भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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हल्-सन्धि-प्रकरणम् १३५ [लघु०] वा०—(१५) सम्पुङ्कानां सो वक्तव्यः॥ सँस्स्कर्ता, संस्स्कर्ता॥ अर्थः—सम्, पुम् तथा कान् शब्दों के विसर्ग को सकार आदेश होता है। व्याख्या—सम्पुङ्कानाम् ।६।३। विसर्गस्य ।६।१। (प्रकरणलब्ध)। सः ।१।१। वक्तव्यः ।१।१। समासः—सम् च पुम् च कान् च = सम्पुङ्कान्, तेषाम् = सम्पुङ्कानाम्। इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(सम्पुङ्कानाम्) सम्, पुम् और कान् शब्दों के (विसर्गस्य) विसर्ग के स्थान पर (सः) स् आदेश (वक्तव्यः) कहना चाहिये। 'सँः + स्कर्ता, संः + स्कर्ता' यहां सम् के विसर्ग हैं अतः विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश हो कर—१. सँस्स्कर्ता, २. संस्स्कर्ता ये दो रूप सिद्ध होते हैं। भाष्य में समो वा लोपमेके द्वारा सम् के मकार का पाक्षिक लोप भी प्रतिपा- दन किया गया है। यह लोप भी इसी रुँ के प्रकरण में स्थित है अतः अनुनासिक और अनुस्वार भी होते हैं। इस प्रकार 'सँस्कर्ता, संस्कर्ता' ये एक सकार वाले रूप भी बनते हैं। अत एव 'संस्कृतम्' में एक सकार देखा जाता है। सिद्धान्त-कौमुदी में इस के १०८ रूप बनाये गये हैं; विशेष जिज्ञासु वहीं देखें। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(६४) पुमः खय्यम्परे ।८।३।६॥ अम्परे खयि पुमो रुँः स्यात्। पुँस्कोकिलः, पुंस्कोकिलः॥ अर्थः—अम् प्रत्याहार जिस से परे है ऐसा खय् यदि परे हो तो पुम् शब्द के मकार को रुँ आदेश होता है। व्याख्या—पुमः ।६।१। रुँः ।१।१। (मतुवसो रुँ सम्बुद्धौ छन्दसि सूत्र से)। खयि ।७।१। अम्परे ।७।१। समासः—अम् परो यस्माद् असौ = अम्परस्तस्मिन् = अम्परे। बहुव्रीहि-समासः। अर्थः—(अम्परे) अम् है परे जिस से ऐसे (खयि) खय् प्रत्याहार के परे होने पर (पुमः) पुम् शब्द के स्थान पर (रुँः) रुँ आदेश हो जाता है। अलो- ऽन्त्यस्य (२१) से पुम् के मकार को ही रुँ आदेश होगा। उदाहरण यथा— 'पुम् + कोकिल' (पुमांश्चासौ कोकिलश्चेति विग्रहः, 'पुंस् + सुँ कोकिल + सुँ' इति कर्मधारयसमासे विभक्त्योर्लुकि संयोगान्तस्य लोपः इति पुंसः सकारलोपे अनुस्वार- स्यापि पुनर्मकारः) यहां पुम् से परे ककार खय् विद्यमान है, इस से परे ओकार अम् भी मौजूद है अतः पुम् के मकार को प्रकृतसूत्र से रुँ आदेश हो कर पूर्ववत् अनुनासिका- देश (६१) अनुस्वारागम (६२), विसर्ग (६३) तथा सम्पुङ्कानां सो वक्तव्यः (वा० १५) से विसर्ग के स्थान पर सकार कर विभक्ति लाने से 'पुँस्कोकिलः, पुंस्कोकिलः' (नर कोयल) ये दो रूप सिद्ध होते हैं। १. समासावस्था में जब 'पुंस्' शब्द के सकार का संयोगान्तस्य लोपः (२०)से लोप हो जाता है तो निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः के अनुसार अनुस्वार को भी पुनः मकार होकर 'पुम्' हो जाता है। उसी का यहां ग्रहण है; 'पुम्' कोई नया शब्द नहीं।