भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 633 में से

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पृष्ठ 139

१२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां (पदान्तस्य) पदान्त (अनुस्वारस्य) अनुस्वार के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (पर-सवर्ण) परसवर्ण आदेश होता है। यह सूत्र पूर्वसूत्र का अपवाद है, अतः पूर्वे- सूत्र अपदान्त अनुस्वार को और यह पदान्त अनुस्वार को यय् परे होने पर परसवर्ण करेगा। उदाहरण यथा-- त्वङ्करोषि त्वं करोषि (तू करता है)। 'त्वम् + करोषि' यहां 'त्वम्' इस पद के अन्त्य मकार को मोऽनुस्वार (७७) सूत्र से अनुस्वार हो कर 'त्वं + करोषि' बना। अब इस सूत्र से पदान्त अनुस्वार को पर = ककार का सवर्ण ङकार करने से--त्वङ् करोषि। परसवर्णभावपक्ष मे--त्वं करोषि। [पर = ककार के 'क्, ख्, ग्, घ्, ङ्' ये पाञ्च सवर्ण हैं, स्थानकृत आन्तर्य से ककार का सवर्ण ङकार ही होगा।]। इसी प्रकार-- तङ् क्यञ् चित्रपक्षण् डयमानन् नभस्थम् पुरुषोऽवधीत् [परसवर्णपक्षे] । तं कथं चित्रपक्षं डयमानं नभस्थं पुरुषोऽवधीत् [परसवर्णभावे] । 'य्, व्, ल्' वर्ण सानुनासिक और निरनुनासिक भेद से दो प्रकार के होते हैं, यह हम पीछे सञ्ज्ञा-प्रकरण मे बता चुके हैं। य्, व्, ल् के परे होने पर अनुस्वार के स्थान पर स्थानी अनुस्वार के अनुनासिक होने से स्थानेऽन्तरतम (१७) द्वारा सानु- नासिक यँ, वँ, लँ ही होंगे। यथा -- १ सम् + वत्सर = स + वत्सर = सवँवत्सर । २ दानम् + यच्छति = दान + यच्छति = दानयँ यच्छति । ३ अहम् + लिखामि = अह

  • लिखामि - अहल्लिखामि । रेफ के परे रहते पदान्त अनुस्वार को परसवर्ण नही होता क्योकि रेफ का कोई सवर्ण नही--कुलं रोदिति । यहा यह विशेष ज्ञातव्य है कि मोऽनुस्वार (७७) से विहित अनुस्वार यद्यपि सामान्यतः प्रकृतसूत्र से वैकल्पिक परसवर्ण को प्राप्त होता है तथापि र्, श्, ष्, स्, ह् के परे होने पर वह परसवर्ण को प्राप्त नही होता अनुस्वार अनुस्वार ही रहता है। यथा-- कुलं रोदिति । शिशुं शाययति । तं षट्पदमपश्य । मित्रं सान्त्वयति । शत्रुं हन्ति । कारण-- रेफोष्मणां सवर्णा न सन्ति, किञ्च श्, ष्, स्, ह्, यय्प्रत्याहार मे भी नही आते । [लघु०] विधि-सूत्रम्-- (८१) मो राजि समः क्वौ ।।८।३।२५।। क्विबन्ते राजतौ परे समो मस्य म एव स्यात् । सम्राट् ॥ अर्थ--क्विबन्त राज् धातु परे हो तो सम् के मकार को मकार ही हो । व्याख्या--सम् ६।१। मः ६।१। (मोऽनुस्वार से)। म १।१। मकारादकार उच्चारणार्थः । क्वौ ७।१। राजि ७।१। क्विप् (प्) यह प्रत्यय है । प्रत्ययग्रहणे तदन्त- ग्रहणम्--इस परिभाषा के अनुसार व्याकरण मे जहा २ प्रत्यय का ग्रहण होता है वहा २ तदन्त अर्थात् वह प्रत्यय जिस के अन्त मे होता है ऐसे शब्दसमूह (प्रकृति + प्रत्यय) का ग्रहण किया जाता है। इस नियम के अनुसार क्विन् से तदन्त-विधि हो कर 'क्विबन्त' बन जायेगा । अर्थ --(क्वौ) क्विबन्त (राजि) राज् धातु परे हो तो (सम्) सम् के (म) मकार के स्थान पर (म) मकार आदेश होता है ।
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