भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १३३ (६) क्या उपाय किया जाये जिस से सिद्धि करते समय 'सञ्छम्भुः' आदि रूपों का क्रम ग्रन्थोक्तप्रकार से शुद्ध सिद्ध हो ? (७) ङमो ह्रस्वादचि ङमुण्नित्यम् सूत्र में ङमुट् को नित्य कहने वाले आचार्य किस कारण इको यण् अचि आदि में स्वयं ङमुट् आगम नही करते ? -------::0::------- [लघु०] विधि-सूत्रम्—(६०) सम्ः सुँटि ।८।३।५॥ समो रुँः स्यात् सुँटि ॥ अर्थः—सुँट् परे होने पर सम् के मकार के स्थान पर 'रुँ' आदेश हो । व्याख्या—समः ।६।१। सुँटि ।७।१। रुँः ।१।१। (मतुँवसो रुँ सम्बुद्धौ छन्दसि से) । अर्थः—(सुँटि) सुँट् परे हो तो (समः) सम् के स्थान पर (रुँः) रुँ आदेश हो जाता है । अलोऽन्त्यस्य (२१) परिभाषा के अनुसार सम् के अन्त्य अल् = मकार को ही रुँ आदेश होगा । 'सम् + स्कर्त्ता' [यहां 'सम्' पूर्वक डुकृञ् करणे (तना०) धातु से तृच् प्रत्यय हो सम्परिभ्यां करोतौ भूषणे सूत्र से कृ को सुँट् का आगम हो कर उँट् का लोप हो जाता है ।] यहां सुँट् परे रहने से मकार को रुँ आदेश हो, अनुनासिक उकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र से इत्सञ्ज्ञा कर तस्य लोपः (३) से लोप किया तो 'सर् + स्कर्त्ता' हुआ । अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(६१) अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा ।८।३।२॥ अत्र रुँ-प्रकरणे रोः पूर्वस्याऽनुनासिको वा स्यात् ॥ अर्थः—इस रुँप्रकरण में रुँ से पूर्व वर्ण को विकल्प से अनुनासिक हो । व्याख्या — अत्र इत्यव्ययपदम् । अनुनासिकः ।१।१। पूर्वस्य ।६।१। तु इत्यव्यय- पदम् । वा इत्यव्ययपदम् । मतुँवसो रुँ सम्बुद्धौ छन्दसि (८.३.१) सूत्र के बाद यह पढ़ा गया है । यहां 'अत्र' इसी रुँप्रकरण के लिये है; अतः ससजुषो रुँः (१०५) सूत्र से किये गये रुँ वाले स्थानों पर यह सूत्र प्रवृत्त नहीं होगा ।¹ अर्थः—(अत्र) मतुँवसो रुँ सम्बुद्धौ छन्दसि सूत्र से आरम्भ किये गये रुँ प्रकरण में (रोः) रुँ से (पूर्वस्य) पूर्व वर्ण के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (अनुनासिकः) अनुनासिक हो जाता है ।

१. अष्टाध्यायी में रुँ का प्रकरण दो स्थानों पर आता है । एक अष्टमाध्याय के तृतीयपादस्थ मतुँवसो रुँ सम्बुद्धौ छन्दसि (८.३.१) सूत्र से लेकर कानाम्रेडिते (८.३.१२) सूत्र तक, और दूसरा ससजुषो रुँः (८.२.६६) आदि सूत्रों में । यहां 'अत्र' शब्द के कथन से प्रथम प्रकरण का ही ग्रहण होता है दूसरे ससजुषो रुँः (१०५) वाले प्रकरण का नहीं । इस प्रकरण के पांच सूत्र लघुकौमुदी में व्या- ख्यात हैं—सम्ः सुँटि (६०), पुमः खय्यम्परे (६४), नश्छव्यप्रशान् (६५), नॄन् पे (६७), कानाम्रेडिते (१००) । अतः इन पांच सूत्रों के विषय में ही प्रकृत अनुनासिक (६१) तथा अनुस्वार (६२) की प्रवृत्ति समझनी चाहिये ।