लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहल्-सन्धि-प्रकरणम् १२१ व्याख्या—अनुस्वारस्य ।६।१। ययि ।७।१। पर-सवर्णः ।१।१। समासः—परस्य सवर्णः = परसवर्णः, षष्ठीतत्पुरुषसमासः । अथवा पर इति लुप्तषष्ठी कं पृथक् पदम्, सवर्ण इति तु स्वरितत्वादधिकृतम् । अर्थः—(ययि) यय् परे होने पर (अनुस्वारस्य) अनुस्वार के स्थान पर (पर-सवर्णः) पर-सवर्ण आदेश होता है। भाव—सब वर्गस्थ वर्ण तथा अन्तःस्थ वर्ण यय् प्रत्याहार के अन्दर आ जाते हैं; इन के परे होने पर अनुस्वार को पर अर्थात् यय् का सवर्ण आदेश हो जाता है। उदाहरण यथा— शान्तः (शान्त वा नष्ट) । ‘शाम्+त’ [शमुँ उपशमे (दिवा०), क्तः, वा दान्तशान्तेत्यादिनिपातनान्नेट्, अनुनासिकस्य क्वीति दीर्घः।] यहां नश्चापदान्तस्य झलि (७८) सूत्र से अपदान्त मकार को अनुस्वार हो ‘शांत’ ऐसा बना; अब इस सूत्र से तकार यय् परे होने पर अनुस्वार को पर-सवर्ण करना है। तकार के सवर्ण—‘त्, थ्, द्, ध्, न्’ ये पञ्च वर्ण हैं। इन में नासिकास्थान के सादृश्य के कारण अनुस्वार के सदृश वर्गपञ्चम नकार है, अतः अनुस्वार को नकार हो कर विभक्ति लाने से ‘शान्तः’ प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार प्रत्येक वर्ग का पञ्चम ही अनुस्वार को परसवर्ण होगा। इस के कुछ अन्य उदाहरण यथा—१. अन्+कित = अंकित = अङ्कितः । २. अन्+चित = अंचित = अञ्चितः । ३. कुन्+ठित = कुंठित = कुण्ठितः । ४. दाम्+त = दांत = दान्तः । ५. गुम्+फित = गुंफित = गुम्फितः । ६. मुन्+क्ते = मुं+क्ते = मुङ्क्ते । ७. गम्+ता = गं+ता = गन्ता । इत्यादि । यहां ‘यय्’ ग्रहण स्पष्टार्थ है। यय् ग्रहण न करने से भी कोई दोष नहीं आ सकता । तथाहि—आक्रंस्यते, दंशनम्, अंहिपः इत्यादि प्रयोगों में रेफोष्मणां सवर्णा न सन्ति इस वचन के कारण परसवर्ण नहीं होगा तथा अचों के परे होने पर तो अनु- स्वार ही नहीं मिल सकेगा । इस सूत्र का ‘य्, व्, र्, ल्’ के परे होने पर यद्यपि कोई उदाहरण नहीं तथापि अग्रिम वा पदान्तस्य (८०) सूत्र में इन का उपयोग दिखाया जायेगा । नोट—ग्रन्थकार ने इस सूत्र की वृत्ति [जो सूत्र पर संस्कृत में उसका अर्थ लिखा होता है उसे ‘वृत्ति’ कहते हैं] नहीं लिखी; केवल ‘स्पष्टम्’ लिखा है। इसका आशय यह है कि इस सूत्र का अर्थ स्पष्ट है अर्थात् इस सूत्र में अन्य किसी सूत्र के पद की अनुवृत्ति नहीं आती । यह सूत्र ही अपनी आप वृत्ति है। एवमन्यत्र भी समझ लेना चाहिये। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(८०) वा पदान्तस्य ।८।४।५८॥ (पदान्तस्यानुस्वारस्य ययि परे परसवर्णो वा स्यात्) । त्वङ्करोषि, त्वं करोषि ॥ अर्थः—यय् परे हो तो पदान्त अनुस्वार को विकल्प कर के परसवर्ण हो। व्याख्या—वा इत्यव्ययपदम् । पदान्तस्य ।६।१। अनुस्वारस्य ।६।१। ययि ।७।१। परसवर्णः ।१।१। (अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः से)। अर्थः—(ययि) यय् परे होने पर