भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 633 में से

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पृष्ठ 151

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१३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां नोट—‘पुंस्कोकिल, पुंस्कोकिल’ यहां खरवसानयो ० (६३) सूत्र से रेफ को विसर्ग करने पर कुप्वो ≍क≍पौ च (६८) सूत्र द्वारा जिह्वामूलीय प्राप्त होते थे, पुन उस के अपवाद सम्पुङ्कानां सो वक्तव्य (वा० १५) वार्त्तिक से सकार आदेश हो जाता है । खय् यो अम्पर्क इस लिये कहा है कि ‘पुंशीरम्’ आदि मे रुँ आदेश न हो । यहा सकार का संयोगान्त-लोप हो कर मोऽनुस्वार मे मकार को अनुस्वार हो जाना है । ‘खय् परे’ होन पर इस लिय कहा है कि ‘पुलिङ्गम, पुदास, पुगव, पुन्नाग’— इत्यादिया मे रुँत्व न हो जाये । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(६५) नश्छव्यप्रशान् ।८।३।७।। अम्परे छवि नान्तस्य पदस्य रुँ स्यात्, न तु प्रशान्शब्दस्य ॥ अर्थ—जिस से परे अम् प्रत्याहार है ऐसे छव् प्रत्याहार के परे होने पर नकारान्त पद को रुँ आदेश हो, परन्तु प्रशान् शब्द को न हो । व्याख्या—न ।६।१। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । रुँ ।१।१। (मतुँवसो रुँ सम्बुद्धौ छन्दसि स) । अम्परे ।७।१। (पुम खय्यम्परे स) । छवि ।७।१। अप्रशान् ।१।१। (षष्ठ्यर्थे प्रथमा) । समास—अम् परो यस्माद् असौ=अम्पर, तस्मिन्= अम्परे । बहुव्रीहिसमास । न प्रशान्=अप्रशान्, नञ्तत्पुरुष । ‘न’ यह ‘पदस्य’ का विशेषण है अत येन विधिस्र्तदन्तस्य द्वारा इस से तदन्त-विधि हो कर ‘नान्तस्य पदस्य’ बन जाता है। अर्थ—(अम्परे) अम् परे वाला (छवि) छव् परे होने पर (न) नकारान्त (पदस्य) पद के स्थान पर (रुँ) रुँ आदेश होता है, परन्तु (अप्रशान्) प्रशान् शब्द को नहीं होता । अलोऽन्त्यस्य (२१) परिभाषा द्वारा नकारान्त पद के अन्त्य नकार को ही रुँ आदेश होगा। उदाहरण यथा— ‘चक्रिन्+त्रायस्व’ (हे चक्रिन् ! त्व त्रायस्व=रक्ष) यहां ‘चक्रिन्’ यह नान्त पद है। इस से परे तकार छव् है, तथा इस छव् से परे रेफ अम् विद्यमान है, अत नकार को रुँ आदेश हो पूर्ववत् अनुनासिकादेश, अनुस्वारागम तथा खरवसानयोर्विस- र्जनीय (६३) से पदान्त रेफ को विसर्ग करने पर—‘चक्रिँ +त्रायस्व, चक्रिं + त्रायस्व’ ये दो रूप हुए । अब विसर्ग को सकारादेश करने वाला अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(६६) विसर्जनीयस्य सः ।८।३।३४।। खरि विसर्जनीयस्य स स्यात् । चक्रिँस्त्रायस्व, चक्रिंस्त्रायस्व । अप्र- शान् किम् ? प्रशान् तनोति । पदान्तस्येति किम् ? हन्ति ॥ अर्थ—खर् परे होने पर विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश हो । व्याख्या—खरि ।७।१। (खरवसानयोर्विसर्जनीय से एकदेशस्वरित के कारण ‘खरि’ अट्टा) । विसर्जनीयस्य ।६।१। स ।१।१। सकारादकार उच्चारणार्थ । अर्थ— (खरि) खर् परे होने पर (विसर्जनीयस्य) विसर्ग के स्थान पर (स) स् आदेश होता है । उदाहरण यथा—

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