भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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हल्-सन्धि-प्रकरणम् १३७ 'चक्रीँ:+त्रायस्व, चक्रीं:+त्रायस्व' यहां तकार = खर् परे है, अतः विसर्गों को स् आदेश हो—'चक्रीँस्त्रायस्व, चक्रींस्त्रायस्व' ये दो प्रयोग सिद्ध हुए । अप्रशान् किम् ? प्रशान् तनोति । नश्छव्यप्रशान् (६५) सूत्र में 'प्रशान्' शब्द को रुँ करने का निषेध इस लिये किया है कि 'प्रशान्+तनोति' यहां अम्परक (अकार- परक) खय् (तकार) के परे होने पर भी पदान्त नकार को रुँ आदेश न हो । पदान्तस्येति किम् ? हन्ति । 'पदस्य' का अधिकार होने से 'हन्ति' आदि स्थानों में अपदान्त नकार को अम्परक खय् परे होने पर भी (६५) सूत्र से रुँ आदेश नहीं होता । 'छव् परे होने पर' इसलिये कहा है कि—'पुत्रान् पालयति, तान् कामयते' इत्यादि में रुँत्व न हो जाये । छव् को अम्परक कहने से—'सन् त्सरुः' इत्यादि में रुँत्व नहीं होता । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(६७) नॄन् पे ।८।३।१०॥ 'नॄन्' इत्यस्य रुँर्वा पे ॥ अर्थ:—पकार परे होने पर 'नॄन्' शब्द के नकार के स्थान पर विकल्प कर के 'रुँ' आदेश हो । व्याख्या—नॄन् ।६।१। ('नॄन्' यह नृशब्द के द्वितीया के बहुवचन का अनुकरण है। इस के आगे षष्ठी-विभक्ति के एकवचन का लुक् हुआ है) । रुँः ।१।१। (मतुवसो रुँ० सूत्र से) । पे ।७।१। [यहां पकारोत्तर अकार उच्चारण के लिये है अतः 'पुनाति' आदि परे होने पर भी यह सूत्र प्रवृत्त हो जाता है] । उभयथा इत्यव्ययपदम् (उभय- थर्क्षु सूत्र से) । अर्थ:—(पे) पकार परे होने पर (नॄन्) नॄन् शब्द के स्थान पर (उभयथा) विकल्प कर के (रुँ) रुँ आदेश हो जाता है । अलोऽन्त्यस्य (२१) परि- भाषा द्वारा 'नॄन्' के अन्त्य अल् नकार को ही 'रुँ' आदेश होगा । उदाहरण यथा— 'नॄन्+पाहि' (हे राजन् ! त्वं नॄन्=नरान्, पाहि=पालय । लोगों को बचाओ।) यहां पकार परे होने से 'नॄन्' के अन्त्य नकार को प्रकृतसूत्र से रुँ आदेश हो पूर्ववत् अनुनासिकादेश, अनुस्वारागम तथा रेफ को विसर्ग करने पर 'नॄँ:+पाहि, नॄं+पाहि' ये दो रूप हुए । अब विसर्जनीयस्य सः (६६) के प्राप्त होने पर उस का अपवाद अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(६८) कुप्वोः ≍क≍पौ च ।८।३।३७॥ कवर्गे पवर्गे च परे विसर्गस्य ≍क≍पौ स्तः । चाद् विसर्गः । नॄँ ≍ पाहि, नॄं: पाहि; नॄँ ≍पाहि, नॄं: पाहि; नॄन्पाहि ॥ अर्थ:—कवर्ग पवर्ग परे होने पर विसर्ग को क्रमशः जिह्वामूलीय तथा उप- ध्मानीय आदेश होते हैं । सूत्र में चकार-ग्रहण से पक्ष में विसर्ग भी रहता है । व्याख्या—कुप्वोः ।७।२। विसर्जनीयस्य ।६।१। (विसर्जनीयस्य सः से)। ≍क- ≍पौ ।१।२। च इत्यव्ययपदम् । समासः—≍कश्च ≍पश्च = ≍क≍पौ, इतरेतर- द्वन्द्वः । यहां ककार पकार ग्रहण इस लिये किया गया है कि जिह्वामूलीय और उप-