लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहल्-सन्धि-प्रकरणम् १२६ स्थान पर (द्वितीयाः) वर्गों के द्वितीय वर्ण हों (शरि) शर् प्रत्याहार परे होने पर (इति) यह (पौष्करसादेः) पौष्करसादि आचार्य के मत में (वाच्यम्) कहना चाहिये । अन्य आचार्यों के मत में न होने से विकल्प सिद्ध हो जायेगा । पौष्करसादि पाणिनि से पूर्ववर्त्ती वैयाकरण थे । आन्तर्य के कारण वर्गप्रथम को उसी वर्ग का द्वितीय वर्ण हो जायेगा । भाव यह है कि श्, ष्, स् के परे होने पर क् को ख्, च् को छ्, ट् को ठ्, त् को थ् तथा प् को फ् आदेश विकल्प से हो जाता है । उदाहरण यथा— १ संवथ्सरः, संवत्सरः । २ अभीप्सा, अभीप्सा । ३ अख्परम्, अक्परम् । ४ ख्षीरम्, क्षीरम् । ५ ख्षमा, क्षमा । ६ ख्यितिः, क्षितिः । ७ थ्सरुः, त्सरुः । ८ अफ्सरसः, अप्सरसः । ९ विर्फ्शिन्, विर्प्शिन् । १० अख्षि, अक्षि । इत्यादि । ‘प्राङ् क्+षष्ठः, सुगण् ट्+षष्ठः’ इन दोनों स्थानों पर पकार=शर् परे रहने के कारण ककार और टकार को क्रमशः खकार और ठकार होकर निम्नलिखित रूप बने— कुँक् पक्ष में { १ प्राङ्ख्षष्ठः । (पौष्करसादि के मत में) { २ प्राङ्क्षष्ठः¹ । कुँक्-अभाव में— ३ प्राङ् षष्ठः । टुँक् पक्ष में { १ सुगण्ठ्षष्ठः । (पौष्करसादि के मत में) { २ सुगण्ट्षष्ठः । टुँक्-अभाव में— ३ सुगण् षष्ठः । इस के अन्य उदाहरण यथा—१ प्राङ्ख्षु, प्राङ्क्षु, प्राङ्षु । २ गवाङ्ख्षु, गवाङ्क्षु, गवाङ्षु । ३ तिर्यङ्ख् स्वपिति, तिर्यङ्क् स्वपिति, तिर्यङ् स्वपिति । ४ क्रुङ्ख् श्वसिति, क्रुङ्क् श्वसिति, क्रुङ् श्वसिति । ५ उदङ्ख् शृणोति, उदङ्क् शृणोति, उदङ् शृणोति । ६ सुगण्ख् सहते, सुगण्क् सहते, सुगण् सहते । इत्यादि । नोट — चयो द्वितीयाः शरि० वार्तिक अनचि च (८.४.४६) सूत्र पर पढ़ा गया है । यद्यपि खरि च (८.४.५४) सूत्र त्रिपादी में इस वार्तिक से परे होने के कारण इसे असिद्ध नहीं समझ सकता, तथापि वार्तिक के आरम्भसामर्थ्य से उस की यहां प्रवृत्ति नहीं होती । अन्यथा वार्तिक बनाने का कुछ प्रयोजन ही न रहे । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(८७) नश्च ।८।३।३०॥ नान्तात् परस्य सस्य धुँट् वा । सन्त्सः, सन्सः ॥ अर्थः—नकारान्त से परे सकार को विकल्प कर के धुँट् का आगम होता है । व्याख्या—नः ।५।१। सि ।७।१। धुँट् ।१।१। (ङः सि धुँट् से) । च इत्यव्यय- पदम् । वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा से) । अर्थः—(नः) न् से परे (सि=सः) १. ककार और षकार मिल कर ‘क्ष’ हो जाता है । क्+ष्+अ=क्ष । ल० प्र० (६)