लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 143, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
वताम्पथ्यम् । १६ त्वँ वक्ता । २० पण्डित । २१ अहङ्कार । २२ अहँ वलामि । २३ कुलं ह्लादते । २४ इत्थम् ह्वलयति । (२) 'मा गृधः कस्यस्विद्धनम्' यहां अन्त्य मकार को अनुस्वार क्यों नहीं होता? अपदान्त (?) है तो नश्चापदान्तस्य झलि से हो जाये । (३) 'एव लृकारोऽपि आ, पुंस्त्वम्'—क्या ये शुद्ध हैं ? सप्रमाण लिखें । (४) 'राजन् + पाहि' यहां नकार को अनुस्वार क्यों न हो ? (५) 'तन्यते' यहां नश्चापदान्तस्य झलि सूत्र क्या प्रवृत्त नहीं होता ? (६) 'अनुस्वारस्य ययि पर सवर्ण' यहां 'पर' पद को पृथक् क्यों मानते हैं ? (७) 'सम्राज्ञी' शब्द क्या अशुद्ध है ? (८) 'किं ह्य' में अनुनासिक यँ करना कहां तक शुद्ध है ? टिप्पण करें । (९) 'नपरे, मपरे यवलपरे' पदों में समास बता कर उन का विग्रह लिखें । (१०) डुल रोदिति यहां अनुस्वार को परसवर्ण क्यों नहीं होता ?
[लघु०] विधिसूत्रम्—(८४) ङः सि धुँट् ।८।३।२६॥ ङात् परस्य सस्य धुँड् वा ॥ अर्थ—ङकार से परे सकार का अवयव धुँट् हो जाता है विकल्प से । व्याख्या—ङः ।५।१। सि ।७।१। धुँट् ।१।१। वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा म) । 'ङः' यह पञ्चम्यन्त है । तस्मादित्युत्तरस्य (७१) के अनुसार ङकार से अव्य- वहित पर का अवयव 'धुँट्' होना चाहिये । 'सि' यह सप्तम्यन्त पद है । तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य (१६) के अनुसार सकार से अव्यवहित पूर्व का अवयव 'धुँट्' होना चाहिये । अब 'धुँट्' किस का अवयव हो ? यह शङ्का उत्पन्न होती है । इस का समा- धान यह है—उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् अर्थात् जहां पञ्चमी और सप्तमी दोनों से निर्देश किया गया हो वहां पञ्चमी का निर्देश ही बलवान् होता है । इस नियम के अनुसार 'ङः' यहां पञ्चमी का निर्देश ही बलवान् हुआ । अत ङकार से अव्यवहित पर=सकार को ही धुँट् का आगम¹ होगा। एवं 'सि' को 'सः' इस षष्ठ्यन्त-
१ व्याकरण प्रक्रिया में जब किसी के साथ कुछ अंश जोड़ा जाता है तो उस जुड़ने वाले अंश को आगम कहते हैं । आगम मित्र की तरह होते हैं जैसे मित्र घर में आकर गृहपति के मेहमान वत उस के समीप बैठते हैं वैसे आगमों की स्थिति होती है । अत एव कहा है—मित्रवदागमा भवन्ति । जिस आगम होता है उसे प्रायः षष्ठ्यन्ततया प्रस्तुत किया जाता है । जैसे —आर्धधातुकस्येड् वलादेः(४०१), इदितो नुम् धातोः (४६३), ड्णोः कुक्टुक् शरि (८६) आदि । परन्तु जब पञ्चमी और सप्तमी दोनों विभक्तियों से निर्देश होता है तब पञ्चम्यन्त निर्देश के बलवान् होने से सप्तम्यन्त पद को षष्ठ्यन्त के रूप में परिणत होना पड़ता है और तब आगम उसी का ही अवयव माना जाता है जैसे कि इस प्रकृतसूत्र में