लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां ध्मानीय सदा क्रमशः कवर्ग पवर्ग के ही आश्रित रहते हैं। कुश्च पुश्च=कुपू तयो = कुप्वोः, इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ—(कुप्वोः) कवर्ग पवर्ग परे होने पर (विसर्जनीयस्य) विसर्ग के स्थान पर क्रमशः (≍क≍पो) जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय हो जाते हैं। (च) किञ्च पक्ष में विसर्ग भी बना रहता है¹। सम्पूर्ण कवर्ग पवर्ग में विसर्ग प्राप्त नहीं हो सकते । विसर्ग केवल क्, ख्, प्, फ् इन चार वर्णों के परे होने पर ही मिल सकते हैं। क्योंकि विसर्ग विधान करने वाला खरवसानयो ० (६३) यही एक सूत्र है। यह सूत्र खर् परे होने पर ही विसर्ग आदेश करता है। खर् प्रत्याहार में कवर्ग पवर्ग का इन चार वर्णों के सिवाय अन्य कोई वर्ण नहीं आता, अतः यह सूत्र 'क्, ख्, प्, फ्' परे होने पर ही विसर्गों को जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय करता है । 'नूॅ + पाहि, नृ + पाहि' यहां पकार परे होने से विसर्गों को उपध्मानीय हो कर—नूॅ≍पाहि, नृ≍पाहि । विसर्गपक्ष में— नूॅ पाहि, नृ पाहि । जहां नॄन्पे (६७) सूत्र से रुँ आदेश नहीं होता उस पक्ष में—नॄन्पाहि । इस प्रकार कुल मिला कर पञ्च रूप सिद्ध होते हैं। एवम्—'नूॅ≍पश्य' इत्यादि । नोट—विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय आदि का पाठ अट् तथा शल् प्रत्या- हार में स्वीकार किया जाता है । अतः इन के यर्प्रत्याहारान्तर्गत होने के कारण अनचि च (१८) सूत्र से इन को वैकल्पिक द्वित्व भी हो जाता है। इस से— नूॅ≍ ≍पाहि, नूॅ पाहि' इत्यादि प्रकारेण द्वित्व वाले रूप भी बना करते हैं । विशेष—शर्परे विसर्जनीय (८ ३ ३५)—शर् परे वाला खर् परे हो तो विसर्जनीय का विसर्जनीय ही रहता है अन्य कोई परिवर्तन नहीं होता । इस बाधकसूत्र के कारण—'अतः क्षन्तव्य, वासः क्षौमम्, नापित क्षुरमाधत्स्व' इत्यादि में प्रकृतसूत्र से जिह्वामूलीय नहीं होता । इसीप्रकार—'वालेः प्सात्मोदनम्' आदि में उपध्मानीय तथा 'विलशणः त्सरु' आदि में विसर्जनीयस्य स (६६) द्वारा प्राप्त सकार आदेश का भी बाध हो जाता है । [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(६६) तस्य परमाम्रेडितम् ।८।१।२॥ द्विरुक्तस्य परम् आम्रेडित स्यात् ॥ अर्थ —दो बार कहे गये का परला रूप 'आम्रेडित' सञ्ज्ञक हो ! व्याख्या—तस्य ।६।१। परम् ।१।१। आम्रेडितम् ।१।१। इस सूत्र से पूर्व सर्वस्य द्वे इस प्रकार द्वित्व का अधिकार किया गया है, अतः यहां 'तस्य' पद से 'द्विरुक्तस्य' का ग्रहण हो जाता है। अर्थ —(तस्य) उस दो बार पढ़े गये का (परम्) परला रूप (आम्रेडितम्) आम्रेडित सञ्ज्ञक होता है । यथा 'किम्' शब्द के द्वितीयाविभक्ति के १ चकार-ग्रहण से शर्परे विसर्जनीय (८ ३ ३५) सूत्र से 'विसर्जनीय' पद की अनु- वृत्ति आ जाती है। इस से पक्ष में विसर्जनीय भी रहता है। यदि सूत्र में 'च' न कह कर 'वा' कहते तो पक्ष में (६६) सूत्र से स् हो कर अनिष्ट हो जाता ।