भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 142

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १२५ ही होंगे । यथा—'मतुँप्' के अनुनासिक मकार के स्थान पर मादुपधायाश्च मतोर्वोऽ- यवादिभ्यः (१०६२) से अनुनासिक वकार नहीं होता किन्तु निरनुनासिक वकार ही होता है वैसे यहां पर भी करना चाहिये । अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् (११६), संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः (८१७) इत्यादि सूत्रों के 'अर्थवत्' 'यण्वतः' आदि शब्दों में आचार्य पाणिनि ने स्वयं भी मतुँप् के अनुनासिक मकार के स्थान पर अनुनासिक वकार नहीं किया इस से भी यही सिद्ध होता है कि आचार्य विधीयमान अण् के सवर्णग्रहण के पक्ष में नहीं हैं। कौमुदीपक के समर्थकों का कथन है कि ऋत उत् (२०८) में 'उ' विधीयमान है वह अपने सवर्णियों का ग्रहण नहीं करा सकता, तो पुनः इसे क्यों मुनि ने तपर किया है ? अतः इस से प्रतीत होता है कि विधीयमान भी अण् कहीं-कहीं अपने सवर्णियों का ग्रहण कराते हैं । इस विषय का विस्तृत विचार हमारे नवीन मुद्रित शोधग्रन्थ न्यास-पर्यालोचन में पृष्ठ (२६०) पर देखें । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(८३) नपरे नः ।८।३।२७॥ नपरे हकारे (परे) मस्य नो वा। किन्ह्नुते किं ह्नुते ॥ अर्थः—नकार परे वाला हकार परे हो तो मकार के स्थान पर विकल्प कर के नकार हो जाता है व्याख्या—नपरे ।७।१। हे ।७।१। (हे मपरे वा से) । मः ।६।१। (मोऽनुस्वारः से)। नः ।१।१। (नकारादकार उच्चारणार्थः) । वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा से) । समासः—नः परो यस्मात् स नपरस्तस्मिन् = नपरे । बहुव्रीहिसमासः । अर्थः— (नपरे) नकार परे वाला (हे) हकार परे हो तो (मः) म् के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (नः) न् आदेश हो जाता है। यह सूत्र भी मोऽनुस्वारः (७७) का वैकल्पिक अपवाद है। पक्ष में मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार आदेश होगा। उदाहरण यथा— 'किम् + ह्नुते' (क्या छिपाता है ?) यहां नकार परे वाला हकार परे है अतः प्रकृतसूत्र (८३) से मकार को वैकल्पिक नकार होकर—किन्ह्नुते । पक्ष में मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार हो कर 'किं ह्नुते' इस प्रकार दो रूप सिद्ध हुए । इसी प्रकार—१. कथन्ह्नुते, कथं ह्नुते । २. यन्ह्नुते, यं ह्नुते । ३. तन् ह्लोतुम्, तं ह्लोतुम् । ह्नुङ् अपनयने (अदा०) के सिवाय अन्य धातु के उदाहरण यहां दुर्लभ हैं। अभ्यास (२०) (१) निम्नलिखित रूपों में सूत्रसमन्वयपूर्वक सन्धिच्छेद करें— १. तपांसि । २. भूमिङ् खनति । ३. आम्रन् चूपति । ४. फलन् ह्नुते । ५. पुलिंलिङ्गम् । ६. ऊर्ध्वण्डयते । ७. विद्वांसः । ८. तलूूँ लिखामि । ९. निष्फलवूँ वित्तम् । १०. नदीन्तरति । ११. कथयूं ह्यः । १२. सत्यं शिवं सुन्दरम् । १३. धनयूं यच्छति । १४. कान्तः । १५. साम्रा- ज्यम् । १६. त्वलूँ लोमशः । १७. रामं रमेशम् भजे । १८. सर्वम्वल-