भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 145

१३० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां सकार का अवयव (धुट्) धुँट् (वा) विकल्प करके हो जाता है। आद्यन्तौ टकितौ (८५) द्वारा धुँट् सकार का आद्यवयव होगा। उदाहरण यथा— 'सन् + स' (वह सज्जन है) यहा न् से सकार परे है अतः सकार को धुँट् का वैकल्पिक आगम हो कर उँट् अनुबन्ध का लोप हो जाता है। अब खरि च (७४) सूत्र से चर्त्व अर्थात् धकार को तकार करने से—सन्त्स। धुँट्-अभाव पक्ष मे—सन्स। इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा— १ अस्मिन्त्समये, अस्मिन्समये। २ भवान्त्सखा, भवान्सखा। ३ सन्त्साधु, सन्साधु। ४ तान्त्सपत्नान्, तान्सपत्नान्। ५ धनवान्त्सहोदर, धनवान्सहोदर। ६ पठन्त्साद्‌दृश्यम्, पठन्माद्‌दृश्यम्। ७ विद्वान्त्सहते, विद्वान्सहते। ८ पुमान्त्स्त्रिया, पुमा- न्स्त्रिया। ९ नेन्त्सिद्बध्नातिषु च, नेन्सिद्बध्नातिषु च। १० तान्साध्यान्त्साधय, तान्माध्यान्साधय। इत्यादि। नोट—वृत्ति में नान्तात्' पद 'न' को 'पदात्' का विशेषण कर देने से येन विधिस्तदन्तस्य द्वारा प्राप्त होता है। इस से हानि लाभ कुछ नही। शङ्का—ङ सि धुँट् (८४) नश्च (८७) इन दो ही सूत्रो में 'सि' का ग्रहण होता है। इन्ही दोना स्थानो पर उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् इस परिभाषा का आश्रय कर 'सस्य' ऐसा मानना पडता है। इस से तो यही अच्छा होता कि यहा 'सि' पद की बजाय 'स' पद ग्रहण कर लेते। समाधान—'स' ऐसा स्पष्ट षष्ठ्यन्त पद न कह कर 'सि' इस प्रकार सप्त- म्यन्त पद के ग्रहण का प्रयोजन लाघव करना ही है। 'सि' मे डेढ मात्रा है परन्तु 'स' मे दो मात्रा होती थी। [स् की आधी, इ की एक, कुल डेढ। स् की आधी, अ की एक, विसर्गों की आधी, कुल दो। अर्धमात्रा का लाघवगौरव है। अर्धमात्रा- लाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणा—यह उक्ति यहा चरितार्थ होती है।] [लघु०] विधि सूत्रम्—(८८) शि तुँक् ।।८।३।३१॥ पदान्तस्य नस्य शे परे तुंग्वा। सञ्छम्भु, सञ्छ्शम्भु, सञ्शम्भु, सन्शम्भु॥ अर्थ—शकार परे होने पर पदान्त नकार को विकल्प कर के तुंक का आगम होता है। व्याख्या—शि ।७।१। न ।६।१। (नश्च से)। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा रो)। तुँक् ।१।१। 'न' यह 'पदस्य' का विशेषण है अतः इस मे तदन्तविधि होती है। अर्थ—(शि) शकार परे होने पर (न०) नान्त (पदस्य) पद का अवयव (वा) विकल्प करके (तुँक्) तुंक हो जाता है। 'तुँक्' कित् होने से आद्यन्तौ टकितौ (८५) के अनुसार नान्त पद का अन्तावयव होगा। उदाहरण यथा— 'सन्+शम्भु' (शम्भु भगवान् सत्स्वरूप है) यहा शकार परे है, अतः 'सन्'