भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 140

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १२३ 'सम्' यह अव्यय होने के कारण सुबन्त होने से पद-सञ्ज्ञक है। इस के मकार को क्विबन्त 'राज़्' धातु परे होने पर मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार प्राप्त था। इस सूत्र से सम् के मकार को मकार किया गया है; इसका अभिप्राय यह है कि मकार, मकार ही बना रहे अनुस्वार न हो जाये। उदाहरण यथा— सम् + राट् [चक्रवर्ती राजा। राजृ दीप्तौ (भ्वा०) इत्यस्मात् सत्सूद्विष० इति क्विपि, क्विव्लोपे, नावागते हल्ङ्याब्भ्यः—इति सोर्लोपे, पदान्ते व्रश्चभ्रस्ज० इति षत्वे, डत्वे, अवसाने चत्त्वे च कृते 'राट्' इति सिध्यति।] यहां रेफ-हल् के परे रहते मकार को मोऽनुस्वारः (७७) सूत्र के अनुसार प्राप्त था जो अब प्रकृतसूत्र से नहीं होता, इस तरह 'सम्राट्' पद सिद्ध होता है। इसी प्रकार—सम्राजी, सम्राजः, सम्राजम्, सम्राजा। सम्राजो भावः—साम्राज्यम्। क्विबन्त कहने से 'सम् + राजते = संराजते' में अनुस्वार हो जाता है। नोट—'सम्राज्ञी' शब्द वेद में देखा जाता है (सम्राज्ञी श्वशुरे भव—ऋ० १०.४६) परन्तु लोक में यह शब्द चिन्तनीय है; 'राज्ञी' की सिद्धि कर के 'सम्' में योग होने पर क्विबन्त न होने से 'म्' नहीं हो सकता। अथवा 'सम्राज्' शब्द से भी ङीप् नहीं हो सकता। तब स्त्रीलिङ्ग में भी 'सम्राट्' ही रहेगा। [लघु०] विधि-सूत्रम् (८२) हे मपरे वा ॥८।३।२६॥ मपरे हकारे मस्य मो वा। किम्ह्मलयति, किं ह्मलयति ॥ अर्थः—जिस हकार से परे मकार हो, उस हकार के परे होने पर मकार के स्थान पर विकल्प कर के मकार होता है। व्याख्या—मपरे। ७।१। हे। ७।१। मः। ६।१। (मोऽनुस्वारः से)। मः। १।१। (मो राजि समः क्वौ से)। वा इत्यव्ययपदम्। समासः—मः परो यस्मादसौ मपरस्तस्मिन् = मपरे। बहुव्रीहि-समासः। अर्थः—(मपरे) मकार परे वाले (हे) हकार के परे होने पर (मः) मकार के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (मः) मकार आदेश हो जाता है। यह सूत्र मोऽनुस्वारः (७७) का वैकल्पिक अपवाद है। उदाहरण यथा—'किम् + ह्मलयति' [क्या चलाता वा हिलाता है ? ह्मल चलने (भ्वा०) हेतुमण्णौ मित्त्वाद् ह्रस्वः] यहां मकार परे वाला हकार परे है अतः मकार को मकार अर्थात् अनुस्वाराभाव हो—किम्ह्मलयति। पक्ष में मोऽनुस्वार. (७७) से अनुस्वार हो—किं ह्मलयति। इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। इसी तरह— कथम्ह्मलयति, कथं ह्मलयति इत्यादि रूप होते हैं। [लघु०] वा०—(१३) यवलपरे यवला वा ॥ कियँ् ह्यः, किं ह्यः। किव्ँ ह्वल्यति, किं ह्वल्यति। किलँ् ह्लादयति, किं ह्लादयति ॥ अर्थः—यकार, वकार, अथवा लकार परे वाला हकार परे हो तो मकार के स्थान पर क्रमशः विकल्प कर के यकार, वकार तथा लकार हो जाते हैं।