लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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१३२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अर्थात् ङ ण्, न के साथ टित्व का सम्बन्ध हो कर—'ङुट्, णुट्, नुट्' ये तीन आगम प्राप्त होगे । यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) के अनुसार ङकारान्त पद से परे अच् को ङुट् णकारान्त पद से परे अच् को णुट् तथा नकारान्त पद से परे अच् को नुट् का आगम होगा । उदाहरण यथा— (१) 'प्रत्यङ्+आत्मा' (जीवात्मा) यहां यकारोत्तर ह्रस्व अवर्ण से परे ङ् = ङम् है, अत 'प्रत्यङ्' ङकारान्त पद हुआ । इस से परे अच् आकार को ङुट् का आगम हो, उँट् के चले जाने पर 'प्रत्यङ्ङात्मा' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । (२) 'सुगण्+ईश' (सुगणाम् = सुयोग्य-गणितज्ञानाम् ईश = स्वामी, षष्ठी- तत्पुरुष-समास ) यहा गकारोत्तर ह्रस्व अवर्ण से परे ण्=ङम् है, अत 'सुगण्' णकारान्त पद हुआ । इस से परे अच = ईकार को णुट् का आगम हो, उँट् के चले जाने पर विभक्ति लाने मे 'सुगण्णीश' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । (३) 'सन्+अच्युत' (अच्युत भगवान् सत्स्वरूप है) यहा सकारोत्तर ह्रस्व अवर्ण से परे न् - ङम् है, अत 'सन्' यह नकारान्त पद हुआ । इस से परे अच् = अकार को नुट् का आगम हो, उँट् के चले जाने से 'सन्नच्युत' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । नोट—इस सूत्र मे स्थित 'नित्यम्' पद का अर्थ 'प्राय' है, अर्थात् यथा देव- दत्त नित्य हसता ही रहता है, विष्णुमित्र नित्य खाता ही रहता है इत्यादि वाक्यो मे 'नित्य' शब्द का 'प्राय' (बहुधा) अर्थ है इसी प्रकार यहा भी समझना चाहिये । अत इको यण अचि, सुप्तिङ्-अन्त पदम्, सन्-आद्यन्ता धातव. इत्यादि सूत्रो मे ङमुट् न होने पर भी कोई दोष नही आता । सन्नन्तान्न सन्निष्यते—यहा पर दोनो प्रकार के उदाहरण हैं। [केचित्तु अनुबन्धो यो ङम् तदन्तात् पदादचो ङमुँडागमे कामचारिता, अन्यत्र तु नियतेत्याहु ।] इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा— १ कुर्वन्नास्ते । २ तिष्ठन्निट । ३ तस्मिन्निति । ४ एतस्मिन्नहनि । ५ गच्छन्नवोचत् । ६ जानन्नपि । ७ भगवन्नत्र । ८ तस्मिन्नणि । ६ हसन्ता- गच्छति । १० पठन्नपठत् । ११ अस्मिन्नुद्याने । १२ सुगण्णालय । 'ह्रस्वात्' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि—भगवान्+अत्र='भगवानत्र' इत्यादि प्रयोगो मे दीर्घ से परे ङम होने से अच् को ङमुँट् न हो। 'अचि' कहने से—'गच्छन्+ मुञ्चने' आदि मे नकार को ङमुँट् का आगम नही होता । अभ्यास (२१) (१) जहा सप्तमी और पञ्चमी दोनो विभक्तियो द्वारा निर्देश हो वहां तस्मि- न्निति० तथा तस्मादित्युत्तरस्य इन मे किस परिभाषा की प्रवृत्ति होती है ? (२) आद्यन्तौ टकितौ सूत्र की आवश्यकता पर सोदाहरण प्रकाश डालें । (३) पटत्सन्न् , पट्मन्त — आदि प्रयोगो में चयो द्वितीया शरि० वात्तिक द्वारा वर्गद्वितीय आदेश क्यों नहीं होता ? (४) 'प्राङ्घषष्ठ' आदि प्रयोगो में खरि च द्वारा चर्त्व क्यो नहीं होता ? (५) ङ सि धुट् सूत्र को स्पष्टता के लिये ङः सः धुट् ही क्यो नही कहा ?