् + चैतन्यम् । ६ याच् + ना। ७ शङ् + नाय । ८ अश् + नित्यम् । ६. जन् + त्वम् । १०. दु + तिप् । ११. उद् + ज्वल । (२) निम्नलिखित रूपो मे सूत्रसमन्वयपूर्वक सन्धिच्छेद करें— १. यहा अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा इस परिभाषा को भी ध्यान मे रखना चाहिये । २. यहा ग्रहिज्या० (६३४) सूत्र द्वारा सम्प्रसारण नही होता, क्योकि प्रश्ने चासन्न- काले (३ २ ११७) सूत्र मे महामुनि ने स्वय सम्प्रसारण नही किया ।